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वाराणसी: मां ब्रह्मचारिणी के दरबार में उमड़ा आस्था का सैलाब, जयकारों से गूंजी काशी

Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
Last updated: 12/10/2026 12:13
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Sandeep Srivastava
Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
BySandeep Srivastava
Sandeep Srivastava serves as a Sub Editor at News Report, a registered Hindi newspaper dedicated to ethical, accurate, and reader-focused journalism. He is responsible for copy...
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वाराणसी के दुर्गाघाट स्थित मां ब्रह्मचारिणी मंदिर में लंबी कतारों में लगे श्रद्धालु
शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी के दर्शन के लिए दुर्गाघाट मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी।
Contents
  • वाराणसी में मां ब्रह्मचारिणी के दरबार में उमड़ा आस्था का सैलाब, दर्शन के लिए लगी लंबी कतारें, जयकारों से गूंज उठी काशी
  • काशी के दुर्गाघाट क्षेत्र में स्थित है मां ब्रह्मचारिणी का प्रसिद्ध मंदिर
  • कौन हैं मां ब्रह्मचारिणी, जानिए पौराणिक कथा
  • शांत स्वरूप में विराजमान हैं मां ब्रह्मचारिणी
  • मां ब्रह्मचारिणी का मंत्र और पावन श्लोक
  • मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि और नियम
  • नवरात्र के दूसरे दिन मां की आराधना का विशेष महत्व
  • देवी आराधना में रची बसी काशी की सनातन परंपरा

वाराणसी में मां ब्रह्मचारिणी के दरबार में उमड़ा आस्था का सैलाब, दर्शन के लिए लगी लंबी कतारें, जयकारों से गूंज उठी काशी

वाराणसी। धर्म और अध्यात्म की प्राचीन नगरी काशी में शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन मां भगवती के द्वितीय स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की आराधना श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई। मां के दर्शन पूजन के लिए दुर्गाघाट क्षेत्र स्थित मंदिर में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं। हाथों में पूजा की थाली, पुष्प, अक्षत, रोली और फल लेकर पहुंचे भक्त माता रानी के जयकारे लगाते हुए अपनी बारी की प्रतीक्षा करते नजर आए। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में भक्ति का वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने मां के चरणों में शीश नवाकर परिवार की सुख समृद्धि, आरोग्य, शांति और मंगलमय जीवन की कामना की। नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। देवी का यह स्वरूप तप, त्याग, संयम, धैर्य और अटूट संकल्प का प्रतीक है। मां की आराधना के माध्यम से भक्त जीवन में कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं।

काशी के दुर्गाघाट क्षेत्र में स्थित है मां ब्रह्मचारिणी का प्रसिद्ध मंदिर

वाराणसी के दुर्गाघाट क्षेत्र में गंगा तट के निकट स्थित मां ब्रह्मचारिणी का मंदिर नवरात्र के दूसरे दिन विशेष धार्मिक महत्व रखता है। काशी की प्राचीन देवी उपासना परंपरा से जुड़ा यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। नवरात्र के दौरान मां के दर्शन के लिए भक्त यहां पहुंचते हैं और विधि विधान से पूजन अर्चन करते हैं। मां के समक्ष दीप प्रज्वलित कर पुष्प, अक्षत, रोली, चंदन और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार पूजा करते हुए माता रानी से सुख शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं। काशी में नवरात्र के दौरान देवी के नौ स्वरूपों की आराधना की विशेष परंपरा है। इस अवसर पर मंदिरों में दर्शन पूजन के साथ धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं।

कौन हैं मां ब्रह्मचारिणी, जानिए पौराणिक कथा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी देवी पार्वती का तपस्विनी स्वरूप हैं। पौराणिक कथा के अनुसार पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने वाली देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। अपने संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने कठिन साधना का मार्ग अपनाया और लंबे समय तक तप में लीन रहीं। कथा में वर्णन मिलता है कि देवी ने वर्षों तक कठिन तपस्या की। उन्होंने पत्तों का सेवन भी छोड़ दिया और अंततः भोजन तक का त्याग कर दिया। उनकी इसी कठोर साधना और तपस्या के कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया। यह स्वरूप साधना, अनुशासन और आत्मसंयम के माध्यम से परम लक्ष्य की प्राप्ति का संदेश देता है।

पौराणिक प्रसंग के अनुसार देवी की कठोर तपस्या और अटूट निष्ठा से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उनकी साधना सफल हुई। मां ब्रह्मचारिणी की कथा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को जीवन में धैर्य और दृढ़ संकल्प का महत्व भी समझाती है। कठिन परिस्थितियों में निराश होने के बजाय अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित रहना और निरंतर प्रयास करते रहना इस कथा का प्रमुख संदेश है। नवरात्र के दूसरे दिन मां की आराधना करने वाले श्रद्धालु इसी भाव के साथ माता से साहस, सद्बुद्धि और आत्मिक शक्ति की कामना करते हैं।

शांत स्वरूप में विराजमान हैं मां ब्रह्मचारिणी

मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप शांत, तेजस्वी और तपस्या से परिपूर्ण माना जाता है। धार्मिक चित्रण में माता श्वेत वस्त्र धारण किए रहती हैं। उनके एक हाथ में जपमाला और दूसरे हाथ में कमंडल सुशोभित रहता है। जपमाला निरंतर साधना, एकाग्रता और ईश्वर के स्मरण का प्रतीक है, जबकि कमंडल त्याग, सादगी और तपस्वी जीवन का संदेश देता है। मां का यह स्वरूप भक्तों को अपने मन पर नियंत्रण रखने, विचारों में पवित्रता बनाए रखने और कठिन समय में धैर्य के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

