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Varanasi

वाराणसी में UGC के नए नियमों को लेकर तेज हुआ विरोध, सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
Last updated: 28/01/2026 13:15
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Sandeep Srivastava
Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
BySandeep Srivastava
Sandeep Srivastava serves as a Sub Editor at News Report, a registered Hindi newspaper dedicated to ethical, accurate, and reader-focused journalism. He is responsible for copy...
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7 Min Read
varanasi ugc new rules protest bhu student petition supreme court 1769586333

वाराणसी: देशभर में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों को लेकर जनरल कैटेगरी के छात्रों और सवर्ण समाज के बीच असंतोष लगातार गहराता जा रहा है। इसी क्रम में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के शिक्षकों और छात्रों ने इन नियमों को “काला कानून” करार देते हुए खुला विरोध दर्ज कराया है। मामला अब न्यायिक दायरे में भी पहुंच चुका है, जहां एक छात्र ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर नियमों की संवैधानिकता पर सवाल उठाए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले छात्र हिमांशु राज का कहना है कि UGC के नए विनियमों में कई गंभीर खामियां हैं। उन्होंने बताया कि शिकायतों की जांच के लिए गठित की जाने वाली समिति में केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और दिव्यांग वर्ग के प्रोफेसरों को शामिल करने का प्रावधान किया गया है। ऐसे में जनरल कैटेगरी का कोई भी प्रतिनिधि समिति में नहीं होगा, जिससे निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। हिमांशु के अनुसार, यदि जनरल वर्ग के किसी छात्र या शिक्षक के साथ अन्याय होता है तो उसकी बात कौन सुनेगा, यह स्पष्ट नहीं है।

याचिका में दूसरी बड़ी आपत्ति यह उठाई गई है कि यदि कोई शिकायतकर्ता गलत या दुर्भावनापूर्ण शिकायत करता है और जांच में दोषी पाया जाता है, तो उसके खिलाफ किसी भी तरह की सजा या पेनल्टी का प्रावधान नहीं है। छात्रों का कहना है कि बिना दंड के व्यवस्था एकतरफा हो जाती है और इससे न्याय के बजाय अविश्वास का माहौल बनता है। उनकी मांग है कि झूठी शिकायत करने वालों पर भी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, तभी वास्तविक न्याय और समानता संभव हो पाएगी। छात्रों का यह भी तर्क है कि भेदभाव को केवल जाति के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि अन्याय किसी भी छात्र के साथ हो सकता है और शोषण करने वाला कोई भी हो सकता है।

इस पूरे मुद्दे पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। ABVP के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. वीरेंद्र सिंह सोलंकी ने कहा कि शैक्षणिक परिसरों में सौहार्द और समानता बनाए रखना अनिवार्य है और संगठन इसके लिए लगातार प्रयास करता रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय परिसरों में सभी वर्गों के लिए सामाजिक समानता होनी चाहिए और किसी भी प्रकार के भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस विनियम को लेकर विद्यार्थियों, अभिभावकों और अन्य हितधारकों के बीच कई भ्रांतियां फैली हुई हैं, जिन्हें दूर करना UGC की जिम्मेदारी है। डॉ. सोलंकी के अनुसार, UGC को सभी पक्षों से संवाद कर तत्काल स्पष्टता देनी चाहिए, ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती मिले और छात्रों के लिए भेदभाव-मुक्त वातावरण सुनिश्चित हो सके।

वहीं, इस मुद्दे पर NSUI का पक्ष भी सामने आया है। NSUI के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि संगठन UGC द्वारा जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से की गई पहल का स्वागत करता है, लेकिन साथ ही कुछ अहम सुझाव और सवाल भी उठाता है। NSUI का कहना है कि प्रस्तावित समिति केवल कागजी औपचारिकता बनकर न रह जाए, इसके लिए उसमें SC, ST और OBC समुदाय से आने वाले छात्रों का अनिवार्य प्रतिनिधित्व होना चाहिए। साथ ही इन वर्गों से जुड़े शिक्षकों को भी समिति में शामिल किया जाना जरूरी है।

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NSUI ने समिति की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए हैं। संगठन का कहना है कि समिति में सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि इसकी पारदर्शिता बनी रहे। NSUI ने यह सवाल भी उठाया कि आखिर इस समिति का चेयरपर्सन कौन होगा, क्योंकि इस महत्वपूर्ण बिंदु पर UGC की ओर से अब तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया है। उनका आरोप है कि यदि समिति विश्वविद्यालय प्रशासन के नियंत्रण में रही, तो वह समानता और न्याय के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देगी।

NSUI ने यह भी याद दिलाया कि पहले भी लैंगिक भेदभाव सहित अन्य मुद्दों पर कई समितियां बनाई गईं, लेकिन वे शिकायतों के प्रभावी निपटारे और पीड़ितों को न्याय दिलाने में असफल रहीं। संगठन का कहना है कि NFS और आरक्षण नीतियों की विफलता के कारण आज भी दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के शिक्षण पदों में भारी रिक्तियां हैं। IITs, IIMs और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में छात्रों की आत्महत्या की दुखद घटनाएं और उच्च ड्रॉपआउट दर इस बात का संकेत हैं कि उच्च शिक्षा व्यवस्था में गहरे सुधार की जरूरत है। NSUI के अनुसार, उच्च शिक्षा में व्याप्त हर प्रकार के भेदभाव के खिलाफ सामूहिक रूप से आवाज उठाना और उसे खत्म करने की दिशा में ठोस कदम उठाना जरूरी है।

गौरतलब है कि UGC ने 13 जनवरी को ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026’ को अधिसूचित किया था। इन नियमों के तहत कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए विशेष समितियां, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग टीमें गठित करने के निर्देश दिए गए हैं। ये टीमें विशेष रूप से SC, ST और OBC छात्रों की शिकायतों की निगरानी करेंगी। सरकार का तर्क है कि यह कदम उच्च शिक्षा संस्थानों में निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।

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हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इन नियमों के चलते जनरल कैटेगरी के छात्रों को “स्वाभाविक अपराधी” की तरह देखा जा रहा है। उनका आरोप है कि नए प्रावधान विश्वविद्यालय परिसरों में जनरल कैटेगरी के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा दे सकते हैं और इससे शैक्षणिक माहौल बिगड़ने के साथ अराजकता की स्थिति भी पैदा हो सकती है। फिलहाल, UGC के नए नियमों को लेकर देशभर में बहस तेज है और सभी की निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट और UGC के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।

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