कानपुर के बहुचर्चित कुशाग्र अपहरण हत्याकांड में 26 महीने के लंबे इंतजार के बाद अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए ट्यूशन टीचर रचिता वत्स, उसके प्रेमी प्रभात शुक्ला और उसके दोस्त आर्यन गुप्ता उर्फ शिवा को दोषी करार दिया है। अदालत ने माना कि तीनों ने मिलकर फिरौती की रकम हासिल करने के उद्देश्य से मासूम कुशाग्र के अपहरण और हत्या की साजिश रची थी। इस मामले में सजा के बिंदु पर बहस पूरी हो चुकी है और अदालत द्वारा डेढ़ घंटे के भीतर अंतिम सजा का ऐलान किए जाने की संभावना जताई गई है। फैसले से पहले ही अदालत परिसर में माहौल बेहद गंभीर और भावुक बना हुआ है।
अभियोजन पक्ष ने अदालत के सामने दलील देते हुए कहा कि भले ही यह हत्या अत्यधिक क्रूरतम श्रेणी में न आती हो लेकिन आरोपियों की मंशा पूरी तरह अमानवीय और जघन्य थी। अभियोजन ने तर्क दिया कि तीनों आरोपियों ने पहले से चापड़ और पॉलिथीन जैसी वस्तुओं की व्यवस्था की थी और उनका इरादा शव के अंग काटकर उसे ठिकाने लगाने का था। अभियोजन के अनुसार इस साजिश से जुड़े सबूत पहले ही अदालत के संज्ञान में लाए जा चुके हैं। ऐसे में यह स्पष्ट है कि यह केवल एक हत्या नहीं बल्कि सुनियोजित अपराध था जिसे ठंडे दिमाग से अंजाम देने की तैयारी की गई थी। इसी आधार पर अभियोजन पक्ष ने तीनों दोषियों को फांसी की सजा देने की मांग की और कहा कि यह समाज के लिए एक कड़ा संदेश होना चाहिए।
वहीं बचाव पक्ष ने अदालत में यह दलील दी कि आरोपियों के खिलाफ इससे पहले कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं रहा है और वे पेशेवर अपराधी नहीं हैं। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि प्रभात और शिवा के परिवार में उनके अलावा अन्य लोग भी जिम्मेदारी निभाने वाले हैं और उन्हें कठोरतम सजा देने से उनके परिवारों पर गंभीर असर पड़ेगा। हालांकि अभियोजन ने इस तर्क का विरोध करते हुए कहा कि भले ही उनका आपराधिक इतिहास न हो लेकिन उनकी मानसिकता पूरी तरह आपराधिक रही है। यदि ऐसे लोगों को रियायत दी गई तो भविष्य में समाज में इस तरह के अपराध बढ़ने का खतरा बना रहेगा।
सजा को लेकर बहस पूरी होने के बाद अदालत में मौजूद कुशाग्र की मां भावुक हो गईं। उन्होंने रोते हुए कहा कि रचिता वत्स को महिला होने के आधार पर सजा में किसी भी तरह की रियायत नहीं दी जानी चाहिए। उनका कहना था कि महिला होना किसी को यह अधिकार नहीं देता कि वह किसी मासूम बच्चे की जान ले ले। उन्होंने अदालत से अपील की कि दोषियों को ऐसी सजा दी जाए जो समाज के लिए एक मिसाल बने और भविष्य में कोई भी इस तरह का अपराध करने से पहले सौ बार सोचे।
इस फैसले ने एक बार फिर पूरे शहर को 26 महीने पुराने उस दर्दनाक मामले की याद दिला दी है जिसने कानपुर ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। अब सबकी निगाहें अदालत के अंतिम सजा के फैसले पर टिकी हुई हैं जिससे यह तय होगा कि
