पटना उच्च न्यायालय ने बिहार में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ी अनियमितताओं पर सख्त रुख अपनाते हुए शैक्षणिक अनुभव प्रमाण पत्र को लेकर एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी अभ्यर्थी को बिना औपचारिक नियुक्ति के अनुभव प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जा सकता। कोर्ट के अनुसार केवल कुछ कक्षाएं पढ़ा देने मात्र से कोई अभ्यर्थी अनुभव प्रमाण पत्र का हकदार नहीं बन जाता और न ही विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार इस आधार पर प्रमाण पत्र जारी कर सकते हैं। यह टिप्पणी बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग की अनुशंसा पर हुई नियुक्तियों में सामने आई गड़बड़ियों की सुनवाई के दौरान की गई।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि बीते दिनों कई विषयों में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति के दौरान अधिकांश संदेहास्पद मामले अनुभव प्रमाण पत्र से जुड़े पाए गए हैं। कई कॉलेजों और विश्वविद्यालयों ने निर्धारित मानकों और नियमों का पालन किए बिना ही अनुभव प्रमाण पत्र जारी कर दिए, जिसकी वजह से पूरी नियुक्ति प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हुए। आयोग और शिक्षा विभाग को विभिन्न विश्वविद्यालयों से इस संबंध में लगातार शिकायतें मिली हैं, जिनमें शैक्षणिक दस्तावेजों के साथ साथ अनुभव प्रमाण पत्र की वैधता को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं।
शिकायतों में यह भी सामने आया है कि कुछ अभ्यर्थियों की सेवा नियुक्ति तिथि से ही संपुष्ट दिखा दी गई, जबकि कुछ मामलों में नियुक्ति के महज पांच दिन बाद सेवा संपुष्टि दर्शाई गई। इसके अलावा कॉलेज के विधिवत संबंधन से पहले ही अनुभव प्रमाण पत्र जारी किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। अदालत ने इन सभी बिंदुओं को गंभीर मानते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि अनुभव प्रमाण पत्र केवल उसी स्थिति में मान्य होगा जब अभ्यर्थी की विधिवत और औपचारिक नियुक्ति हुई हो।
इसी क्रम में मुजफ्फरपुर स्थित बीआरए बिहार विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विषय के छह अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच की गई, जिनकी पदस्थापना दस्तावेजों में कमी और अन्य संदेह के आधार पर रोकी गई थी। बुधवार को गठित कमेटी ने विभाग की ओर से उपलब्ध कराई गई चेकलिस्ट के आधार पर अनुभव प्रमाण पत्र और अन्य शैक्षणिक दस्तावेजों से संबंधित साक्ष्यों की बारीकी से जांच की। अभ्यर्थियों की ओर से प्रस्तुत किए गए सभी साक्ष्यों को समिति ने दर्ज किया और अपनी रिपोर्ट विश्वविद्या
