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West Bengal

मालदा: SIR हटाने की मांग को लेकर उग्र प्रदर्शन, 7 न्यायिक अधिकारियों का 8 घंटे तक घेराव

Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
Last updated: 02/04/2026 13:37
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Sandeep Srivastava
Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
BySandeep Srivastava
Sandeep Srivastava serves as a Sub Editor at News Report, a registered Hindi newspaper dedicated to ethical, accurate, and reader-focused journalism. He is responsible for copy...
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5 Min Read
मालदा में न्यायिक अधिकारियों के घेराव का दृश्य, प्रदर्शनकारियों की भीड़
मालदा में SIR हटाने की मांग को लेकर उग्र प्रदर्शन के दौरान 7 न्यायिक अधिकारियों का घेराव।
Contents
  • मालदा में उग्र प्रदर्शन के बीच 7 न्यायिक अधिकारियों का घेराव, सुप्रीम कोर्ट सख्त
  • आठ घंटे तक घेराव, न्यायिक व्यवस्था पर उठा गंभीर सवाल
  • ड्यूटी के दौरान फंसे न्यायिक अधिकारी
  • सुप्रीम कोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी
  • वरिष्ठ वकीलों ने उठाए सवाल
  • स्वतः संज्ञान, चुनाव आयोग को निर्देश
  • स्वतंत्र जांच एजेंसी की सिफारिश
  • चुनावी माहौल में बढ़ी चिंता

मालदा में उग्र प्रदर्शन के बीच 7 न्यायिक अधिकारियों का घेराव, सुप्रीम कोर्ट सख्त

आठ घंटे तक घेराव, न्यायिक व्यवस्था पर उठा गंभीर सवाल

पश्चिम बंगाल: आगामी विधानसभा चुनाव 2026 से पहले राजनीतिक और प्रशासनिक माहौल लगातार तनावपूर्ण होता जा रहा है। इसी क्रम में मालदा जिले से एक बेहद चिंताजनक घटना सामने आई है, जहां SIR (विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया) को हटाने की मांग को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शन ने अचानक उग्र रूप ले लिया। प्रदर्शनकारियों ने सात न्यायिक मजिस्ट्रेटों को करीब आठ घंटे तक घेरकर रखा, जिससे न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए बल्कि न्यायिक प्रक्रिया भी प्रभावित होती नजर आई।

ड्यूटी के दौरान फंसे न्यायिक अधिकारी

प्राप्त जानकारी के अनुसार, न्यायिक अधिकारी अपने निर्धारित कार्यों के सिलसिले में क्षेत्र में मौजूद थे, तभी अचानक प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया। शाम लगभग 5 बजे शुरू हुआ यह घेराव रात करीब 11 बजे तक जारी रहा। इस दौरान अधिकारियों को मौके से बाहर निकलने नहीं दिया गया। स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि स्थानीय प्रशासन भी तत्काल प्रभावी हस्तक्षेप करने में असहज दिखाई दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी

घटना की गंभीरता को देखते हुए मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने इस पर सख्त रुख अपनाया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि न्यायिक अधिकारियों के साथ इस प्रकार का व्यवहार किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने इसे न्यायिक प्रक्रिया में बाधा और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा के खिलाफ बताया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए, लेकिन इसकी गंभीरता को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

वरिष्ठ वकीलों ने उठाए सवाल

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को जानकारी देते हुए बताया कि उन्हें इस घटना की जानकारी एक प्रतिष्ठित अखबार की रिपोर्ट के माध्यम से मिली। उन्होंने इस घटना को अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि इस तरह की घटनाएं न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा असर डालती हैं। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने भी अदालत को बताया कि घटना के बाद राज्य में तैनात कई अधिकारियों का तबादला राज्य के बाहर कर दिया गया है, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है।

स्वतः संज्ञान, चुनाव आयोग को निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम का स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य की स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की। अदालत ने राज्य में बढ़ते ध्रुवीकरण पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह का माहौल पहले कभी नहीं देखा गया। मुख्य न्यायाधीश ने राज्य के एडवोकेट जनरल से स्पष्ट शब्दों में कहा कि हर मुद्दे को राजनीतिक नजरिए से देखना स्थिति को और जटिल बना रहा है।

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स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम तत्काल उठाए जाएं। कोर्ट ने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर केंद्रीय बलों की तैनाती की जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

स्वतंत्र जांच एजेंसी की सिफारिश

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की निष्पक्ष जांच के लिए इसे किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपने पर भी विचार करने की बात कही। अदालत ने संकेत दिया कि यदि आवश्यक हुआ तो मामले की जांच सीबीआई या एनआईए जैसी एजेंसियों को सौंपी जा सकती है, जिससे सच्चाई सामने आ सके और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।

चुनावी माहौल में बढ़ी चिंता

मालदा की इस घटना ने न केवल पश्चिम बंगाल की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि चुनावी माहौल में प्रशासनिक निष्पक्षता और न्यायिक सुरक्षा को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। ऐसे संवेदनशील समय में इस तरह की घटनाएं लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रही हैं।

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