यूपी पंचायत चुनाव लटकने के आसार, आरक्षण से लेकर 2027 की राजनीति तक बड़ा खेल

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पंचायत चुनाव तारीखों को लेकर सस्पेंस और चुनावी माहौल

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में वर्ष 2026 में प्रस्तावित पंचायत चुनावों को लेकर तस्वीर अभी साफ होती नहीं दिख रही है। भले ही आधिकारिक तौर पर चुनाव इसी वर्ष कराए जाने की तैयारी मानी जा रही हो, लेकिन प्रशासनिक प्रक्रियाओं और सियासी गणनाओं को देखते हुए इसके टलने की आशंका एक बार फिर गहराने लगी है। जानकारों का कहना है कि पंचायत चुनाव अपने तय समय से आगे खिसक सकते हैं, जैसा कि वर्ष 2021 में कोरोना संक्रमण के चलते देखने को मिला था, जब मई में चुनाव कराए गए थे और पूरी प्रक्रिया में काफी देरी हुई थी।

दरअसल, हर पंचायत चुनाव से पहले पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन एक अनिवार्य प्रक्रिया होती है। इसी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ग्राम पंचायत, नगर पंचायत और जिला पंचायतों में आरक्षण तय किया जाता है। यह प्रक्रिया केवल औपचारिकता नहीं होती, बल्कि इसमें कई चरण शामिल रहते हैं। पहले आरक्षण की अनंतिम सूची जारी की जाती है, फिर आपत्तियां मांगी जाती हैं और उनके निस्तारण के बाद अंतिम सूची प्रकाशित होती है। आरक्षण निर्धारण की यह पूरी कवायद आमतौर पर तीन से पांच महीने का समय लेती है।

विशेषज्ञों का आकलन है कि यदि मार्च 2026 में भी पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन होता है, तो आरक्षण से जुड़ी समूची प्रक्रिया पूरी होते-होते जुलाई 2026 तक का वक्त लग सकता है। ऐसे में पंचायत चुनाव अप्रैल-मई के बजाय सितंबर या अक्टूबर 2026 तक टल सकते हैं। यही बिंदु प्रदेश की सियासत में नई उलझन पैदा कर रहा है, क्योंकि इसके कुछ ही महीनों बाद जनवरी-फरवरी 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं।

यही वजह है कि विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव होना सियासी दलों के लिए एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है। पंचायत चुनाव को सत्ता का सेमीफाइनल कहा जाता है, जहां जमीनी स्तर पर दलों की ताकत और संगठन की असल स्थिति सामने आ जाती है। यदि पंचायत चुनाव सितंबर-अक्टूबर 2026 में होते हैं, तो राजनीतिक दलों को विधानसभा चुनाव की ठोस तैयारियों के लिए बेहद कम समय मिलेगा। इसके अलावा पंचायत चुनावों में टिकट बंटवारे और स्थानीय समीकरणों को लेकर अक्सर दलों की अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ जाती है, जिसका असर अगले बड़े चुनाव पर पड़ सकता है।

पिछले अनुभव बताते हैं कि पंचायत चुनाव के दौरान हर बड़े दल को भीतरघात, बगावत और असंतोष का सामना करना पड़ा है। ऐसे में पंचायत चुनाव के तुरंत बाद विधानसभा चुनाव में उतरना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा। इसी कारण यह कयास लगाए जा रहे हैं कि राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर पंचायत चुनावों को विधानसभा चुनाव के बाद कराने का विकल्प भी गंभीरता से सोचा जा रहा है।

जानकारों की मानें तो यूपी में पंचायत चुनावों की प्रक्रिया 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद शुरू हो सकती है। सूत्रों के अनुसार पंचायत और नगर निकाय चुनाव एक साथ, लेकिन अलग-अलग चरणों में कराए जा सकते हैं। यानी एक तरफ ग्रामीण क्षेत्रों में प्रधान और जिला पंचायत सदस्य चुने जाएंगे, तो दूसरी ओर शहरी इलाकों में चेयरमैन और मेयर के चुनाव होंगे। यह प्रक्रिया वर्ष 2027 के अंत या फिर 2028 में पूरी हो सकती है, जिसे उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की दिशा में एक बड़े प्रयोग के तौर पर भी देखा जा रहा है।

हालांकि पंचायत चुनाव समय पर होंगे या विधानसभा चुनाव से ठीक पहले या बाद, इस पर फिलहाल न तो कोई राजनीतिक दल खुलकर बोलने को तैयार है और न ही प्रशासनिक अधिकारी। इतना जरूर तय माना जा रहा है कि यदि पंचायत चुनाव निर्धारित समय पर नहीं हो पाते हैं, तो गांव की सरकार का संचालन अगले चुनाव तक प्रशासकीय व्यवस्था के तहत होगा। ऐसी स्थिति में ग्राम पंचायतों और जिला पंचायतों की कमान सचिवों और प्रशासक के रूप में जिलाधिकारियों के हाथ में रहेगी। यही कारण है कि पंचायत चुनावों की तारीख और समय को लेकर असमंजस अब भी बना हुआ है और प्रदेश की राजनीति में यह मुद्दा आने वाले महीनों में और ज्यादा चर्चा का केंद्र बन सकता है।