ममता, वात्सल्य और संतान कल्याण की अधिष्ठात्री मां स्कंदमाता की आराधना में लीन हुए भक्त
वाराणसी। धर्म, अध्यात्म और सनातन संस्कृति की प्राचीन नगरी काशी में शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की आराधना का विशेष महत्व रहा। इस पावन अवसर पर देवी के दर्शन और पूजन के लिए श्रद्धालुओं में उत्साह देखने को मिला। भक्तों ने मां के चरणों में पुष्प, नारियल, चुनरी और पूजन सामग्री अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्य, शांति और मंगलमय जीवन की कामना की। मंदिरों में देवी जयकारों, घंटियों की ध्वनि और मंत्रोच्चार के बीच भक्तिमय वातावरण देखने को मिला। नवरात्रि के इस दिन मां स्कंदमाता की उपासना के साथ श्रद्धालुओं ने मातृत्व, करुणा और शक्ति के दिव्य स्वरूप का स्मरण किया।
काशी की धार्मिक परंपरा में नवरात्रि का विशेष स्थान है। यहां मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना शक्ति, श्रद्धा, साधना और आत्मिक शुद्धि से जुड़ी मानी जाती है। नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी अपने भक्तों पर ममता और करुणा की कृपा बरसाती हैं। श्रद्धालु मां के समक्ष शीश झुकाकर अपने परिवार, बच्चों और समाज के कल्याण की प्रार्थना करते हैं। मां की आराधना को जीवन में साहस, विवेक, धैर्य और सकारात्मकता अपनाने की प्रेरणा से भी जोड़ा जाता है।
मां स्कंदमाता का दिव्य स्वरूप: ममता की गोद में विराजते हैं भगवान कार्तिकेय
मां दुर्गा के नौ स्वरूपों में पांचवां स्वरूप मां स्कंदमाता का है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कुमार कार्तिकेय को स्कंद नाम से भी जाना जाता है। भगवान स्कंद की माता होने के कारण देवी पार्वती के इस स्वरूप को स्कंदमाता कहा जाता है। मां का स्वरूप मातृत्व, करुणा, शक्ति और निर्भयता का प्रतीक माना जाता है। उनकी गोद में बालरूप में विराजमान भगवान स्कंद का स्वरूप भक्तों को यह संदेश देता है कि शक्ति का अर्थ केवल पराक्रम नहीं, बल्कि अपने बच्चों और समस्त सृष्टि के प्रति प्रेम, संरक्षण और जिम्मेदारी का भाव भी है।
मां स्कंदमाता की प्रतिमा में सामान्यतः उन्हें चार भुजाओं के साथ दर्शाया जाता है। उनके दो हाथों में कमल पुष्प सुशोभित रहते हैं, एक हाथ में बालरूप भगवान स्कंद विराजमान होते हैं और दूसरा हाथ आशीर्वाद देने की मुद्रा में रहता है। देवी का वाहन सिंह है, जिसे साहस, सामर्थ्य और धर्म की रक्षा का प्रतीक माना जाता है। कमल पर विराजमान होने के कारण मां को पद्मासना देवी भी कहा जाता है। उनके स्वरूप में सिंह की शक्ति और बालक को गोद में लिए माता का वात्सल्य एक साथ दिखाई देता है। यही कारण है कि मां स्कंदमाता की आराधना भक्तों के मन में ममता, सुरक्षा और आत्मविश्वास का भाव जगाती है।
पौराणिक कथा: भगवान स्कंद ने किया तारकासुर का संहार
पौराणिक मान्यताओं में मां स्कंदमाता के स्वरूप का संबंध देवताओं और असुरों के संघर्ष से जुड़ा हुआ है। कथा के अनुसार, तारकासुर नामक शक्तिशाली असुर ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों हो सकेगा। तारकासुर को विश्वास था कि भगवान शिव तपस्या में लीन हैं और उनके विवाह तथा संतान उत्पन्न होने की संभावना नहीं है। इसी विश्वास के कारण वह स्वयं को अजेय समझने लगा और देवताओं सहित अन्य लोकों में अत्याचार करने लगा।
तारकासुर के अत्याचारों से परेशान देवताओं ने भगवान शिव की शरण ली। सृष्टि के कल्याण के लिए भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ, जिसके बाद भगवान स्कंद अर्थात कुमार कार्तिकेय का प्राकट्य हुआ। बड़े होने पर भगवान कार्तिकेय ने देवसेना का नेतृत्व किया और तारकासुर के विरुद्ध युद्ध कर उसका वध किया। इस प्रकार देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्ति मिली। यह पौराणिक प्रसंग धर्म की रक्षा, अन्याय के विरोध और लोककल्याण के महत्व को रेखांकित करता है।
इसी धार्मिक परंपरा में माता पार्वती के उस मातृस्वरूप की विशेष महिमा बताई गई है, जिसमें वे अपने पुत्र स्कंद को गोद में धारण करती हैं। मां स्कंदमाता का स्वरूप इस बात का प्रतीक है कि मातृत्व केवल स्नेह तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह साहस, संस्कार और धर्म की रक्षा की प्रेरणा भी देता है। यह कथा श्रद्धालुओं को कर्तव्य निभाने, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और परिवार के साथ-साथ समाज के कल्याण के लिए कार्य करने का संदेश देती है।
काशी के जैतपुरा में मां बागेश्वरी देवी का प्रसिद्ध दरबार
