गणतंत्र दिवस के अवसर पर जब पूरा देश शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों को नमन करता है तब बिहार के जमुई जिले के सोनो प्रखंड से एक पीड़ादायक तस्वीर सामने आती है। यहां आज भी कई स्वतंत्रता सेनानियों के वंशज गरीबी बेरोजगारी और उपेक्षा के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं। तिरंगे की शान और संविधान की गरिमा के बीच यह सवाल लगातार उठता है कि क्या आजादी की नींव रखने वाले वीरों के परिवार सम्मानजनक जीवन के हकदार नहीं हैं।
सोनो प्रखंड के घुटवे गांव के स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर यमुना प्रसाद 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के अग्रिम पंक्ति के योद्धा थे। उन्होंने भागलपुर जेल में अंग्रेजी हुकूमत की अमानवीय यातनाएं सहीं लेकिन देशभक्ति के संकल्प से कभी पीछे नहीं हटे। बहुभाषाविद यमुना प्रसाद की पहचान राष्ट्रीय स्तर तक थी और उनकी मित्रता देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से रही। दिल्ली प्रवास के दौरान नेहरू द्वारा कुछ मांगने पर उन्होंने पद या संपत्ति नहीं बल्कि नेहरू का ओवरकोट मांगा जिसे परिवार आज भी ऐतिहासिक धरोहर की तरह सहेज कर रखे हुए है।
विडंबना यह है कि इसी गौरवशाली विरासत के बावजूद यमुना प्रसाद के पुत्र कार्यानंद सिंह और मनोज कुमार आज जर्जर मकान और सीमित संसाधनों में खेती बाड़ी के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। जिस परिवार पर देश को गर्व होना चाहिए वही परिवार आज बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है।
स्वतंत्रता संग्राम में कलम के जरिए अंग्रेजी शासन को चुनौती देने वाले जनार्दन प्रसाद उर्फ श्रीकिरण भी सोनो क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण शख्सियत थे। निर्भीक पत्रकारिता के माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की सच्चाई जनता तक पहुंचाई। आज उनका नाम इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गया है और उनके परिवार की स्थिति भी सरकारी और सामाजिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
केंदुआलेवार गांव के बंधु महतो और उनकी पत्नी जीरा देवी ने भी आजादी की लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया। दोनों ने जेल की यातनाएं झेलीं और राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व अर्पित किया। गांव में बंधु महतो की प्रतिमा तो स्थापित है लेकिन उनके वंशज आज भी सरकारी योजनाओं सम्मान और आर्थिक संबल से वंचित हैं।
जब गणतंत्र दिवस पर संविधान की शपथ लेकर जनप्रतिनिधि राष्ट्र को आगे बढ़ाने का संकल्प लेते हैं तब यह प्रश्न और तीखा हो जाता है कि क्या शहीदों का सम्मान केवल समारोह भाषण और प्रतिमाओं तक सीमित रहना चाहिए। क्या स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को सम्मानजनक जीवन देना लोकतंत्र की जिम्मेदारी नहीं है।
सोनो और जमुई के ये उदाहरण केवल कुछ परिवारों की कहानी नहीं बल्कि उस व्यवस्था का आईना हैं जहां बलिदान की स्मृति तो है लेकिन उत्तरदायित्व की कमी साफ नजर आती है। गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराने और देशभक्ति के गीत गाने के साथ अब समय आ गया है कि सरकार और समाज मिलकर इन सेनानियों के वंशजों के लिए ठोस पहल करें। आवास पेंशन शिक्षा सहायता रोजगार और सामाजिक सम्मान की व्यवस्था ही इन वीरों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। तभी गणतंत्र दिवस का उत्सव औपचारिकता से आगे बढ़कर संवैधानिक जिम्मेदारी और मानवीय कर्तव्य का प्रतीक बन सकेगा।
