हापुड़ में फर्जी डिग्री और मार्कशीट के बड़े मामले में एक बार फिर एसटीएफ ने मोनाड यूनिवर्सिटी पर छापा मारा है। यह कार्रवाई पहले से दर्ज मुकदमे की विस्तृत जांच के तहत की गई है। एसटीएफ की टीम ने यूनिवर्सिटी से वर्ष 2015 से 2021 के बीच जारी की गई एक हजार से अधिक संदिग्ध डिग्रियों और मार्कशीट से जुड़ा रिकॉर्ड जब्त किया है। साथ ही कई कर्मचारियों और प्रोफेसरों के बयान दर्ज किए गए हैं।
एसटीएफ सूत्रों के अनुसार, पुख्ता सूचना और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर यह छापेमारी की गई। जांच के दौरान यूनिवर्सिटी से जुड़े कई अहम दस्तावेज हाथ लगे हैं, जिनमें डिग्री जारी करने की प्रक्रिया और छात्रों के रिकॉर्ड शामिल हैं। टीम ने पुराने मामलों से जुड़े दस्तावेजों को भी खंगाला, ताकि पूरे नेटवर्क की स्पष्ट तस्वीर सामने आ सके।
फर्जी डिग्री और मार्कशीट बनाने और बेचने के इस मामले में पहले ही बड़ा खुलासा हो चुका है। इस केस में एसटीएफ की ओर से पिलखुवा थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी, जिसकी जांच अब भी एसटीएफ कर रही है। इस मामले में मोनाड यूनिवर्सिटी के मालिक बिजेंद्र हुड्डा सहित 11 लोगों को जेल भेजा जा चुका है। इनमें से कुछ आरोपियों को जमानत मिल चुकी है, जबकि कई कर्मचारी अब भी जेल में हैं।
मंगलवार दोपहर एसटीएफ की टीम डीएसपी संजीव दीक्षित के नेतृत्व में यूनिवर्सिटी पहुंची। टीम में पांच इंस्पेक्टर भी शामिल थे। सबसे पहले डॉ. सुल्तान सहित पांच से छह कर्मचारियों और प्रोफेसरों के बयान दर्ज किए गए। इनसे प्रवेश प्रक्रिया, कथित फर्जीवाड़े के तरीके, डिग्री लेने वालों से संपर्क साधने के माध्यम और अन्य राज्यों से छात्रों को लाने वाले एजेंटों के बारे में गहन पूछताछ की गई।
जांच के दौरान एसटीएफ को करीब एक हजार ऐसे छात्रों की जानकारी मिली है, जिनकी डिग्रियां संदिग्ध पाई गई हैं। ये डिग्रियां 2015 से 2021 के बीच जारी की गई थीं। रिकॉर्ड की जांच में कई गंभीर अनियमितताएं सामने आने के बाद संबंधित दस्तावेजों को कब्जे में ले लिया गया। टीम देर शाम इन रिकॉर्ड को अपने साथ ले गई।
विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि एसटीएफ की टीम अभी भी आसपास ही डटी हुई है और आने वाले दिनों में और फाइलें जब्त की जा सकती हैं। माना जा रहा है कि आगे की जांच में फर्जी डिग्री प्राप्त करने वालों के नाम भी सार्वजनिक हो सकते हैं।
गौरतलब है कि इससे पहले मई 2025 में भी एसटीएफ ने मोनाड यूनिवर्सिटी पर छापेमारी की थी। उस दौरान तीन दर्जन से अधिक ऐसे युवक सामने आए थे, जिन्होंने आरोप लगाया था कि उन्हें असली बताकर फर्जी डिग्री और मार्कशीट दी गई थीं। ये युवक इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर विभिन्न कंपनियों और संस्थानों में नौकरी कर रहे थे। बाद में जांच कराने पर उनके दस्तावेज फर्जी पाए गए।
युवकों का दावा है कि उनसे फीस और प्रवेश का पूरा शुल्क लिया गया, लेकिन परीक्षा प्रक्रिया में नियमों का पालन नहीं किया गया। कुछ मामलों में तो प्रवेश लेने से एक साल पहले ही डिग्री जारी कर दी गई। आरोप है कि यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने सुनियोजित तरीके से धोखाधड़ी की। अब एसटीएफ की ताजा कार्रवाई से इस पूरे फर्जीवाड़े के और बड़े खुलासे होने की उम्मीद जताई जा रही है।
