लखनऊ अग्निकांड के बाद जागा प्रशासन लेकिन बड़ा सवाल बरकरार क्या कुछ कोचिंग सील करने से सुरक्षित हो जाएंगे हजारों छात्र
लखनऊ/वाराणसी: अलीगंज क्षेत्र में हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे उत्तर प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। एक व्यावसायिक भवन में संचालित प्रशिक्षण एवं कोचिंग संस्थान में लगी आग में 15 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई। मृतकों में अधिकांश युवा छात्र और कर्मचारी बताए गए हैं। इस घटना के बाद शासन और प्रशासन हरकत में आया। विशेष जांच दल का गठन किया गया। संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई हुई। कई लोगों की गिरफ्तारी हुई और प्रदेश के विभिन्न जिलों में विकास प्राधिकरण तथा अग्निशमन विभाग द्वारा व्यापक निरीक्षण अभियान शुरू किया गया। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठ रहा है कि यदि सुरक्षा मानकों की नियमित निगरानी पहले से होती रहती तो क्या इतनी बड़ी त्रासदी को टाला नहीं जा सकता था।
हादसा नहीं बल्कि व्यवस्था पर बड़ा प्रश्न
लखनऊ की यह घटना केवल आग लगने की एक सामान्य दुर्घटना नहीं मानी जा सकती। इसने उन व्यवस्थागत कमियों को उजागर किया है जिनके बीच हजारों छात्र प्रतिदिन अपनी शिक्षा प्राप्त करने के लिए पहुंचते हैं। प्रारंभिक जांच और उपलब्ध जानकारियों में भवन की सुरक्षा व्यवस्था, आपातकालीन निकास, अग्निशमन संसाधनों तथा भवन निर्माण संबंधी नियमों के पालन को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं। यदि किसी भवन में पर्याप्त निकासी मार्ग नहीं है, अग्निशमन उपकरण काम नहीं कर रहे हैं, धुआं बाहर निकालने की व्यवस्था नहीं है और सीढ़ियां सुरक्षित नहीं हैं तो ऐसा भवन विद्यार्थियों के लिए जोखिम का केंद्र बन सकता है। विशेषज्ञ भी लंबे समय से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि शैक्षणिक संस्थानों में सुरक्षा को औपचारिकता नहीं बल्कि प्राथमिक आवश्यकता के रूप में देखा जाना चाहिए।
प्रदेश भर में शुरू हुआ निरीक्षण अभियान
घटना के बाद उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में बड़े स्तर पर निरीक्षण और सत्यापन अभियान चलाया गया। वाराणसी में विकास प्राधिकरण और अग्निशमन विभाग की संयुक्त टीमों ने कई कोचिंग संस्थानों की जांच की। भवन मानचित्र, फायर सेफ्टी उपकरण, बेसमेंट के उपयोग और आपातकालीन निकास मार्गों का परीक्षण किया गया। नियमों का पालन न करने वाले कई संस्थानों पर कार्रवाई की गई और कुछ को सील भी किया गया।
इसी प्रकार प्रयागराज में दर्जनों कोचिंग संस्थानों की जांच के दौरान बड़ी संख्या में संस्थानों के पास वैध अग्निशमन अनापत्ति प्रमाणपत्र नहीं पाया गया। कई संचालकों को नोटिस जारी किए गए जबकि कुछ संस्थानों पर कठोर कार्रवाई की गई। गाजियाबाद और नोएडा में भी बिना आवश्यक अनुमति और सुरक्षा मानकों के संचालित संस्थानों के खिलाफ अभियान चलाया गया। प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई छात्रों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए की जा रही है।
क्या समस्या केवल कुछ संस्थानों तक सीमित है
