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काशी में नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की आराधना: महिषासुर मर्दिनी कथा और महत्व

Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
Last updated: 16/10/2026 08:07
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Sandeep Srivastava
Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
BySandeep Srivastava
Sandeep Srivastava serves as a Sub Editor at News Report, a registered Hindi newspaper dedicated to ethical, accurate, and reader-focused journalism. He is responsible for copy...
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12 Min Read
मां कात्यायनी की प्रतिमा, जिसमें देवी सिंह पर सवार, चार भुजाओं में शस्त्र लिए महिषासुर का वध करती दिख रही हैं।
काशी में शारदीय नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की विशेष पूजा की जाती है।
Contents
  • सिंधिया घाट क्षेत्र स्थित मां कात्यायनी देवी के दर्शन का है, विशेष धार्मिक महत्व
  • काशी की नवदुर्गा परंपरा में मां कात्यायनी का स्थान
  • महर्षि कात्यायन की तपस्या से जुड़ी है मां के प्राकट्य की कथा
  • महिषासुर के वध से जुड़ा है महिषासुर मर्दिनी स्वरूप
  • सिंह पर विराजमान मां का दिव्य स्वरूप
  • विवाह संबंधी मंगलकामनाओं के लिए भी होती है पूजा
  • मां कात्यायनी की पूजा विधि
  • मां कात्यायनी का प्रमुख मंत्र
  • विवाह की मंगलकामना से जुड़ा प्रसिद्ध मंत्र
  • देवी स्तुति का प्रसिद्ध श्लोक
  • शक्ति, साहस और सदाचार का संदेश देती हैं मां कात्यायनी

सिंधिया घाट क्षेत्र स्थित मां कात्यायनी देवी के दर्शन का है, विशेष धार्मिक महत्व

वाराणसी। धर्म और अध्यात्म की प्राचीन नगरी काशी में शारदीय नवरात्रि के छठे दिन शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026 को मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की आराधना की जा रही है। सनातन परंपरा में नवरात्रि की षष्ठी तिथि को शक्ति, साहस, आत्मविश्वास और धर्म की रक्षा के संकल्प से जोड़कर देखा जाता है। काशी की पारंपरिक नवदुर्गा दर्शन परंपरा में इस दिन सिंधिया घाट क्षेत्र स्थित मां कात्यायनी देवी के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु देवी के चरणों में शीश झुकाकर परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्य, शांति और मंगलमय भविष्य की कामना करते हैं। नवरात्रि के अवसर पर देवी के नौ स्वरूपों की पूजा भारतीय धार्मिक संस्कृति में शक्ति उपासना की महत्वपूर्ण परंपरा है।

मां कात्यायनी को देवी दुर्गा का तेजस्वी और पराक्रमी स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में उनका स्वरूप अन्याय के विरुद्ध संघर्ष, अधर्म पर विजय और धर्म की रक्षा का प्रतीक है। नवरात्रि के छठे दिन भक्त मां की पूजा-अर्चना के साथ मंत्र जाप, देवी स्तुति और दुर्गा चालीसा का पाठ करते हैं। पूजा के माध्यम से श्रद्धालु अपने जीवन में साहस, धैर्य और सकारात्मकता बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं। मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की वर्तमान संख्या या कतारों की स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है, इसलिए यहां किसी विशेष भीड़ या दर्शन व्यवस्था का अपुष्ट दावा नहीं किया जा रहा है।

काशी की नवदुर्गा परंपरा में मां कात्यायनी का स्थान

काशी में नवरात्रि का पर्व केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्राचीन मंदिरों, देवी दर्शन और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं से भी जुड़ा हुआ है। नवरात्रि के प्रत्येक दिन मां दुर्गा के एक विशेष स्वरूप की आराधना की जाती है। इसी क्रम में षष्ठी तिथि पर मां कात्यायनी के दर्शन किए जाते हैं। सिंधिया घाट क्षेत्र और उसके आसपास स्थित प्राचीन मंदिर काशी की धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। गंगा तट के निकट बसी पुरानी गलियां, मंदिरों की परंपरा और श्रद्धालुओं की आस्था इस क्षेत्र को विशिष्ट धार्मिक पहचान प्रदान करती है।

मां कात्यायनी की आराधना का मूल भाव शक्ति के सदुपयोग और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा से जुड़ा है। भक्तों की मान्यता है कि देवी की उपासना व्यक्ति के भीतर आत्मबल और दृढ़ संकल्प का संचार करती है। नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु मां के सामने दीप प्रज्वलित कर अपने परिवार की कुशलता और जीवन में सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं। देवी की स्तुति और मंत्र जाप के माध्यम से भक्त आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

