ज्ञानवापी परिसर में शिवलिंग प्राप्ति की चौथी वर्षगांठ पर गूंजा जयघोष, कानूनी मोर्चे पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर तेज हुई बहस
वाराणसी में विशेष अनुष्ठान और मंदिर निर्माण के संकल्प के साथ आयोजित हुआ कार्यक्रम
वाराणसी: ज्ञानवापी परिसर से जुड़े बहुचर्चित मामले ने एक बार फिर धार्मिक और कानूनी दोनों स्तरों पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। काशी की ज्ञानवापी मस्जिद के विवादित परिसर में कथित शिवलिंग मिलने की घटना के चार वर्ष पूरे होने पर शनिवार को विशेष पूजा अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया गया। इस अवसर पर ज्ञानवापी मामले से जुड़ी महिला वादिनियों और उनके अधिवक्ताओं ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर श्रद्धा व्यक्त की और भविष्य में मंदिर निर्माण का संकल्प दोहराया। कार्यक्रम के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के बीच हर हर महादेव के उद्घोष से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा।
श्रीआदि विश्वेश्वर मुक्ति विद्वत संघ के अध्यक्ष डॉ सोहन लाल आर्य के नेतृत्व में सुबह से ही हिंदू पक्ष के प्रतिनिधि एकत्रित हुए। प्रतिनिधियों ने बाबा विश्वनाथ के दरबार में पहुंचकर श्रद्धा अर्पित की और परिसर के गेट नंबर चार से प्रतीकात्मक दर्शन किए। प्रशासनिक प्रतिबंधों के कारण सीलबंद वजूखाना क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति नहीं थी, जिसके चलते श्रद्धालुओं और वादिनियों ने सुरक्षा घेरे के निकट खड़े होकर पूजन और आरती संपन्न की। इस दौरान उपस्थित लोगों ने आदि विश्वेश्वर के स्वरूप को शीघ्र मुक्त किए जाने की कामना की।
वादिनियों और अधिवक्ताओं ने दोहराया अपना संकल्प
कार्यक्रम में उपस्थित महिला वादिनियों और हिंदू पक्ष के प्रतिनिधियों ने कहा कि लंबे संघर्ष और न्यायिक प्रक्रिया के बाद जैसे अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण संभव हुआ, उसी प्रकार काशी में भी भव्य मंदिर निर्माण का सपना पूरा होगा। इस अवसर पर वादिनी लक्ष्मी देवी, सीता साहू, मंजू व्यास और रेखा पाठक के साथ वरिष्ठ अधिवक्ता विशाल सिंह, महेंद्र पांडेय, सुधीर त्रिपाठी, सुभाष नंदन चतुर्वेदी, दीपक सिंह और बाल गोपाल साहू सहित कई लोग मौजूद रहे।
अदालती कार्यवाही के बीच सुन्नी वक्फ बोर्ड की स्थगन याचिका पर बढ़ी बहस
धार्मिक आयोजनों के समानांतर ज्ञानवापी प्रकरण के सबसे पुराने और मूल वाद संख्या छह सौ दस उन्नीस सौ इक्यानवे को लेकर न्यायिक प्रक्रिया भी तेजी से आगे बढ़ती दिखाई दी। सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट में न्यायिक अधिकारी अभिषेकता यादव की अदालत में इस मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की ओर से विस्तृत बहस हुई। हिंदू और मुस्लिम पक्ष के अधिवक्ताओं ने अदालत में अपने अपने पक्षों को मजबूती से रखा।
सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने अदालत में एक नया प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करते हुए मौजूदा कार्यवाही को तत्काल प्रभाव से स्थगित करने की मांग की। बोर्ड की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के बारह दिसंबर दो हजार चौबीस के आदेश का हवाला दिया गया। बोर्ड के अधिवक्ताओं ने तर्क रखा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को देखते हुए निचली अदालत इस मामले में आगे कोई कार्यवाही नहीं बढ़ा सकती और इसलिए सुनवाई पर रोक लगाई जानी चाहिए।
हिंदू पक्ष ने स्थगन मांग को सुनवाई टालने की रणनीति बताया
सुन्नी वक्फ बोर्ड की इस मांग का हिंदू पक्ष की ओर से कड़ा विरोध दर्ज कराया गया। आवेदिका अनुष्का तिवारी और उनके अधिवक्ताओं ने अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में केवल अंतिम और प्रभावी निर्णय पारित करने पर रोक लगाई गई है। आदेश का यह अर्थ नहीं है कि नियमित प्रक्रियात्मक कार्यवाही भी रोक दी जाए।
हिंदू पक्ष के अधिवक्ताओं ने अदालत में आरोप लगाया कि अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी और सुन्नी वक्फ बोर्ड तकनीकी आधारों का उपयोग कर मामले की सुनवाई को लंबा खींचने की कोशिश कर रहे हैं। उनके अनुसार यह प्रयास इसलिए भी किया जा रहा है ताकि वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी को हटाने से संबंधित लंबित प्रार्थना पत्र पर सुनवाई प्रभावित हो सके। इस बीच विजय शंकर रस्तोगी ने भी वक्फ बोर्ड की दलीलों के खिलाफ अदालत में अपना आपत्ति पत्र दाखिल कर दिया है।
दस जुलाई पर टिकी सभी पक्षों की निगाहें
दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद अदालत ने विभिन्न लंबित प्रार्थना पत्रों के अंतिम निस्तारण के लिए दस जुलाई की तिथि निर्धारित कर दी है। अब ज्ञानवापी मामले से जुड़े सभी पक्षों की निगाहें अगली सुनवाई पर टिकी हुई हैं। धार्मिक आस्था और कानूनी प्रक्रिया के बीच चल रही यह बहस आने वाले समय में और अधिक महत्वपूर्ण मोड़ ले सकती है।
पृष्ठभूमि
ज्ञानवापी परिसर से जुड़ा विवाद पिछले कई वर्षों से न्यायिक प्रक्रिया में है। परिसर के सर्वेक्षण और उससे जुड़ी घटनाओं के बाद यह मामला लगातार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। अदालतों में चल रही सुनवाई और विभिन्न पक्षों की दलीलों के बीच यह प्रकरण धार्मिक और कानूनी दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है।
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