महोबा विवाद: कुर्मी-लोध संघर्ष से उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल

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Mridul Kumar Tiwari
Mridul Kumar Tiwari is the Editor-in-Chief of News Report, a registered Hindi newspaper dedicated to credible, independent, and public-interest journalism. He oversees editorial operations, newsroom standards,...
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महोबा में जलशक्ति मंत्री और विधायक के बीच जातीय विवाद का दृश्य

उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर जातीय समीकरणों के इर्द गिर्द घूमती नजर आ रही है। महोबा में जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह और विधायक बृजभूषण राजपूत के बीच हुए टकराव ने अब केवल स्थानीय विवाद का रूप नहीं रखा, बल्कि यह कुर्मी बनाम लोध जातीय संघर्ष के रूप में प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ चुका है। इस घटनाक्रम ने सत्तारूढ़ भाजपा के लिए संगठनात्मक और सामाजिक संतुलन की चुनौती को और जटिल बना दिया है।

मामले की शुरुआत 30 जनवरी को महोबा दौरे के दौरान हुई, जब जलजीवन मिशन में कथित भ्रष्टाचार को लेकर लोध समाज से आने वाले विधायक बृजभूषण राजपूत ने स्वतंत्र देव सिंह के सामने सौ ग्राम प्रधानों के साथ प्रदर्शन किया। इसके बाद बयानबाजी तेज हुई और विवाद ने जातीय रंग ले लिया। स्वतंत्र देव सिंह को कुर्मी समाज का बड़ा चेहरा माना जाता है, जबकि बृजभूषण राजपूत लोध समाज के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। यहीं से यह टकराव दो प्रमुख ओबीसी जातियों के बीच खींचतान का प्रतीक बन गया।

इस विवाद की गूंज लखनऊ तक सुनाई दी, जहां विश्वेश्वरैया हाल में आयोजित लोध महासभा की बैठक में केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा, प्रदेश सरकार के मंत्री धर्मपाल सिंह समेत कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी ने सियासी हलकों में हलचल बढ़ा दी। इस आयोजन को लोध समाज की शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बैठक केवल सामाजिक नहीं, बल्कि सत्ता और संगठन में हिस्सेदारी बढ़ाने के दबाव का संकेत भी है।

भाजपा के लिए चिंता की बात यह है कि लोध समाज को पार्टी का परंपरागत समर्थक माना जाता रहा है, जिसकी नींव पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के दौर में मजबूत हुई थी। वर्तमान में भी लोध समाज से जुड़े कई नेता पार्टी में अहम पदों पर हैं। इसके बावजूद हाल ही में प्रदेश अध्यक्ष पद पर कुर्मी समाज से आने वाले पंकज चौधरी की नियुक्ति ने लोध नेताओं के बीच असंतोष को हवा दी है। माना जा रहा है कि इसी फैसले के बाद से लोध समाज में उपेक्षा की भावना गहराने लगी, जो महोबा विवाद के बाद खुलकर सामने आ गई।

वहीं योगी सरकार और केंद्र सरकार में कुर्मी समाज के कई नेताओं को प्रमुख जिम्मेदारियां मिलने से यह असंतुलन और स्पष्ट होता दिख रहा है। पिछले एक साल में विभिन्न जातीय सम्मेलनों और बैठकों ने प्रदेश की राजनीति को और गर्माया है। क्षत्रिय, कुर्मी, लोध और ब्राह्मण समाज की अलग अलग बैठकों ने यह संकेत दे दिया है कि जातीय स्वाभिमान और भागीदारी का सवाल फिर से केंद्र में आ चुका है।

नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने जातीय आधार पर बैठकों पर रोक लगाने की हिदायत जरूर दी है, लेकिन लोध महासभा जैसी बड़ी बैठकों के बाद यह साफ नहीं है कि संगठन इस उभरती चुनौती को किस तरह संभालेगा। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि भाजपा इस जातीय गोलबंदी को कैसे संतुलित करती है, क्योंकि यही समीकरण भविष्य की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।