वाराणसी के रामनगर में ऐतिहासिक रामलीला का शुभारंभ हो गया है। यह रामलीला 228 साल पुरानी है और यूनेस्को की इंटेंजिबल हेरिटेज सूची में शामिल है। इसकी खासियत यह है कि करीब 10 किलोमीटर के दायरे में 40 अलग अलग खुले मंचों पर इसका मंचन होता है। इसे दुनिया की सबसे बड़ी रामलीला माना जाता है और पूरे एक महीने तक चलने वाले इस आयोजन को देखने के लिए देश विदेश से पांच लाख से अधिक श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं।
मुख्य प्रसंगों वाले दिनों में यहां दर्शकों की संख्या एक लाख से ऊपर पहुंच जाती है। इसे बनारस के लक्खा मेले के रूप में भी जाना जाता है। इसकी पूरी स्क्रिप्ट तुलसीदास के रामचरितमानस पर आधारित है। इसकी रचना और स्क्रिप्टिंग 1820 में काशी राज आदित्य नारायण सिंह के पुत्र ईश्वरी नारायण सिंह और प्रख्यात साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र ने की थी। इस बार मंचन में राम के जनकपुरी पहुंचने से लेकर धनुषयज्ञ और परशुराम संवाद तक के प्रसंग शामिल किए गए।
रामनगर की रामलीला अपनी प्राचीनता और परंपरा के लिए जानी जाती है। आधुनिक साधनों के इस दौर में भी यहां माइक, लाइट और साउंड सिस्टम का उपयोग नहीं किया जाता। मंचन मशाल और पंच लाइट की रोशनी में होता है और कलाकार अपने संवाद ऊंची आवाज में बोलते हैं। दर्शक मंच के साथ साथ रामचरितमानस का पाठ करते रहते हैं, जिससे बिना लाउडस्पीकर के भी पूरा माहौल जीवंत बना रहता है।
रामनगर के लोग इस आयोजन के लिए पूरे महीने की तैयारी करते हैं। श्रद्धालु साफ सुथरे कपड़े पहनकर, हाथ में रामचरितमानस की किताब और एक टॉर्च लेकर लीला देखने पहुंचते हैं। इस आयोजन का शाही ठाट भी देखने योग्य होता है। काशी नरेश अनंत नारायण सिंह परंपरा के अनुसार हाथी पर सवार होकर प्रतिदिन रामलीला के मंचन का साक्षी बनने आते हैं और पूरे एक महीने तक इस आयोजन का हिस्सा रहते हैं।
पांचवें दिन धनुषयज्ञ का मंचन हुआ जिसमें भारी भीड़ उमड़ी। जब कोई भी राजा शिव के धनुष को हिला भी न सका तब जनक दुखी होकर बोले कि धरती वीरों से खाली हो चुकी है। उनके कटु वचनों से लक्ष्मण क्रोधित हो उठे। तभी मुनि विश्वामित्र ने राम को संकेत दिया और राम ने क्षण भर में धनुष उठाकर डोरी चढ़ा दी और उसे तोड़ दिया। इसी के साथ आकाश में देवगणों ने पुष्प वर्षा कर इस अलौकिक क्षण का आनंद उठाया। इसके बाद सीता ने राम के गले में जयमाल डाल दी और विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं।
मंचन में परशुराम का आगमन और उनका क्रोध भी दिखाया गया। लक्ष्मण और परशुराम के बीच संवाद के बाद राम ने परशुराम का धनुष उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ाई, जिससे परशुराम को विश्वास हो गया कि राम कोई साधारण मनुष्य नहीं बल्कि भगवान का अवतार हैं। उन्होंने राम से क्षमा मांगी और उनकी जय जयकार कर लौट गए।
धनुषयज्ञ की इस लीला को देखने के लिए चालीस हजार से अधिक श्रद्धालु पहुंचे। शाम के समय जनकपुर की ओर जाने वाले सभी मार्ग लोगों से भर गए थे। मंच पर जैसे ही प्रसंग शुरू हुआ पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया और लोग मंत्रमुग्ध होकर इस दृश्य को निहारते रहे।
रामनगर की यह रामलीला आज भी प्राचीन परंपरा को जीवंत रखे हुए है। यहां का हर दृश्य दर्शकों को न केवल धार्मिक आस्था से जोड़ता है बल्कि भारतीय संस्कृति और विरासत की गहराई को भी महसूस कराता है।
वाराणसी: रामनगर में 228 साल पुरानी यूनेस्को-मान्यता प्राप्त रामलीला का भव्य शुभारंभ

वाराणसी के रामनगर में 228 साल पुरानी, यूनेस्को-मान्यता प्राप्त ऐतिहासिक रामलीला का शुभारंभ हुआ, जो अपनी प्राचीन परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है।
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