चंदौली: ट्रेन के आगे कूदकर मां ने मासूम बेटी संग दी जान, गांव में शोक

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Sandeep Srivastava
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चंदौली जिले के बैरी खुर्द गांव में मां-बेटी की आत्महत्या के बाद जांच करती पुलिस टीम

चंदौली: उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है, जिसने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है। धीना थाना क्षेत्र के बैरी खुर्द गांव में शनिवार की काली रात एक परिवार के लिए काल बनकर आई, जहां घरेलू कलह और मुफलिसी की आग में एक मां ने अपनी ममता समेत खुद को मौत के हवाले कर दिया। 27 वर्षीय ज्योति ने अपनी छह साल की मासूम बेटी लाडो को सीने से लगाकर ट्रेन के आगे छलांग लगा दी। पटरियों पर बिखरे हुए उन दो जिस्मों के टुकड़ों ने न केवल एक सुहाग उजाड़ा, बल्कि समाज के उस कड़वे सच को भी उजागर कर दिया जहां नशे की लत और गरीबी मिलकर हंसते-खेलते घरों को श्मशान बना देती है।

घटना की जड़ें उस मटमैले आंगन में छिपी थीं, जहां ज्योति का पति सुक्खू मजदूरी कर परिवार पालने की कोशिश तो करता था, लेकिन उसकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा शराब की भेंट चढ़ जाता था। शनिवार की शाम जब सुक्खू जमानिया के ईंट-भट्ठे से घर लौटा, तो वही पुराना मंजर दोबारा शुरू हो गया। नशे में धुत पति और तंगहाली से जूझती पत्नी के बीच तीखी तकरार हुई।

परिजनों की मानें तो यह विवाद कोई नया नहीं था; ज्योति महीनों से इस घुटन को जी रही थी। उस रात जब विवाद अपनी चरम सीमा पर पहुंचा, तो हार मान चुकी ज्योति ने एक खौफनाक फैसला लिया। उसने अपने तीन साल के बेटे गोलू को घर पर ही छोड़ा और छह साल की लाडो को गोद में लेकर अंधेरे में ओझल हो गई। पति ने पीछे जाने की कोशिश भी की, लेकिन मौत की तरफ बढ़ते उन कदमों को रोक पाना शायद नियति को मंजूर नहीं था।

धीना रेलवे स्टेशन के पास का वह दृश्य इतना भयावह था कि वहां मौजूद लोगों की रूह कांप गई। तेज रफ्तार से आती ट्रेन और उसके सामने मां-बेटी का समर्पण सब कुछ चंद पलों में खत्म हो गया। सूचना मिलते ही धीना थाना प्रभारी दिलीप कुमार श्रीवास्तव दलबल के साथ मौके पर पहुंचे। पुलिस ने जब शवों के अवशेषों को समेटा, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं। रविवार को जब पोस्टमार्टम के बाद शव गांव पहुंचे, तो मानों पूरे इलाके की हवाओं में सिसकियां घुल गईं। मासूम लाडो, जिसे अभी दुनिया देखनी थी, अपनी मां के साथ उस विवाद की बलि चढ़ गई जिसमें उसकी कोई गलती नहीं थी।

पोस्टमार्टम हाउस के बाहर का मंजर पत्थर दिल इंसान को भी रुला देने वाला था। सुक्खू की चीखें रह-रहकर सन्नाटे को चीर रही थीं। वह बार-बार भोजपुरी में यही विलाप कर रहा था, कि “हम जनती कि अइसन करिहन त जाए ना देले रहतीं” (अगर मुझे पता होता कि वह ऐसा कदम उठाएगी, तो मैं उसे कभी जाने नहीं देता)। नौ साल पहले जिस ज्योति का डोला गाजीपुर के मिर्चा गांव से खुशी-खुशी उठा था, आज उसकी अर्थी उठते देख हर कोई सन्न था।

थानाध्यक्ष ने बताया कि शवों को अंतिम संस्कार के लिए परिजनों को सौंप दिया गया है और मायके पक्ष की ओर से तहरीर मिलने का इंतजार है। प्रारंभिक जांच स्पष्ट रूप से पारिवारिक क्लेश और मानसिक तनाव की ओर इशारा कर रही है, लेकिन यह घटना पीछे कई सवाल छोड़ गई है कि आखिर कब तक नशे और कलह की वेदी पर मासूम ‘लाडो’ जैसी जिंदगियां कुर्बान होती रहेंगी।