Mon, 17 Nov 2025 13:53:57 - By : Palak Yadav
वृंदावन में सनातन एकता पदयात्रा रविवार को ऐसे क्षणों की साक्षी बनी, जिन्हें देखकर श्रद्धालु ही नहीं बल्कि पदयात्रा में शामिल संत भी भावुक हो उठे। बागेश्वर धाम पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने जैसे ही ब्रज की धरा पर कदम रखा, उनके भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। उन्होंने भूमि पर दंडवत होने के बाद ब्रज की रज को अपने माथे से लगाया और अपने शरीर पर समेट लिया। इस दृश्य ने हजारों पदयात्रियों की आंखें नम कर दीं। वातावरण में भक्ति, उत्साह और भावनाओं की अनोखी लहर फैल गई।
जैंत से शुरू हुई यह यात्रा जैसे ही वृंदावन की ओर बढ़ी, मार्ग के दोनों ओर लोग संत का स्वागत करने के लिए खड़े दिखाई दिए। कोई पेड़ पर चढ़कर उन्हें देख रहा था, कोई मकानों की छत पर पहुंचकर हाथ हिला रहा था। जिस दिशा से आवाज आती, धीरेंद्र शास्त्री उसी ओर मुड़कर हाथ जोड़ते और आशीर्वाद देते। पदयात्रा में भक्तों की इतनी बड़ी संख्या उनके पीछे चल रही थी कि पूरा मार्ग भक्ति गीतों और जयघोष से गूंजता रहा।
छटीकरा के पास जब यात्रा पहुंची, तब ऊंची अटरियों पर खड़े लोगों ने नारे लगाते हुए उनका स्वागत किया। इस प्रेम को देखकर शास्त्री बार बार भावुक होते रहे। हाथ हिलाते हुए उनकी आंखों से आंसू बह निकले। इसके बाद जैसे ही यात्रा वृंदावन के प्रवेश मार्ग की ओर बढ़ी, जहां मेरो वृंदावन का द्वार लिखा है, वहां उन्होंने कथावाचक पुंडरीक गोस्वामी और अन्य संतों के साथ दंडवत किया और ब्रज की रज को अपने माथे और कंधों पर लगाया। सभी ने मिलकर बांकेबिहारी के जयकारे लगाए और आगे के मार्ग पर चल दिए।
समापन कार्यक्रम में ये भावनाएं और अधिक प्रकट हुईं। मंच पर बैठकर जब धीरेंद्र शास्त्री ब्रजवासियों का आभार व्यक्त कर रहे थे, उनका स्वर रुक गया और वह बोलते बोलते रो पड़े। उन्होंने मंच पर ही दंडवत होकर ब्रजवासियों को प्रणाम किया। उनके अनुयायी और उपस्थित श्रद्धालु भी इस क्षण को देखकर भावुक हो उठे। कई लोग मंच के सामने हाथ जोड़कर खड़े रहे और कुछ ने अपनी आंखें पोंछते हुए कहा कि इतने बड़े संत को इस तरह समर्पित भाव से रोते हुए देखना स्वयं एक आध्यात्मिक अनुभव जैसा था।
छतरपुर से आए उनके अनुयायी वीरेंद्र सिंह ने बताया कि धीरेंद्र शास्त्री का यह भाव उनके व्यक्तित्व की विनम्रता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने गुरु को रोते देखा तो वह भी अपने आंसू नहीं रोक सके। उन्होंने कहा कि ब्रज की रज और ब्रजवासियों के प्रति उनका यह समर्पण देखने योग्य था।
पूरी पदयात्रा में जिस तरह का भावनात्मक वातावरण बना, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि यह यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि संत और श्रद्धालुओं के बीच गहरे आत्मिक संबंध का एक प्रतीक भी है। पदयात्रा के आगे बढ़ने के साथ भक्तों की भीड़ और बढ़ने की संभावना है, क्योंकि वृंदावन की गलियों में भक्ति का ऐसा संगम कम ही देखने को मिलता है।