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धार्मिक मान्यता है कि मां ब्रह्मचारिणी की आराधना से साधक को संयम, आत्मविश्वास और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण की प्रेरणा मिलती है। विद्यार्थी ज्ञान और एकाग्रता की कामना से मां का स्मरण करते हैं, जबकि गृहस्थ परिवार में सुख शांति और मंगल की प्रार्थना करते हैं। साधक आध्यात्मिक उन्नति और मन की स्थिरता के लिए देवी की उपासना करते हैं। मां का स्वरूप यह संदेश देता है कि जीवन में बाहरी सफलता के साथ आंतरिक संतुलन, सदाचार और सकारात्मक सोच भी आवश्यक है।

मां ब्रह्मचारिणी का मंत्र और पावन श्लोक

नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के दौरान श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक देवी के मंत्र का जाप करते हैं। धार्मिक परंपरा में इस मंत्र को मां के द्वितीय स्वरूप की आराधना के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।

ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः।

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मां ब्रह्मचारिणी के ध्यान में प्रचलित श्लोक का पाठ भी किया जाता है।

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।

देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।

इस श्लोक का भावार्थ है कि हाथों में जपमाला और कमंडल धारण करने वाली श्रेष्ठ तपस्विनी देवी ब्रह्मचारिणी मुझ पर प्रसन्न हों और अपनी कृपा प्रदान करें। इसके अतिरिक्त देवी की सार्वभौमिक शक्ति का स्मरण करते हुए श्रद्धालु मां दुर्गा की स्तुति भी करते हैं।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

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इसका भावार्थ है कि जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में विद्यमान हैं, उन भगवती को बार बार नमन है। भक्त इन मंत्रों और श्लोकों के माध्यम से मां से विवेक, साहस, धैर्य, सद्बुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की प्रार्थना करते हैं।

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि और नियम

नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा प्रातः स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके की जाती है। पूजा स्थल को साफ करने के बाद मां के स्वरूप का ध्यान किया जाता है। इसके पश्चात दीप प्रज्वलित कर देवी को पुष्प, अक्षत, रोली, चंदन, धूप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार फल, मिठाई और अन्य सात्विक प्रसाद चढ़ाते हैं। इसके बाद मां के मंत्र का जाप कर आरती और स्तुति की जाती है। मंदिर में दर्शन करने वाले श्रद्धालु भी अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजन सामग्री अर्पित कर माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

नवरात्र में व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी स्वास्थ्य स्थिति और पारिवारिक परंपरा के अनुसार फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। धार्मिक दृष्टि से पूजा में श्रद्धा, मन की पवित्रता और सदाचार को विशेष महत्व दिया जाता है। जरूरतमंदों की सहायता करना, दूसरों के प्रति सद्भाव रखना और अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना भी देवी उपासना के मूल भाव से जुड़ा है। मां ब्रह्मचारिणी की आराधना का संदेश है कि मनुष्य को अपनी क्षमता के अनुसार संयम और अनुशासन का पालन करते हुए जीवन में आगे बढ़ना चाहिए।

नवरात्र के दूसरे दिन मां की आराधना का विशेष महत्व

शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा को तपस्या, संकल्प और साधना की शक्ति से जोड़कर देखा जाता है। मां का स्वरूप भक्तों को यह प्रेरणा देता है कि किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए धैर्य, निरंतर प्रयास और आत्मअनुशासन आवश्यक हैं। जीवन में आने वाली कठिनाइयां मनुष्य की परीक्षा लेती हैं, लेकिन दृढ़ निश्चय और सकारात्मक सोच से उनका सामना किया जा सकता है। देवी की तपस्या की कथा त्याग और समर्पण के महत्व को समझाती है। मां की आराधना करने वाले श्रद्धालु अपने जीवन में मानसिक शांति, आत्मविश्वास और सद्बुद्धि की कामना करते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी की उपासना से साधक को कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने और अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान रहने की प्रेरणा मिलती है। उनकी पूजा का संदेश केवल अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन में संयम, सत्य, सेवा और सदाचार अपनाने की सीख भी देता है। यही कारण है कि नवरात्र के दूसरे दिन देवी के इस स्वरूप की आराधना को विशेष महत्व दिया जाता है।

देवी आराधना में रची बसी काशी की सनातन परंपरा

भगवान शिव की नगरी काशी में देवी उपासना की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। गंगा के घाट, प्राचीन मंदिर और संकरी गलियां इस नगरी की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। नवरात्र के दौरान देवी के विभिन्न स्वरूपों की पूजा से वातावरण भक्तिमय हो उठता है। मां ब्रह्मचारिणी के दरबार में दर्शन के लिए पहुंचने वाले श्रद्धालु काशी की इसी समृद्ध धार्मिक परंपरा की झलक प्रस्तुत करते हैं। मां के चरणों में शीश नवाकर भक्त परिवार में सुख शांति, समाज में सद्भाव और जीवन में समृद्धि की कामना करते हैं।

नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना श्रद्धालुओं के लिए आस्था और आत्मिक चेतना का महत्वपूर्ण अवसर है। मां की तपस्या का संदेश आज भी प्रासंगिक है कि मनुष्य को धैर्य के साथ सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए और अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित रहना चाहिए। काशी में मां के जयकारों के बीच श्रद्धालुओं की भक्ति देवी उपासना की जीवंत परंपरा को दर्शाती है।

जय माता दी। मां ब्रह्मचारिणी सभी के जीवन में धैर्य, संयम, सद्बुद्धि और मंगल का प्रकाश फैलाएं। हर परिवार में सुख शांति बनी रहे और सभी को जीवन की कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति प्राप्त हो।

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