माघी पूर्णिमा के पावन अवसर पर काशी में रविवार को आस्था और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। सूर्य और चंद्र के विशेष योग के कारण यह दिन अत्यंत पुण्यदायी माना गया। तड़के भोर से ही वाराणसी में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। मंगला आरती के साथ ही श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन पूजन का क्रम आरंभ हुआ। सुबह दस बजे तक लगभग दो लाख श्रद्धालुओं ने बाबा विश्वनाथ के दरबार में हाजिरी लगाकर पुण्य लाभ अर्जित किया।
माघ मास की पूर्णिमा को विशेष महत्व प्राप्त है क्योंकि इसे माघी पूर्णिमा कहा जाता है। इस दिन किया गया स्नान दान व्रत और तप पूरे माघ माह के संकल्पों का समाहार माना जाता है। इस वर्ष यह पर्व सूर्य और चंद्र के दुर्लभ संयोग के कारण और भी फलदायी हो गया। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार पूर्णिमा तिथि के स्वामी चंद्रमा होते हैं और रविवार सूर्य का दिन माना जाता है। सूर्य चंद्र का यह योग शास्त्रों में अनंत पुण्य प्रदान करने वाला बताया गया है। इसी कारण इस बार माघी पूर्णिमा का धार्मिक महत्व कई गुना बढ़ गया।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष विनय कुमार पांडेय के अनुसार माघी पूर्णिमा को कलियुगादि तिथि भी कहा जाता है। पौराणिक मान्यता है कि इसी तिथि से कलियुग का आरंभ हुआ था। सामान्यतः इस दिन मघा नक्षत्र का योग रहता है लेकिन इस वर्ष पुष्य नक्षत्र का विशेष संयोग बना है। शास्त्रों में पुष्य नक्षत्र को अत्यंत शुभ माना गया है और इस नक्षत्र में किया गया स्नान दान और पूजन अक्षय पुण्य फल देने वाला माना जाता है।
इस शुभ अवसर पर श्रद्धालुओं ने गंगा नदी में स्नान कर पुण्य अर्जित किया और इसके बाद बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर जीवन में सुख शांति और कल्याण की कामना की। घाटों से लेकर मंदिर परिसर तक भक्तों की लंबी कतारें देखने को मिलीं। माघी पूर्णिमा का यह पर्व काशी की सनातन परंपरा और आध्यात्मिक चेतना को और अधिक प्रगाढ़ करता नजर आया। लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है बल्कि सामाजिक एकता और भारतीय संस्कृति की गहराई का भी सजीव प्रतीक है।
