वाराणसी: पूरा देश जब 14 जनवरी को 'वेटरन्स डे' के अवसर पर अपने पूर्व सैनिकों के शौर्य और बलिदान को नमन कर रहा था, ठीक उसी वक्त वाराणसी के कचहरी परिसर में आयोजित इंडियन वेटरन्स ऑर्गेनाइजेशन की बैठक में देश के रक्षकों का दर्द छलक पड़ा। यह कार्यक्रम केवल एक औपचारिकता न होकर उस लचर स्वास्थ्य व्यवस्था के खिलाफ एक चार्जशीट बन गया, जिसे पूर्व सैनिकों के लिए जीवनदायिनी माना जाता है, ECHS (एक्स-सर्विसमैन कॉन्ट्रिब्यूटरी हेल्थ स्कीम)। संगठन के पदाधिकारियों और सदस्यों ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए खुलासा किया कि कैसे तकनीकी पेचीदगियों और प्रशासनिक सुस्ती के कारण यह योजना अब सैनिकों के लिए राहत के बजाय मुसीबत का सबब बन गई है। सबसे बड़ा सवाल जो यहाँ गूँजा, वह यह था कि क्या पूर्व सैनिकों को बीमार पड़ने के लिए भी अब 'वर्किंग डे' का इंतजार करना होगा? क्योंकि छुट्टी के दिनों में ECHS की व्यवस्था पूरी तरह ठप पड़ जाती है और मरीज भगवान भरोसे रहता है।
स्वास्थ्य सुविधाओं में खामियों का जिक्र करते हुए पूर्व सैनिकों ने जो आपबीती सुनाई, वह रोंगटे खड़े करने वाली थी। व्यवस्था की संवेदनहीनता का एक जीता-जागता उदाहरण चौबेपुर के शिवदहा निवासी पूर्व सैनिक कन्हैया सिंह के मामले में देखने को मिला। रात के करीब 1:35 बजे अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी। परिजन आनन-फानन में उन्हें लेकर ECHS से संबद्ध शुभम अस्पताल पहुँचे, लेकिन अस्पताल प्रशासन ने नियमों का हवाला देते हुए हाथ खड़े कर दिए। तर्क दिया गया कि बिना रेफरल के भर्ती नहीं किया जा सकता और चूँकि छुट्टी का दिन है, इसलिए ECHS का दफ्तर बंद है और रेफरल नहीं मिल सकता। एक गंभीर मरीज को केवल कागज के एक टुकड़े की कमी के कारण वापस लौटा दिया गया, जिसके बाद उन्हें मजबूरी में पंडित दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। यह घटना यह बताने के लिए काफी है कि आपात स्थिति में यह 'कैशलेस' सुविधा कितनी लाचार साबित हो रही है।
लापरवाही की यह दास्तां यहीं खत्म नहीं होती। हवलदार ए. के. पाण्डेय और पूर्व सैनिक ताजबली यादव की पत्नियों के मामलों ने यह साबित कर दिया कि दर्द और पीड़ा का इस सिस्टम पर कोई असर नहीं पड़ता। दोनों ही मामलों में पैर फ्रैक्चर होने के बावजूद इलाज में देरी हुई। हवलदार पाण्डेय के केस में अस्पताल ने इसे "बड़ा केस" बताकर अप्रूवल के नाम पर लंबा इंतजार कराया, वहीं ताजबली यादव की पत्नी को ऑपरेशन के अप्रूवल के लिए चार दिनों तक घर पर असहनीय पीड़ा सहनी पड़ी। लेकिन सबसे हृदयविदारक घटना रामनगर निवासी पूर्व सैनिक रामपति के साथ घटी, जो व्यवस्था की बलि चढ़ गए। वे लखनऊ के प्रतिष्ठित वेदांता अस्पताल में भर्ती थे, जहाँ डॉक्टरों ने तत्काल हार्ट सर्जरी की सलाह दी थी। विडंबना देखिए कि ECHS से सर्जरी का अप्रूवल समय पर नहीं मिल सका। फाइलों के इधर-उधर घूमने के दौरान उनकी हालत बिगड़ती गई और अंततः 31 दिसंबर 2025 को उन्होंने अस्पताल के बिस्तर पर ही दम तोड़ दिया। उनकी मौत ने यह चुभता हुआ सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर उनकी जान की कीमत का हिसाब कौन देगा?
बैठक में मौजूद आक्रोशित पूर्व सैनिकों ने ECHS की तुलना 'राशन की दुकान' से करते हुए कहा कि यह व्यवस्था भी अब उसी तर्ज पर चल रही है, 'छुट्टी है तो बंद, जरूरत है तो कतार में लगो'। उन्होंने बताया कि यदि छुट्टी के दिन बाहर से दवा खरीदी जाए और उसका नया सर्टिफिकेट न हो, तो क्लेम का भुगतान नहीं किया जाता। इतना ही नहीं, कई आवश्यक चिकित्सीय जाँचों को जानबूझकर इंपैनलमेंट से बाहर रखा गया है, जिससे पूर्व सैनिकों पर आर्थिक बोझ भी पड़ता है। कार्यक्रम के दौरान जिला अध्यक्ष ओम प्रकाश सिंह और जिला उपाध्यक्ष ए. के. पाण्डेय के नेतृत्व में वेटरन्स ने सीधे तौर पर रीजनल सेंटर और ECHS प्रशासन की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने पूछा कि क्या देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले जवानों को बुढ़ापे में इस तरह अपमानित और प्रताड़ित किया जाता रहेगा?
इस गंभीर चिंतन और विरोध प्रदर्शन में वेटरन्स राघवेन्द्र प्रताप सिंह, विभूति तिवारी, नागेन्द्र सिंह, कुंदन सिंह, अमरेश कुमार राय, विपिन सिंह, अजय कुमार तिवारी, संतोष कुमार राय एवं राम बहादुर सिंह सहित बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक उपस्थित रहे। इंडियन वेटरन्स ऑर्गेनाइजेशन ने सरकार और रक्षा मंत्रालय से कड़े शब्दों में मांग की है कि ECHS की कार्यप्रणाली में तत्काल सुधार किया जाए। उनकी प्रमुख मांग है कि छुट्टी के दिनों में भी रेफरल और अप्रूवल की त्वरित ऑनलाइन व्यवस्था हो, ताकि किसी अन्य सैनिक या उनके परिजन को इलाज के अभाव में अपनी जान न गंवानी पड़े।
वाराणसी में वेटेरन्स डे पर ECHS की लचर व्यवस्था पर फूटा गुस्सा, पूर्व सैनिक पीड़ित

वाराणसी में वेटरन्स डे पर ECHS की लचर व्यवस्था के खिलाफ पूर्व सैनिकों का दर्द छलका, गंभीर आरोपों से आक्रोश।
Category: uttar pradesh varanasi veterans welfare
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