वाराणसी की नवदुर्गा परंपरा में जैतपुरा क्षेत्र स्थित मां बागेश्वरी देवी मंदिर को मां स्कंदमाता के प्रमुख दर्शन स्थलों में गिना जाता है। यह देवी स्थल काशी की प्राचीन धार्मिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की आराधना के अवसर पर श्रद्धालु देवी के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि और मंगल की कामना करते हैं। काशी में नौ दिनों तक मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। इस परंपरा में पंचमी तिथि पर मां स्कंदमाता की उपासना का विशेष स्थान है।
जैतपुरा की पुरानी गलियों में स्थित यह देवी स्थल काशी की जीवंत धार्मिक संस्कृति का हिस्सा है, जहां आस्था और परंपराएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं। मंदिर की पहचान मां बागेश्वरी देवी के नाम से भी जुड़ी हुई है। हालांकि, मंदिर की स्थापना-तिथि और प्राचीन इतिहास से संबंधित सभी विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसके इतिहास को लेकर अप्रमाणित दावों से बचना आवश्यक है। धार्मिक परंपरा में इस देवी स्थल का महत्व श्रद्धालुओं की आस्था और नवरात्रि की उपासना से जुड़ा हुआ है।
काशी में मां स्कंदमाता की आराधना केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि घरों में भी श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा करते हैं। नवरात्रि के पांचवें दिन भक्त मां के समक्ष संतान के कल्याण, परिवार में शांति, बुद्धि-विवेक और आध्यात्मिक उन्नति की कामना करते हैं। देवी के मातृस्वरूप का स्मरण श्रद्धालुओं को प्रेम, सेवा, धैर्य और करुणा जैसे जीवन-मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
मां स्कंदमाता की पूजा विधि: ऐसे करें विधि-विधान से आराधना
नवरात्रि के पांचवें दिन श्रद्धालु प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई कर मां स्कंदमाता की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित की जाती है। दीप प्रज्वलित कर गणेश जी और देवी का स्मरण किया जाता है। कलश स्थापित करने वाले श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार कलश पूजन करते हैं। इसके बाद मां को जल, अक्षत, पुष्प, रोली, चंदन, धूप और दीप अर्पित कर श्रद्धापूर्वक प्रार्थना की जाती है। पूजा में स्वच्छता, एकाग्रता और श्रद्धा को विशेष महत्व दिया जाता है।
मां स्कंदमाता को कमल का पुष्प अर्पित करना शुभ माना जाता है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुसार केले, अन्य फल, मिठाई अथवा खीर का भोग लगा सकते हैं। कुछ धार्मिक परंपराओं में पीले रंग के भोग और वस्त्र का भी उल्लेख मिलता है, हालांकि पूजा सामग्री और भोग की परंपरा परिवारों तथा मंदिरों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। भोग अर्पित करने के बाद मां के मंत्रों का जाप, दुर्गा चालीसा, देवी स्तुति और आरती की जाती है।
पूजा के अंत में श्रद्धालु मां से प्रार्थना करते हैं कि परिवार में सुख-शांति बनी रहे, बच्चों को उत्तम संस्कार मिलें, जीवन में विवेक और धैर्य का विकास हो तथा कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्राप्त हो। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी शारीरिक क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार फलाहार करते हैं। मां स्कंदमाता की पूजा का मूल भाव श्रद्धा, शुद्ध आचरण, करुणा और आत्मसंयम को जीवन में अपनाना है।
मां स्कंदमाता के प्रमुख मंत्र और प्रार्थना श्लोक
मां स्कंदमाता की आराधना में श्रद्धालु विभिन्न मंत्रों और देवी स्तुतियों का पाठ करते हैं। इनमें मां को नमन करने वाला सरल मंत्र और देवी के मातृस्वरूप की स्तुति करने वाले श्लोक प्रमुख हैं। भक्त अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार इनका जाप कर सकते हैं।
मां स्कंदमाता का मंत्र
ॐ देवी स्कन्दमात्रे नमः॥
इस मंत्र का भाव है मां स्कंदमाता को नमन करना। श्रद्धालु पूजा के दौरान एकाग्र मन से इसका जाप कर देवी का ध्यान करते हैं।
मां स्कंदमाता की प्रार्थना
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
इस प्रार्थना का भाव है कि सिंह पर विराजमान, कमल धारण करने वाली यशस्विनी मां स्कंदमाता सदैव भक्तों का कल्याण करें और उन्हें शुभ फल प्रदान करें।
देवी के मातृस्वरूप की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
इस श्लोक का भाव है कि जो देवी समस्त प्राणियों में मातृशक्ति के रूप में विद्यमान हैं, उन्हें बार-बार नमन है। यह स्तुति मां के मातृस्वरूप और समस्त सृष्टि में व्याप्त दिव्य शक्ति का स्मरण कराती है।
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