इलाहाबाद हाई कोर्ट सख्त, पॉक्सो मामले में आरोपी के बरी होने पर राज्य की अपील स्वीकार
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट से जुड़े एक गंभीर मामले में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करते हुए राज्य सरकार की अपील को स्वीकार कर लिया है। यह अपील ट्रायल कोर्ट द्वारा अभियुक्त को बरी किए जाने के खिलाफ दायर की गई थी। हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए न केवल पीठासीन अधिकारी और शिकायतकर्ता को नोटिस जारी किया, बल्कि ट्रायल कोर्ट और अभियोजन के रवैये पर भी कड़ी नाराजगी जताई है।
खंडपीठ ने मांगी ट्रायल कोर्ट से सफाई
यह आदेश न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति डॉ अजय कुमार (द्वितीय) की खंडपीठ ने पारित किया। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के पीठासीन अधिकारी से प्रशासनिक स्तर पर स्पष्टीकरण मांगा है कि उन्होंने साक्ष्य दर्ज करने से संबंधित पूर्व में जारी सर्कुलर और निर्देशों का पालन क्यों नहीं किया।
इसके साथ ही हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का पूरा रिकॉर्ड भी तलब कर लिया है, ताकि मामले की गहराई से समीक्षा की जा सके। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया में लापरवाही या आवश्यक तथ्यों की अनदेखी गंभीर चिंता का विषय है।
निर्णय में अहम तथ्यों की अनदेखी पर नाराजगी
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले को पढ़ने से प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि कई महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज किया गया। विशेष रूप से पीड़िता के शरीर पर पाई गई चोटों का उल्लेख फैसले में नहीं किया गया, जो कि एक महत्वपूर्ण साक्ष्य था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मेडिको-लीगल रिपोर्ट, जो इस प्रकार के मामलों में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, उसका निर्णय में कोई उल्लेख नहीं किया गया। यह न्यायिक प्रक्रिया में गंभीर त्रुटि मानी गई है।
एफएसएल रिपोर्ट और डॉक्टर की गवाही पर भी सवाल
खंडपीठ ने यह भी उल्लेख किया कि एफएसएल रिपोर्ट के अनुसार पीड़िता के अधोवस्त्र पर खून पाया गया था, जो एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है। इसके बावजूद अभियोजन पक्ष ने संबंधित डॉक्टर से इस संबंध में कोई पूछताछ नहीं की।
कोर्ट ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि यह और भी अधिक चिंताजनक है कि ट्रायल कोर्ट ने भी उस डॉक्टर को गवाह के रूप में समन नहीं किया, जिसने मेडिको-लीगल जांच के दौरान पीड़िता के शरीर पर चोटों का परीक्षण किया था।
पुराने सर्कुलर का पालन न करने पर टिप्पणी
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में 1982 और 2002 में जारी किए गए सर्कुलर और निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारियों के लिए यह अनिवार्य है कि वे अपने निर्णयों में घायल व्यक्तियों की चोटों का स्पष्ट उल्लेख करें।
कोर्ट ने कहा कि इन निर्देशों का पालन न करना न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले के अनुसार, कुशीनगर जिले के खड्डा थाना क्षेत्र में कलीम उल्लाह अंसारी के खिलाफ पॉक्सो एक्ट और अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था। इस मामले में विशेष न्यायाधीश पॉक्सो अधिनियम एवं अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, कुशीनगर ने 9 अप्रैल 2025 को अभियुक्त को बरी कर दिया था।
राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में अपील दाखिल की, जिसे अब स्वीकार कर लिया गया है।
अगली सुनवाई 15 अप्रैल को
हाई कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 15 अप्रैल की तिथि निर्धारित की है। इस बीच, कोर्ट द्वारा जारी नोटिस के जवाब और ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड के आधार पर आगे की सुनवाई की जाएगी।
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया में सावधानी, साक्ष्यों के समुचित मूल्यांकन और अभियोजन की जिम्मेदारी को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।
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