फर्जी पत्रकारिता पर कब चलेगा बुलडोजर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को बचाने के लिए अब निर्णायक कार्रवाई का समय
उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में पत्रकारिता के स्वरूप में तेजी से बदलाव आया है। डिजिटल तकनीक ने सूचना के प्रसार को आसान बनाया है और आम नागरिक को भी अपनी बात रखने का मंच उपलब्ध कराया है। यह लोकतंत्र के लिए सकारात्मक परिवर्तन है। लेकिन इसी परिवर्तन के साथ एक गंभीर चुनौती भी सामने आई है। अनेक स्थानों पर पत्रकारिता की आड़ में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती दिखाई दे रही है जो बिना किसी वैध पहचान बिना विधिक प्रक्रिया और बिना किसी संपादकीय जवाबदेही के स्वयं को पत्रकार बताकर सरकारी कार्यालयों में प्रभाव बनाने का प्रयास करते हैं। यदि ऐसे मामलों में कानून का उल्लंघन होता है तो उसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव उन समाचार पत्रों और पत्रकारों पर पड़ता है जो वर्षों से नियमों का पालन करते हुए निष्पक्ष पत्रकारिता कर रहे हैं।
पत्रकारिता और केवल सोशल मीडिया गतिविधि में अंतर समझना होगा
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। कोई भी नागरिक यूट्यूब चैनल चला सकता है डिजिटल प्लेटफार्म पर समाचार आधारित सामग्री प्रस्तुत कर सकता है या सामाजिक विषयों पर अपनी राय व्यक्त कर सकता है। लेकिन केवल डिजिटल माध्यम का उपयोग करना किसी व्यक्ति को स्वतः पत्रकार का विशेष कानूनी दर्जा नहीं देता। उसी प्रकार किसी डिजिटल कंटेंट निर्माता को केवल इस आधार पर अवैध भी नहीं कहा जा सकता कि वह पारंपरिक मीडिया से जुड़ा नहीं है। कार्रवाई का आधार केवल कानून का उल्लंघन फर्जी पहचान धोखाधड़ी प्रतिरूपण उगाही अथवा अन्य अपराध होने चाहिए।
पत्रकारिता जिम्मेदारी है अधिकार नहीं
पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता और समाज के बीच जवाबदेही स्थापित करना है। पत्रकार का कार्य तथ्य जुटाना उनका सत्यापन करना और निष्पक्ष रूप से जनता तक पहुंचाना होता है। पत्रकारिता किसी सरकारी विशेषाधिकार का नाम नहीं बल्कि एक सामाजिक उत्तरदायित्व है। यदि कोई व्यक्ति पत्रकारिता की पहचान का उपयोग निजी लाभ सरकारी दबाव या अनुचित प्रभाव बनाने के लिए करता है तो वह पत्रकारिता की मूल भावना को कमजोर करता है।
नया कानून क्या कहता है
भारत सरकार ने प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ पीरियॉडिकल्स अधिनियम दो हजार तेईस लागू किया है जो एक मार्च दो हजार चौबीस से प्रभावी है। इस कानून के अंतर्गत सार्वजनिक समाचार प्रकाशित करने वाले प्रिंट पीरियॉडिकल के लिए प्रेस रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के साथ पंजीकरण की व्यवस्था की गई है। यह व्यवस्था समाचार पत्रों की पारदर्शिता जवाबदेही और रिकॉर्ड को व्यवस्थित करने के उद्देश्य से बनाई गई है।
कानून का उद्देश्य किसी समाचार पत्र को बंद करना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि समाचार प्रकाशित करने वाला प्रत्येक प्रिंट प्रकाशन निर्धारित प्रक्रिया का पालन करे। शीर्षक का पंजीकरण प्रकाशक का विवरण और अन्य आवश्यक अभिलेख उपलब्ध होना इसी व्यवस्था का हिस्सा है।
बिना वैध पंजीकरण प्रकाशन क्यों चिंता का विषय है
यदि कोई व्यक्ति बिना निर्धारित प्रक्रिया के समाचार पत्र प्रकाशित करता है अथवा स्वयं को ऐसे समाचार पत्र का प्रतिनिधि बताता है जिसका वैध पंजीकरण नहीं है तो इससे आम जनता भ्रमित हो सकती है। इससे प्रशासन के समक्ष भी वास्तविक और अप्रमाणित संस्थानों के बीच अंतर करना कठिन हो जाता है। यही कारण है कि समय समय पर पंजीकरण और अभिलेखों के सत्यापन की आवश्यकता महसूस की जाती रही है।
