काशी में वैदिक रीति से रूसी दंपती का विवाह, हर-हर महादेव के उद्घोष से गूंज उठा घाट

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वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर वैदिक मंत्रोच्चारण और सात फेरों के साथ रूसी दंपती का विवाह।

वाराणसी: आध्यात्मिक नगरी काशी ने एक बार फिर अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक गरिमा का ऐसा दृश्य देखा, जिसने देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों को भाव-विभोर कर दिया। बुधवार को दशाश्वमेध घाट पर एक रूसी दंपती ने पूरी वैदिक हिंदू परंपराओं के अनुसार विवाह रचाया। वैदिक मंत्रोच्चारण, अग्नि के समक्ष सात फेरे, सिंदूरदान और जयमाल जैसी रस्मों के साथ यह विवाह संपन्न हुआ। विवाह के पश्चात नवदंपती ने ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष लगाए, जिससे घाट और मंदिर परिसर शिवभक्ति में सराबोर हो गया।

रूस के कोंस्टेंटिन मरिंग (40) और मरीना (36) भारतीय परिधानों में पारंपरिक रूप से सजे हुए नजर आए। दोनों ने दशाश्वमेध घाट के समीप स्थित एक प्राचीन मंदिर में विधिवत विवाह संस्कार पूरे किए। विवाह के दौरान घाट पर मौजूद श्रद्धालु, पर्यटक और स्थानीय लोग इस अनोखे पल के साक्षी बने और तालियों के साथ नवदंपती को आशीर्वाद दिया। भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा के प्रति दोनों की आस्था और समर्पण हर किसी को प्रभावित करता दिखा।

नवदंपती ने बताया कि काशी में विवाह करना उनका वर्षों पुराना सपना था। करीब पांच वर्ष पूर्व भगवान शिव और माता पार्वती से प्रेरित होकर उन्होंने यह निर्णय लिया था कि विवाह काशी में ही करेंगे। उनके अनुसार, काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है, जहां विवाह जैसे पवित्र संस्कार का अलग ही महत्व है। इसी भाव के साथ उन्होंने वैदिक विधि से विवाह करने का संकल्प लिया।

विवाह के सबसे भावुक क्षणों में वह पल भी शामिल रहा, जब रूसी युवक कोंस्टेंटिन ने अपनी जीवनसाथी मरीना की मांग में सिंदूर भरा। यह दृश्य वहां मौजूद लोगों के लिए अत्यंत भावनात्मक और अविस्मरणीय रहा। दोनों ने हिंदू धर्म और भगवान शिव के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा कि यह विवाह उनके लिए केवल एक सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत है।

दशाश्वमेध घाट पर आयोजित इस विवाह में सात फेरे लेकर दंपती ने सात जन्मों तक एक-दूसरे का साथ निभाने की प्रतिज्ञा की। हवन, जयमाल, सिंदूरदान और अन्य सभी रस्में शास्त्रीय विधि से संपन्न कराई गईं। विवाह की सबसे विशेष बात यह रही कि कन्यादान की रस्म स्थानीय लोगों ने निभाई। स्थानीय नागरिकों ने मरीना का कन्यादान कर नवदंपती को सुखी दांपत्य जीवन का आशीर्वाद दिया, जिससे सामाजिक सहभागिता और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत उदाहरण देखने को मिला।

इस विवाह को शास्त्रोक्त विधि से संपन्न कराने वाले आचार्य शिवाकांत पांडे ने बताया कि विवाह में किसी भी रस्म में कोई कमी नहीं रखी गई। सभी संस्कार विधिपूर्वक और वैदिक परंपरा के अनुसार कराए गए। उन्होंने कहा कि काशी विश्वभर में आध्यात्मिक नगरी के रूप में जानी जाती है और यहां विदेशी नागरिकों का सनातन धर्म तथा भारतीय संस्कृति के प्रति आकर्षित होना पूरे देश के लिए गर्व का विषय है।

घाट और मंदिर परिसर में मौजूद लोग इस अनूठे विवाह को देखने के लिए रुकते रहे। विदेशी नागरिकों द्वारा भारतीय संस्कृति को अपनाकर वैदिक रीति से विवाह करना न केवल कौतूहल का विषय बना, बल्कि काशी की सांस्कृतिक विरासत और वैश्विक प्रभाव को भी रेखांकित करता नजर आया। यह विवाह काशी की उस परंपरा का जीवंत उदाहरण बन गया, जहां धर्म, संस्कृति और मानवता की सीमाएं स्वतः ही एक-दूसरे में विलीन हो जाती हैं।