महर्षि कात्यायन की तपस्या से जुड़ी है मां के प्राकट्य की कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि कात्यायन देवी भगवती के परम उपासक थे। उन्होंने देवी की आराधना करते हुए तपस्या की और उनसे संसार के कल्याण के लिए दिव्य शक्ति के प्राकट्य की कामना की। धार्मिक आख्यानों में वर्णन मिलता है कि देवी ने महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर उनके यहां पुत्री के रूप में प्राकट्य लिया। महर्षि कात्यायन की पुत्री होने के कारण देवी का नाम कात्यायनी पड़ा। इसी मान्यता के आधार पर मां कात्यायनी को श्रद्धा, तपस्या और भक्तों की आस्था से जुड़ा दिव्य स्वरूप माना जाता है।

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मां कात्यायनी की कथा यह संदेश देती है कि श्रद्धा और साधना भारतीय धार्मिक परंपरा के महत्वपूर्ण अंग हैं। देवी का स्मरण करते हुए भक्त अपने जीवन में धैर्य, साहस और सदाचार को अपनाने का संकल्प लेते हैं। नवरात्रि के छठे दिन मां की आराधना को आत्मबल बढ़ाने और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की प्रेरणा के रूप में भी देखा जाता है।

महिषासुर के वध से जुड़ा है महिषासुर मर्दिनी स्वरूप

मां दुर्गा की महिषासुर मर्दिनी के रूप में प्रसिद्धि एक अन्य महत्वपूर्ण पौराणिक प्रसंग से जुड़ी है। धार्मिक आख्यानों के अनुसार, महिषासुर ने अपनी शक्ति के बल पर देवताओं और संसार में अत्याचार फैलाना शुरू कर दिया था। उसके अत्याचारों से परेशान देवताओं ने आदिशक्ति की आराधना की। पौराणिक वर्णन के अनुसार, देवताओं के तेज से देवी शक्ति का प्राकट्य हुआ और उन्होंने महिषासुर के विरुद्ध युद्ध किया। अंततः देवी ने महिषासुर का वध कर देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई।

महिषासुर के संहार के कारण देवी दुर्गा को महिषासुर मर्दिनी कहा जाता है। यह कथा शक्ति और न्याय की विजय का प्रतीक मानी जाती है। मां कात्यायनी के स्वरूप में भी भक्त इसी दिव्य शक्ति, पराक्रम और धर्म की रक्षा के संकल्प का स्मरण करते हैं। इस पौराणिक प्रसंग का व्यापक संदेश यह है कि अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध साहसपूर्वक खड़ा होना आवश्यक है। देवी की आराधना भक्तों को जीवन में नैतिकता, सत्य और सद्कर्मों के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।

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सिंह पर विराजमान मां का दिव्य स्वरूप

मां कात्यायनी की पारंपरिक प्रतिमा में उन्हें चार भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है। उनका वाहन सिंह माना जाता है, जो साहस, निर्भीकता और पराक्रम का प्रतीक है। देवी के हाथों में अस्त्र-शस्त्र तथा कमल पुष्प का वर्णन मिलता है। अस्त्र-शस्त्र दुष्ट शक्तियों के विनाश और धर्म की रक्षा का प्रतीक माने जाते हैं, जबकि कमल पवित्रता और आध्यात्मिक चेतना का संकेत देता है। देवी का यह स्वरूप शक्ति और करुणा के समन्वय का संदेश देता है।

नवरात्रि के दौरान मां कात्यायनी के दर्शन करने वाले श्रद्धालु अपने जीवन में आत्मविश्वास, धैर्य और सकारात्मक सोच बनाए रखने की कामना करते हैं। धार्मिक दृष्टि से देवी का स्वरूप यह प्रेरणा देता है कि शक्ति का उपयोग दूसरों की रक्षा, समाज के कल्याण और न्याय के समर्थन में होना चाहिए।

विवाह संबंधी मंगलकामनाओं के लिए भी होती है पूजा

मां कात्यायनी की आराधना का संबंध विवाह और वैवाहिक जीवन की मंगलकामनाओं से भी जुड़ा है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में ब्रज की गोपियों द्वारा मां कात्यायनी का व्रत किए जाने का प्रसंग मिलता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने की कामना से देवी की पूजा की थी। इसी कारण अनेक श्रद्धालु विवाह संबंधी मंगलकामनाओं और सुखी वैवाहिक जीवन की प्रार्थना के साथ मां कात्यायनी की उपासना करते हैं।

