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Varanasi

वाराणसी: संकट मोचन संगीत समारोह का 103वां वर्ष, परंपरा से आधुनिकता तक का सफर

Pradyumn Kant Patel Editorial Staff Manager News Report Newspaper
Last updated: 07/04/2026 16:24
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Pradyumn Kant Patel
Pradyumn Kant Patel Editorial Staff Manager News Report Newspaper
ByPradyumn Kant Patel
Pradyumn Kant Patel is the Editorial Staff Manager at News Report, a registered Hindi newspaper. He oversees newsroom operations, editorial workflows, and content quality standards, ensuring...
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6 Min Read
वाराणसी में संकट मोचन संगीत समारोह का मंच और कलाकार प्रदर्शन करते हुए
103 वर्षों से जारी वाराणसी के प्रतिष्ठित संकट मोचन संगीत समारोह का दृश्य।
Contents
  • 103 वर्षों की विरासत: संकट मोचन संगीत समारोह का अद्भुत सफर, परंपरा से आधुनिकता तक
  • एक दिवसीय आयोजन से छह दिवसीय महोत्सव तक
  • परंपरा में बदलाव और समावेशिता की नई शुरुआत
  • मुस्लिम कलाकारों की भागीदारी से बढ़ी विविधता
  • मंच का विकास और बदलते स्वरूप
  • देश-विदेश के कलाकारों की भागीदारी
  • संगीत और भक्ति का अद्भुत संगम
  • डिजिटल युग में भी कायम है आकर्षण
  • भारतीय संस्कृति का जीवंत प्रतीक

103 वर्षों की विरासत: संकट मोचन संगीत समारोह का अद्भुत सफर, परंपरा से आधुनिकता तक

वाराणसी का प्रतिष्ठित संकट मोचन संगीत समारोह आज अपने 103वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। वर्ष 1923 में एक साधारण पहल के रूप में शुरू हुआ यह आयोजन आज अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सांस्कृतिक उत्सव बन चुका है। हर वर्ष हनुमत जयंती के अवसर पर आयोजित होने वाला यह समारोह संगीत प्रेमियों के लिए आस्था, कला और परंपरा का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है।

एक दिवसीय आयोजन से छह दिवसीय महोत्सव तक

शुरुआती दौर में यह समारोह केवल एक दिन का होता था, जो रामायण सम्मेलन के अंतिम दिन आयोजित किया जाता था। लगभग चार दशकों तक यह परंपरा जारी रही। लेकिन समय के साथ कलाकारों और श्रोताओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए इसे विस्तार दिया गया और आज यह छह दिवसीय भव्य आयोजन बन चुका है।

महंत प्रो. विश्वम्भरनाथ मिश्र के अनुसार, कलाकारों की बढ़ती संख्या के कारण कार्यक्रम की अवधि बढ़ानी पड़ी। आज स्थिति यह है कि यदि इसे सप्ताह भर भी आयोजित किया जाए, तब भी सभी कलाकारों को मंच देना संभव नहीं हो पाता।

परंपरा में बदलाव और समावेशिता की नई शुरुआत

संकट मोचन संगीत समारोह ने समय के साथ न केवल अपनी अवधि बढ़ाई, बल्कि अपने स्वरूप में भी व्यापक परिवर्तन किए। प्रारंभ में केवल पुरुष कलाकारों की भागीदारी होती थी, लेकिन 1977 में कंकना बनर्जी ने अपने गुरु प्रताप नारायण मिश्र के साथ मंच साझा कर इस परंपरा को बदला।

इसके बाद 1987 में उमा शर्मा के कथक नृत्य के साथ नृत्य विधाओं का समावेश हुआ। उसी वर्ष संयुक्ता पाणिग्रही ने ओडिसी नृत्य प्रस्तुत किया। आगे चलकर बिरजू महाराज और स्वप्न सुंदरी जैसे महान कलाकारों ने भी इस मंच की शोभा बढ़ाई।

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मुस्लिम कलाकारों की भागीदारी से बढ़ी विविधता

इस समारोह की विशेषता इसकी समावेशी परंपरा भी है। 1997-98 में मुमताज अहमद, जो उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के भांजे हैं, पहले मुस्लिम कलाकार के रूप में इस मंच पर शहनाई वादन करने आए। इससे पहले स्वयं भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां भी इस पावन मंच पर अपनी प्रस्तुति दे चुके थे।

मंच का विकास और बदलते स्वरूप

समारोह के मंच का स्वरूप भी समय के साथ बदलता रहा। प्रारंभ में यह आयोजन मंदिर के गर्भगृह के सामने ड्योढ़ी पर होता था। बाद में 1948 में कुएं की जगत पर मंच बनाया गया। 1962 में मंच को मंदिर के दक्षिणी हिस्से में स्थानांतरित किया गया और 1971 से आज तक कार्यक्रम वहीं आयोजित किया जा रहा है।

देश-विदेश के कलाकारों की भागीदारी

1962 के बाद इस मंच पर बाहरी कलाकारों की भागीदारी शुरू हुई। पंडित जसराज के बड़े भाई मणि राम ने पहली बार प्रस्तुति दी। इसके बाद वीजी जोग जैसे कलाकारों ने वायलिन वादन से समारोह को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

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आज यह मंच देश-विदेश के कलाकारों के लिए प्रतिष्ठा का प्रतीक बन चुका है। कलाकार यहां प्रस्तुति को केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव मानते हैं।

संगीत और भक्ति का अद्भुत संगम

इस समारोह की सबसे बड़ी विशेषता इसका आध्यात्मिक स्वरूप है। हनुमान जी के दरबार में प्रस्तुत होने वाली हर कला साधना का रूप ले लेती है। कलाकार इसे अपनी श्रद्धा और भक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

पद्मविभूषण पंडित हरिप्रसाद चौरसिया ने भी यह संकल्प लिया है कि जब तक उनके शरीर में प्राण हैं, वे इस समारोह में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहेंगे। उनके अनुसार, यहां प्रस्तुति देने से उन्हें हर बार नई ऊर्जा प्राप्त होती है।

डिजिटल युग में भी कायम है आकर्षण

आज के डिजिटल युग में यह समारोह केवल स्थल तक सीमित नहीं रहा। अब लोग इसे इंटरनेट, यूट्यूब और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से भी देख और सुन रहे हैं। इसके बावजूद मंदिर परिसर में जुटने वाले श्रोताओं की संख्या में कोई कमी नहीं आई है।

शाम होते ही मंदिर परिसर के हर कोने—दक्षिणी मंच, परिक्रमा मार्ग और कुएं के चबूतरे तक—संगीत प्रेमियों से भर जाते हैं। लोग दरियों पर बैठकर पूरी रात संगीत का आनंद लेते हैं।

भारतीय संस्कृति का जीवंत प्रतीक

संकट मोचन संगीत समारोह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत, नृत्य और संस्कृति की जीवंत विरासत है। यह समारोह न केवल कलाकारों को मंच प्रदान करता है, बल्कि श्रोताओं को भी एक अद्वितीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अनुभव देता है।

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103 वर्षों का यह सफर इस बात का प्रमाण है कि परंपरा और परिवर्तन के संतुलन के साथ कोई भी सांस्कृतिक आयोजन समय की कसौटी पर खरा उतर सकता है। संकट मोचन संगीत समारोह आज भी उसी श्रद्धा, भक्ति और उत्कृष्टता के साथ आगे बढ़ रहा है।

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