वाराणसी के रामनगर में निकली संत रविदास समरसता संकल्प एवं कलश वंदन यात्रा
वाराणसी: रामनगर स्थित नई बस्ती बघेली टोला में मंगलवार को संत शिरोमणि गुरु रविदास की छह सौ पचासवीं जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में समरसता संकल्प एवं कलश वंदन यात्रा का आयोजन किया गया। यात्रा का शुभारंभ नई बस्ती स्थित संत रविदास मंदिर से भारतीय जनता पार्टी की मंडल मंत्री मंजू देवी के नेतृत्व में हुआ। धार्मिक आस्था और सामाजिक समरसता का संदेश लेकर निकली इस यात्रा में बड़ी संख्या में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ रैदासी समाज की महिलाओं ने सिर पर कलश धारण कर भागीदारी की। श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा था। यात्रा रामनगर के विभिन्न प्रमुख मंदिरों और मार्गों से होकर बनारस के लिए रवाना हुई। पूरे मार्ग में श्रद्धालुओं ने संत रविदास के बताए मार्ग पर चलने का संकल्प दोहराया और सामाजिक एकता का संदेश दिया।
समरसता और सामाजिक एकता का दिया गया संदेश
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि संत गुरु रविदास केवल एक संत या भक्त कवि नहीं थे बल्कि भारतीय समाज में समानता सामाजिक न्याय और मानवता के सबसे बड़े प्रवक्ताओं में उनकी गणना होती है। उन्होंने अपने जीवन और वाणी के माध्यम से यह संदेश दिया कि मनुष्य की पहचान उसके जन्म से नहीं बल्कि उसके कर्म और चरित्र से होती है। समाज में व्याप्त ऊंच नीच जाति भेद और भेदभाव के विरुद्ध उन्होंने जीवन भर आवाज उठाई और प्रेम भाईचारे तथा समरसता को सर्वोच्च स्थान दिया। यही कारण है कि आज भी उनके विचार समाज को नई दिशा देने का कार्य कर रहे हैं।
कौन थे संत शिरोमणि गुरु रविदास
संत गुरु रविदास का जन्म काशी में माना जाता है। वे भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतों में शामिल रहे और उन्होंने अपनी सहज सरल वाणी के माध्यम से समाज को आत्मिक शांति और सामाजिक समानता का संदेश दिया। उनकी रचनाएं आज भी गुरु ग्रंथ साहिब सहित अनेक धार्मिक ग्रंथों में स्थान रखती हैं। संत रविदास ने अपने जीवन में यह सिद्ध किया कि ईश्वर की भक्ति के लिए किसी बाहरी आडंबर या ऊंचे पद की आवश्यकता नहीं बल्कि निर्मल मन और सच्चे आचरण की जरूरत होती है। उनका जीवन संघर्ष सेवा समर्पण और मानव कल्याण का अद्भुत उदाहरण माना जाता है।
मन चंगा तो कठौती में गंगा का गहरा संदेश
संत रविदास का सबसे प्रसिद्ध संदेश मन चंगा तो कठौती में गंगा आज भी लोगों के जीवन को नई प्रेरणा देता है। इस वाक्य का अर्थ यह है कि यदि मन पवित्र और विचार श्रेष्ठ हों तो ईश्वर हर स्थान पर विद्यमान हैं। बाहरी दिखावे से अधिक महत्व मन की शुद्धता और अच्छे कर्मों का है। संत रविदास ने लोगों को सिखाया कि सच्ची पूजा वही है जिसमें सेवा करुणा दया सत्य और प्रेम का भाव हो। उन्होंने बताया कि मानव सेवा ही ईश्वर सेवा का सर्वोच्च स्वरूप है।
संत रविदास के विचार आज भी समाज के लिए प्रासंगिक
संत रविदास ने एक ऐसे समाज की कल्पना की थी जहां किसी प्रकार का भेदभाव न हो और प्रत्येक व्यक्ति को समान सम्मान प्राप्त हो। उन्होंने बेगमपुरा की अवधारणा प्रस्तुत की जो एक ऐसे आदर्श समाज का प्रतीक है जहां किसी प्रकार का भय अन्याय कर या भेदभाव न हो। उनके विचार आज भी सामाजिक समरसता राष्ट्रीय एकता और मानव मूल्यों को मजबूत करने की प्रेरणा देते हैं। शिक्षा सेवा सदाचार और समान अवसर का संदेश उनके जीवन दर्शन का प्रमुख आधार रहा है।
धार्मिक आस्था के साथ सांस्कृतिक उत्साह भी दिखा
रामनगर से निकली इस कलश वंदन यात्रा में महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में सिर पर कलश धारण कर पूरे उत्साह के साथ भाग लिया। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं ने संत रविदास के भजनों और उनके संदेशों का स्मरण किया। नगर के विभिन्न स्थानों पर लोगों ने यात्रा का स्वागत किया। धार्मिक वातावरण के बीच समाज में भाईचारा और एकता का संदेश प्रमुख रूप से दिखाई दिया।
इन लोगों की रही प्रमुख उपस्थिति
कार्यक्रम में भारतीय जनता पार्टी मंडल अध्यक्ष प्रीति सिंह, डॉ. अनुपम गुप्ता, जितेंद्र पांडे, पार्षद प्रतिनिधि मनोज यादव, राजकुमार सिंह, गौरव गुप्ता, वंश नारायण, अजय कुमार, आशीष कुमार, दुर्गा साहनी, केसरी देवी, इंद्रावती, विक्की सोनकर, उषा देवी, सुमन देवी, जयप्रकाश, अशोक कुमार सहित बड़ी संख्या में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता और श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने संत रविदास के बताए मार्ग पर चलने तथा समाज में समरसता सद्भाव और समानता को मजबूत करने का संकल्प व्यक्त किया।
वाराणसी की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा आयोजन
काशी संतों और आध्यात्मिक परंपराओं की भूमि रही है। संत गुरु रविदास का जीवन और उनकी शिक्षाएं वाराणसी की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती हैं। रामनगर में आयोजित समरसता संकल्प एवं कलश वंदन यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सामाजिक जागरूकता और राष्ट्रीय एकता का संदेश देने वाला कार्यक्रम भी रही। श्रद्धालुओं का मानना है कि संत रविदास के विचार वर्तमान समय में भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके जीवनकाल में थे और उनका संदेश आने वाली पीढ़ियों को भी समानता सेवा और मानवता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता रहेगा।
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