चैत्र नवरात्रि 2026 का शुभारंभ: प्रथम दिन मां शैलपुत्री की आराधना से शुरू हुई नौ दिवसीय आध्यात्मिक साधना
काशी: गुरुवार, 19 अप्रैल 2026 से देशभर में चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ प्रारंभ हो गया। सुबह से ही मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी, घर-घर में कलश स्थापना के साथ मां भगवती की उपासना का शुभारंभ हुआ। धर्म शास्त्रों के अनुसार नवरात्रि केवल पूजा-अर्चना का पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संकल्प, साधना और सिद्धि का दिव्य अवसर माना जाता है, जो मनुष्य के तन और मन दोनों को संतुलित और निरोग रखने का मार्ग प्रशस्त करता है।
धार्मिक ग्रंथ देवी भागवत के अनुसार देवी ही सृष्टि की मूल शक्ति हैं, जो ब्रह्मा के रूप में सृजन, विष्णु के रूप में पालन और महेश के रूप में संहार करती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब-जब दुष्ट शक्तियों का प्रकोप बढ़ा, तब-तब देवी ने विभिन्न रूपों में अवतार लेकर राक्षसों का संहार किया। भगवान महादेव के आह्वान पर मां पार्वती ने रक्तबीज, शुंभ-निशुंभ और मधु-कैटभ जैसे दानवों का वध करने के लिए अनेक स्वरूप धारण किए, जिनमें नवदुर्गा के नौ स्वरूप विशेष रूप से पूजनीय माने जाते हैं।
प्रथम दिन का महत्व: आस्था और संकल्प का आरंभ
नवरात्रि का पहला दिन, जो चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को पड़ता है, अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दिन कलश स्थापना के साथ नौ दिनों की आध्यात्मिक यात्रा का आरंभ होता है। यह दिन साधक के लिए एक नए संकल्प, सकारात्मक ऊर्जा और आस्था की शुरुआत का प्रतीक होता है। मान्यता है कि जो साधक पूरे श्रद्धा भाव से इस दिन पूजा आरंभ करता है, उसकी साधना फलदायी होती है और जीवन में नई दिशा मिलती है।
मां शैलपुत्री: शक्ति और स्थिरता का प्रतीक
नवरात्रि के प्रथम दिन मां दुर्गा के पहले स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। उनका स्वरूप अत्यंत दिव्य और शांत है—वे वृषभ (बैल) पर विराजमान रहती हैं, दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल पुष्प धारण करती हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से मां शैलपुत्री का संबंध मानव शरीर के मूलाधार चक्र से माना जाता है। योग साधना में यह चक्र स्थिरता, संतुलन और जीवन की आधारशिला का प्रतीक है। माना जाता है कि मां शैलपुत्री की उपासना से साधक का मूलाधार चक्र जागृत होता है, जिससे जीवन में आत्मविश्वास, धैर्य और मानसिक स्थिरता का विकास होता है।
विधि-विधान से करें पूजन
प्रथम नवरात्रि के दिन भक्त प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करते हैं। इसके पश्चात विधिपूर्वक कलश स्थापना की जाती है, जो समृद्धि और मंगल का प्रतीक माना जाता है।
मां शैलपुत्री की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर उन्हें गंगाजल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद रोली, अक्षत, पुष्प और सुगंधित फूल अर्पित किए जाते हैं। माता को सफेद वस्त्र अर्पित करना विशेष शुभ माना गया है। घी का दीपक जलाकर शुद्ध घी या उससे बने प्रसाद का भोग लगाया जाता है।
पूजन के दौरान “ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः” मंत्र का जाप किया जाता है, जो साधक के मन को एकाग्र करता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। अंत में आरती कर अपनी मनोकामनाओं के साथ देवी का ध्यान किया जाता है।
व्रत और नियमों का विशेष महत्व
नवरात्रि में व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए शुद्धता, संयम और सात्विकता का विशेष महत्व होता है। पूरे नौ दिनों तक सात्विक आहार, ब्रह्मचर्य का पालन और मन, वचन एवं कर्म की पवित्रता बनाए रखना आवश्यक माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि नियमपूर्वक किया गया व्रत और पूजा साधक को आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ मानसिक शांति भी प्रदान करता है।
देवी कृपा का प्रभाव: जीवन में सकारात्मक बदलाव
मां शैलपुत्री को देवी पार्वती का ही स्वरूप माना जाता है, जो सहज भक्ति से शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करती हैं। उनकी कृपा से जीवन में स्थिरता, आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। भक्तों का मानना है कि नवरात्रि के पहले दिन की सच्ची श्रद्धा और भक्ति पूरे नौ दिनों की साधना को सफल बनाती है।
चैत्र नवरात्रि का यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण, सकारात्मक सोच और जीवन में नई ऊर्जा का संचार करने का अवसर है। पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना के साथ शुरू हुई यह दिव्य यात्रा आने वाले नौ दिनों तक भक्तों के जीवन में भक्ति, विश्वास और आध्यात्मिक शक्ति का संचार करती रहेगी।
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