काशी में उमड़ा अद्भुत आस्था का सागर: चैत्र नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी के दरबार में गूंजे जयकारे
वाराणसी: सनातन आस्था की राजधानी काशी में चैत्र नवरात्रि का छठा दिन सोमवार को भक्ति, उत्साह और आध्यात्मिक ऊर्जा के अभूतपूर्व संगम के रूप में सामने आया। मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी के दर्शन के लिए भोर से ही शहर के प्रमुख देवी मंदिरों में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग गईं। जैसे ही सुबह की पहली आरती हुई, मंदिर प्रांगण “जय माता दी” के जयघोष से गुंजायमान हो उठा। दिन चढ़ने के साथ श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता गया और काशी की गलियां देवी भक्ति के रंग में पूरी तरह रंगी नजर आईं।
महिलाएं, बुजुर्ग, युवा और बच्चे—हर वर्ग के लोग परिवार सहित मां के दरबार में पहुंचे। कई श्रद्धालु सिर पर चुनरी, हाथों में नारियल और फूल लेकर मां कात्यायनी के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करते दिखे। पूरे शहर में एक अनुशासित और दिव्य वातावरण बना रहा, जहां भक्ति और व्यवस्था का अद्भुत संतुलन देखने को मिला।
भोर की आरती से लेकर शाम की आराधना तक, निरंतर उमड़ती रही भीड़
मंदिरों में तड़के मंगला आरती के साथ ही दर्शन का क्रम शुरू हो गया था। इसके बाद पूरे दिन श्रद्धालुओं की आवाजाही थमी नहीं। शंखध्वनि, घंटियों की गूंज, दुर्गा सप्तशती के पाठ और मंत्रोच्चार के बीच भक्तों ने मां के दर्शन कर अपने जीवन में शक्ति, साहस और सुख-समृद्धि की कामना की। कई श्रद्धालुओं ने व्रत रखते हुए दिन भर उपासना की और शाम की आरती के बाद फलाहार ग्रहण किया।
मां कात्यायनी: शक्ति, पराक्रम और न्याय की अधिष्ठात्री देवी
धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में मां कात्यायनी को देवी दुर्गा का अत्यंत तेजस्वी और उग्र स्वरूप बताया गया है। मान्यता है कि जब पृथ्वी पर असुरों का अत्याचार बढ़ गया और देवताओं की शक्ति क्षीण पड़ने लगी, तब आदिशक्ति ने महर्षि कात्यायन के तप से प्रसन्न होकर उनके आश्रम में पुत्री रूप में अवतार लिया। इसी कारण उन्हें कात्यायनी कहा गया।
मां कात्यायनी का स्वरूप दिव्य और प्रभावशाली माना जाता है—चार भुजाएं, सिंह की सवारी और हाथों में कमल व अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए यह रूप केवल विनाश का नहीं, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना और न्याय की रक्षा का प्रतीक है। उन्होंने महिषासुर जैसे दैत्यों का संहार कर यह संदेश दिया कि अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः सत्य और धर्म की ही विजय होती है।
ज्योतिष और आध्यात्मिक मान्यताओं में मां कात्यायनी को विशेष रूप से विवाह, प्रेम और मनोकामना पूर्ति की देवी भी माना जाता है। ब्रज क्षेत्र में गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए मां कात्यायनी की पूजा की थी। आज भी युवा वर्ग विशेष रूप से इस दिन मां की आराधना कर अपने जीवन में शुभ फल की कामना करता है।
पूजा विधि में दिखी पारंपरिक आस्था और अनुशासन
छठे दिन की पूजा प्रातः स्नान और शुद्धि के साथ संकल्प लेकर शुरू की जाती है। श्रद्धालु मां के समक्ष दीप, धूप, पुष्प, रोली और अक्षत अर्पित करते हैं। इस दिन शहद का भोग विशेष रूप से अर्पित किया जाता है, जिसे मां कात्यायनी का प्रिय माना गया है। “ॐ देवी कात्यायन्यै नमः” मंत्र का जाप करते हुए भक्त दिन भर सात्विक जीवन शैली का पालन करते हैं।
धार्मिक विद्वानों के अनुसार, इस दिन केवल पूजा विधि ही नहीं बल्कि मन की पवित्रता, संयम और सेवा भाव भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। कन्या पूजन, स्त्री सम्मान और जरूरतमंदों की सहायता को भी मां की सच्ची आराधना का रूप माना जाता है।
काशी की परंपरा में नवरात्रि: आस्था और संस्कृति का जीवंत संगम
वाराणसी में नवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा का जीवंत उत्सव है। यहां हर गली, हर मंदिर और हर घर में देवी आराधना की अलग छटा देखने को मिलती है। सुबह-शाम आरती, भजन-कीर्तन, पाठ और अनुष्ठान का क्रम पूरे नौ दिनों तक निरंतर चलता रहता है।
छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा का विशेष महत्व इस कारण भी है कि यह दिन साधना के उस चरण को दर्शाता है, जहां भक्त अपने भीतर की शक्ति को जागृत करने की दिशा में आगे बढ़ता है। इस वर्ष भी काशी में श्रद्धालुओं की भारी भागीदारी ने यह साबित कर दिया कि आधुनिकता के बीच भी आस्था की यह परंपरा पूरी मजबूती के साथ जीवित है।
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