वास्तविक पत्रकार सबसे अधिक प्रभावित
सबसे बड़ी चिंता यह है कि कुछ लोगों के कथित कृत्यों का असर पूरे पत्रकार समाज की छवि पर पड़ता है। वर्षों से निष्पक्ष पत्रकारिता कर रहे संवाददाता संपादक और पंजीकृत समाचार पत्र भी संदेह की दृष्टि से देखे जाने लगते हैं। इससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता प्रभावित होती है और जनता का भरोसा कमजोर पड़ता है।
सर्वोच्च न्यायालय की सोच
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक ऐतिहासिक निर्णयों में प्रेस की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की आधारशिला माना है। रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य साकाल पेपर्स बनाम भारत संघ बेनेट कोलमैन बनाम भारत संघ तथा इंडियन एक्सप्रेस न्यूज़पेपर्स बनाम भारत संघ जैसे मामलों में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्र प्रेस लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है। साथ ही न्यायालय ने यह भी माना कि स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ है और कानून का पालन सभी पर समान रूप से लागू होता है।
संविधान क्या कहता है
भारतीय संविधान का अनुच्छेद उन्नीस एक क नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। वहीं अनुच्छेद उन्नीस दो यह स्पष्ट करता है कि यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है और राष्ट्रीय सुरक्षा सार्वजनिक व्यवस्था मानहानि न्यायालय की अवमानना तथा अन्य विधिक आधारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसलिए पत्रकारिता की स्वतंत्रता का अर्थ कानून से ऊपर होना नहीं है।
उत्तर प्रदेश में व्यापक सत्यापन अभियान की आवश्यकता
उत्तर प्रदेश में यदि जिला प्रशासन सूचना विभाग पुलिस और प्रेस रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के अभिलेखों के आधार पर समय समय पर सत्यापन अभियान चलाएं तो वास्तविक और अप्रमाणित संस्थानों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया जा सकता है। इससे पंजीकृत समाचार पत्रों की विश्वसनीयता और अधिक मजबूत होगी तथा जनता का विश्वास भी बढ़ेगा।
क्या किया जाना चाहिए
विशेषज्ञों का मानना है कि समाचार पत्रों के पंजीकरण का नियमित सत्यापन फर्जी प्रेस पहचान पत्रों की जांच पत्रकारिता की आड़ में होने वाली कथित उगाही की निष्पक्ष जांच तथा वास्तविक पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने जैसी व्यवस्थाएं लागू की जानी चाहिए। साथ ही किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध केवल आरोप के आधार पर नहीं बल्कि पर्याप्त साक्ष्य और विधिक प्रक्रिया के आधार पर ही कार्रवाई होनी चाहिए।
पृष्ठभूमि
डिजिटल मीडिया के विस्तार के बाद समाचारों का प्रसार पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज हुआ है। इससे लोकतांत्रिक संवाद को मजबूती मिली है लेकिन साथ ही तथ्यहीन सूचनाओं अप्रमाणित पहचान और गैर जिम्मेदार सामग्री की चुनौती भी बढ़ी है। ऐसे समय में पारदर्शिता जवाबदेही और विधिक अनुपालन पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।
निष्कर्ष
पत्रकारिता लोकतंत्र की आत्मा है। इसे किसी व्यक्ति विशेष के आचरण से नहीं बल्कि उसके मूल मूल्यों से पहचाना जाना चाहिए। जो लोग कानून का पालन करते हुए निष्पक्ष और जनहित में कार्य कर रहे हैं उनका सम्मान सुरक्षित रहना चाहिए। वहीं यदि कोई व्यक्ति पत्रकारिता की पहचान का दुरुपयोग कर कानून का उल्लंघन करता है तो उसके विरुद्ध निष्पक्ष और विधिसम्मत कार्रवाई होना भी उतना ही आवश्यक है। यही लोकतंत्र पत्रकारिता और जनता तीनों के हित में होगा।
LATEST NEWS