इस परंपरा में मां को श्रद्धा और विश्वास की देवी के रूप में स्मरण किया जाता है। अविवाहित युवक-युवतियां और उनके परिजन देवी के चरणों में मंगलमय वैवाहिक जीवन की कामना करते हैं। हालांकि, मनोकामना की पूर्ति धार्मिक आस्था का विषय है और इसे किसी निश्चित परिणाम की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए। मां की पूजा का व्यापक संदेश जीवन में धैर्य, विवेक, जिम्मेदारी और पारस्परिक सम्मान को महत्व देना भी है।

मां कात्यायनी की पूजा विधि

नवरात्रि की षष्ठी तिथि पर मां कात्यायनी की पूजा करने के लिए सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल की सफाई कर मां दुर्गा के सामने दीप प्रज्वलित करें। इसके बाद रोली, अक्षत, चंदन, पुष्प, धूप, दीप, फल और अपनी श्रद्धा के अनुसार नैवेद्य अर्पित करें। मां कात्यायनी का ध्यान करते हुए उनके मंत्र का जाप करें। पूजा के दौरान दुर्गा चालीसा, देवी स्तुति या दुर्गा सप्तशती का पाठ भी किया जा सकता है। अंत में मां की आरती कर परिवार की सुख-शांति, आरोग्य और मंगल की प्रार्थना करें।

कुछ धार्मिक परंपराओं में मां कात्यायनी को शहद का भोग अर्पित करने की मान्यता है। श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय पूजा पद्धति के अनुसार भोग तथा अन्य सामग्री का चयन कर सकते हैं। व्रत रखने वाले लोगों को अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार ही उपवास करना चाहिए। पूजा में सबसे महत्वपूर्ण भाव श्रद्धा, संयम और सद्कर्मों के प्रति समर्पण का है।

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मां कात्यायनी का प्रमुख मंत्र

मां कात्यायनी की आराधना में इस मंत्र का जाप प्रचलित है। श्रद्धालु पूजा के समय इसका उच्चारण कर देवी का स्मरण कर सकते हैं।

ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥

यह मां कात्यायनी का प्रणाम मंत्र है। भक्त इसे श्रद्धापूर्वक दोहराते हुए देवी से साहस, विवेक और सद्बुद्धि की कामना करते हैं। मंत्र जाप की संख्या व्यक्ति की श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार रखी जा सकती है।

विवाह की मंगलकामना से जुड़ा प्रसिद्ध मंत्र

मां कात्यायनी की पूजा में गोपियों के कात्यायनी व्रत से जुड़ा यह मंत्र भी प्रचलित है।

कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥

इस मंत्र का संबंध श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित गोपियों की धार्मिक परंपरा से है। श्रद्धालु इसे विवाह संबंधी मंगलकामनाओं के साथ पढ़ते हैं। इसका पाठ करते समय मंत्र के धार्मिक संदर्भ और भाव को समझना भी महत्वपूर्ण है।

देवी स्तुति का प्रसिद्ध श्लोक

देवी की आराधना के दौरान दुर्गा सप्तशती में प्रसिद्ध इस स्तुति का पाठ भी किया जाता है।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

इस श्लोक का भाव है कि देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में विद्यमान हैं। यह स्तुति शक्ति के महत्व और देवी के प्रति श्रद्धा को व्यक्त करती है। नवरात्रि के दौरान भक्त इस श्लोक के माध्यम से मां का स्मरण करते हुए अपने जीवन में सकारात्मकता और आत्मबल बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं।

शक्ति, साहस और सदाचार का संदेश देती हैं मां कात्यायनी

मां कात्यायनी की आराधना नवरात्रि की शक्ति उपासना का महत्वपूर्ण अंग है। महिषासुर मर्दिनी की पौराणिक कथा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का संदेश देती है, जबकि गोपियों के कात्यायनी व्रत का प्रसंग देवी के प्रति समर्पण और मंगलकामना की परंपरा को सामने लाता है। काशी की नवदुर्गा दर्शन परंपरा में षष्ठी तिथि पर मां के दर्शन का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। श्रद्धालु देवी के चरणों में शीश झुकाकर परिवार के कल्याण, सुख-शांति और जीवन में सद्बुद्धि की कामना करते हैं।

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