कार्रवाई के बीच यह प्रश्न लगातार उठ रहा है कि क्या केवल वही संस्थान नियमों का उल्लंघन कर रहे थे जिन पर कार्रवाई हुई। प्रदेश के अधिकांश बड़े शहरों और कस्बों में संकरी गलियों, आवासीय भवनों, बाजार क्षेत्रों और बहुमंजिला इमारतों में कोचिंग सेंटर, छात्रावास, पीजी, लॉज, गेस्ट हाउस और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान संचालित हो रहे हैं। इनमें से अनेक स्थानों पर अग्निशमन व्यवस्था अपर्याप्त है। कई भवनों में एक ही सीढ़ी से सैकड़ों लोगों का आवागमन होता है। कहीं बेसमेंट में कक्षाएं संचालित हो रही हैं तो कहीं क्षमता से अधिक भीड़ मौजूद रहती है। ऐसे हालात में केवल चुनिंदा संस्थानों पर कार्रवाई व्यापक समाधान नहीं मानी जा सकती।
निरीक्षण अभियान या स्थायी सुधार
भारत में शैक्षणिक संस्थानों में आग लगने की घटनाएं पहले भी सामने आती रही हैं। हर बड़ी दुर्घटना के बाद जांच, समीक्षा और सख्त कार्रवाई की घोषणा होती है लेकिन समय बीतने के साथ अधिकांश अभियान धीमे पड़ जाते हैं। इसी कारण लोगों के मन में यह आशंका भी है कि कहीं वर्तमान अभियान भी कुछ समय बाद औपचारिकता बनकर न रह जाए। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निरीक्षण केवल दुर्घटना के बाद शुरू हों तो उनका प्रभाव सीमित रह जाता है। आवश्यक यह है कि निगरानी व्यवस्था नियमित और पारदर्शी हो।
जिम्मेदारी केवल संचालकों की नहीं
इस पूरे मामले में केवल कोचिंग संचालकों को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। भवन निर्माण और उपयोग संबंधी नियमों के पालन की निगरानी संबंधित विकास प्राधिकरणों की जिम्मेदारी होती है। अग्निशमन विभाग का दायित्व नियमित निरीक्षण और सुरक्षा मानकों की जांच करना है। स्थानीय प्रशासन को भी भीड़भाड़ वाले भवनों और संस्थानों की स्थिति पर नजर रखनी चाहिए। साथ ही अभिभावकों और छात्रों की भी जिम्मेदारी है कि वे किसी संस्थान में प्रवेश लेने से पहले उसकी सुरक्षा व्यवस्था के बारे में जानकारी प्राप्त करें।
विशेषज्ञों की राय में क्या होना चाहिए
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सीलिंग अभियान चलाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। सभी कोचिंग संस्थानों और छात्रावासों का डिजिटल पंजीकरण सुनिश्चित किया जाना चाहिए। फायर एनओसी और भवन मानचित्र से संबंधित जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए। प्रत्येक छह माह में अनिवार्य सुरक्षा ऑडिट कराया जाए। छात्रों की संख्या के अनुसार निकास मार्ग और सुरक्षा संसाधनों को अनिवार्य बनाया जाए। पीजी, हॉस्टल, गेस्ट हाउस और लॉज की संयुक्त जांच नियमित रूप से की जाए तथा नियमों के उल्लंघन पर आर्थिक दंड के साथ कानूनी कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाए।
निष्कर्ष
लखनऊ अग्निकांड ने केवल 15 लोगों की जान नहीं ली बल्कि उसने प्रदेश में भवन सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को भी सामने ला दिया है। आज उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में लाखों छात्र कोचिंग संस्थानों, छात्रावासों और व्यावसायिक भवनों में अपना भविष्य बनाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। यदि कार्रवाई कुछ संस्थानों को सील करने तक सीमित रही तो इसे व्यापक सुधार नहीं कहा जा सकेगा। वास्तविक बदलाव तब माना जाएगा जब सुरक्षा नियमों का पालन कागजों से निकलकर जमीन पर दिखाई दे और प्रत्येक छात्र स्वयं को सुरक्षित वातावरण में शिक्षा प्राप्त करता हुआ महसूस करे।
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