मुंबई: डॉ. मोहन भागवत का बयान सर-संघचालक किसी जाति का नहीं, हिंदुत्व ही संघ की असली पहचान

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Sandeep Srivastava
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मुंबई में आरएसएस शताब्दी समारोह में मोहन भागवत का स्पष्ट संदेश

मुंबई: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष समारोह के दौरान संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने संगठन के नेतृत्व और सामाजिक दृष्टि को लेकर एक महत्वपूर्ण और स्पष्ट बयान दिया। उन्होंने यह साफ शब्दों में कहा कि आरएसएस का सरसंघचालक किसी विशेष जाति का प्रतिनिधि नहीं होता। ब्राह्मण, क्षत्रिय या किसी अन्य जाति से होना इस पद के लिए आवश्यक नहीं है। इस भूमिका के लिए केवल एक ही शर्त है कि वह व्यक्ति हिंदू हो। डॉ. भागवत ने जोर देकर कहा कि संघ में पदों का चयन जाति के आधार पर नहीं, बल्कि विचार, संस्कार और प्रतिबद्धता के आधार पर किया जाता है।

शताब्दी वर्ष के इस विशेष कार्यक्रम में देश की कई जानी-मानी हस्तियों की मौजूदगी के बीच डॉ. भागवत ने संघ की वैचारिक परंपरा और उसकी समावेशी सोच को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आरएसएस समाज को जोड़ने वाला संगठन है, न कि जातियों में बांटने वाला। संघ का नेतृत्व किसी सामाजिक वर्ग या पहचान तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह पूरे हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ के भीतर जिम्मेदारियां निभाने के लिए व्यक्ति का आचरण, सेवा भावना और राष्ट्र के प्रति समर्पण ही निर्णायक होता है।

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने भाषा के प्रश्न पर भी संतुलित दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि उन्हें अंग्रेजी भाषा से कोई विरोध नहीं है। जहां अंग्रेजी का उपयोग आवश्यक हो, वहां उसका प्रयोग किया जाना चाहिए। हालांकि, उनका प्रयास हमेशा यही रहता है कि संवाद और अभिव्यक्ति में मातृभाषा या हिंदी को प्राथमिकता दी जाए। उन्होंने इसे आत्मसम्मान और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ते हुए कहा कि अपनी भाषा में सोचने और बोलने से समाज की जड़ें मजबूत होती हैं।

समाज पर पड़ने वाले प्रभावों और मूल्यों की चर्चा करते हुए डॉ. भागवत ने लोकप्रिय अभिनेता सलमान खान का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि कॉलेज के छात्र सलमान खान की फैशन स्टाइल की नकल करते हैं, लेकिन उसके पीछे का कारण नहीं बताते। इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि यदि अच्छे मूल्यों को भी फैशन बना दिया जाए, तो समाज में सकारात्मक बदलाव तेजी से आ सकता है। उनके अनुसार, प्रभावशाली व्यक्तित्वों की जिम्मेदारी केवल लोकप्रिय होना नहीं, बल्कि सही दिशा देना भी है।

डॉ. भागवत ने अपने संबोधन में स्वदेशी आर्थिक मॉडल पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि वैश्विक परस्पर निर्भरता आज की सच्चाई है, लेकिन यह मजबूरी या किसी प्रकार के टैरिफ दबाव का परिणाम नहीं होनी चाहिए। भारत को स्थानीय उत्पादन, सीमित आयात और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ना होगा। उन्होंने सरल उदाहरण देते हुए कहा, “जब शिकंजी बन सकती है तो कोला क्यों?” उनके अनुसार, स्थानीय उत्पाद न केवल अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास भी बढ़ाते हैं।

उन्होंने परिवारों से अपील की कि वे अपने दैनिक जीवन में स्वदेशी को अपनाएं। भाषा, पहनावा, भोजन, पर्यटन और घरेलू उपयोग की वस्तुओं में भारतीय विकल्पों को प्राथमिकता दें। भारतीय भाषाएं बोलें, पारंपरिक वस्त्र पहनें, देश के पर्यटन स्थलों की यात्रा करें और प्लास्टिक का उपयोग कम करें। डॉ. भागवत ने कहा, “भारत में उत्पादन करो, नवाचार करो और दुनिया को अपने पास आने दो।” उनके अनुसार, यही आत्मनिर्भर और सशक्त भारत का मार्ग है।

इस भव्य कार्यक्रम में अभिनेता सलमान खान, रणबीर कपूर, हेमा मालिनी, गायिका अनुराधा पौडवाल, अभिनेत्री पूनम ढिल्लों सहित कई कलाकार, वैज्ञानिक, उद्योगपति और सामाजिक क्षेत्र की प्रमुख हस्तियां उपस्थित रहीं। आरएसएस की सौ वर्षों की यात्रा पर केंद्रित यह आयोजन न केवल अतीत की उपलब्धियों पर चिंतन का अवसर बना, बल्कि आने वाले समय के लिए संगठन की दिशा और दृष्टि को भी स्पष्ट करता नजर आया।