डोमरी में आकार ले रहा ‘ग्रीन काशी’ मियावाकी वन, 350 बीघा में विकसित हो रही हरित विरासत
वाराणसी। शहर के डोमरी (सुजाबाद) क्षेत्र में नगर निगम की महत्वाकांक्षी परियोजना ‘ग्रीन काशी’ अब जमीन पर आकार लेती नजर आ रही है। लगभग 350 बीघा क्षेत्र में विकसित किया जा रहा यह विशाल मियावाकी वन न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम है, बल्कि आने वाले समय में काशी की पहचान को एक नई हरित विरासत के रूप में भी स्थापित करेगा।
बुधवार को महापौर अशोक कुमार तिवारी और नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल ने मौके पर पहुंचकर परियोजना की प्रगति का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने पौधरोपण की स्थिति, पौधों की वृद्धि, सुरक्षा और रखरखाव की व्यवस्थाओं का बारीकी से जायजा लिया।
2.51 लाख पौधों की बेहतर जीवन दर पर संतोष
‘ग्रीन काशी’ परियोजना के अंतर्गत लगाए गए 2,51,446 पौधों की जीवित रहने की दर और उनकी स्वस्थ वृद्धि को देखकर महापौर ने संतोष व्यक्त किया। यह परियोजना पहले ही एक घंटे में सर्वाधिक पौधरोपण का विश्व कीर्तिमान स्थापित कर चुकी है, जिसकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भी सराहना की गई थी।
निरीक्षण के दौरान महापौर ने स्पष्ट निर्देश दिए कि पौधों के विकास में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और हर स्तर पर निगरानी सुनिश्चित की जाए।
गर्मी से बचाव के लिए विशेष कार्ययोजना
बढ़ते तापमान को देखते हुए महापौर ने पौधों की सुरक्षा के लिए तत्काल प्रभाव से विशेष कार्ययोजना लागू करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि कोमल पौधों को तेज धूप से बचाने के लिए पूरे क्षेत्र में ग्रीन नेट लगाया जाए, ताकि सीधे सूर्य के संपर्क से पौधों को नुकसान न पहुंचे।
इसके साथ ही उन्होंने सिंचाई व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए रेनगन सिस्टम के नियमित उपयोग पर जोर दिया। अधिकारियों को निर्देशित किया गया कि पानी की उपलब्धता और वितरण में कोई बाधा न आने पाए।
पौधों के पोषण और देखभाल पर जोर
महापौर ने यह भी निर्देश दिए कि पौधों को समय-समय पर खाद उपलब्ध कराई जाए और नियमित रूप से निराई-गुड़ाई की जाए। इससे पौधों की जड़ों तक हवा और नमी का सही संचार हो सकेगा, जो उनके बेहतर विकास के लिए आवश्यक है।
नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल ने भी अधिकारियों को निर्देशित किया कि रखरखाव की प्रक्रिया वैज्ञानिक तरीके से की जाए और हर पौधे की निगरानी सुनिश्चित की जाए।
घाटों के नाम पर विकसित किए गए सेक्टर
इस परियोजना की सबसे खास बात इसका सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जुड़ाव है। पूरे वन क्षेत्र को काशी के लगभग 60 ऐतिहासिक गंगा घाटों के नाम पर अलग-अलग सेक्टरों में विभाजित किया गया है।
इनमें दशाश्वमेध, मणिकर्णिका, अस्सी जैसे प्रमुख घाटों के नाम शामिल हैं, जिससे यह परियोजना केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी काशी की पहचान को दर्शाती है।
देशी और औषधीय पौधों का मिश्रण
‘ग्रीन काशी’ में कुल 27 प्रकार की देशी प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं। इनमें शीशम, सागौन, अर्जुन जैसे वृक्षों के साथ-साथ अश्वगंधा और गिलोय जैसे औषधीय पौधे भी शामिल हैं।
इस मिश्रण का उद्देश्य केवल हरियाली बढ़ाना नहीं, बल्कि जैव विविधता को संरक्षित करना और औषधीय महत्व को भी बढ़ावा देना है।
सुरक्षा और निगरानी के पुख्ता इंतजाम
नगर निगम ने इस विशाल परियोजना की सुरक्षा के लिए व्यापक इंतजाम किए हैं। पूरे क्षेत्र में निगरानी के लिए 25 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं।
रात्रि में पर्याप्त रोशनी के लिए 20 हाईमास्ट लाइटें स्थापित की गई हैं। इसके अलावा 24 घंटे सुरक्षा गार्डों की तैनाती की गई है, ताकि किसी भी प्रकार की क्षति या अवैध गतिविधि को रोका जा सके।
पर्यावरण के साथ आय सृजन का माध्यम
‘ग्रीन काशी’ परियोजना केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में यह आय सृजन का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। पर्यटन, औषधीय पौधों और हरित क्षेत्र के रूप में इसका उपयोग स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के मियावाकी वन शहरों में प्रदूषण कम करने, ऑक्सीजन स्तर बढ़ाने और जलवायु संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
काशी को मिलेगी नई हरित पहचान
डोमरी में विकसित हो रहा यह ‘ग्रीन काशी’ आने वाले समय में गंगा किनारे एक विशाल हरित पट्टी के रूप में उभरेगा। यह न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा, बल्कि काशी की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक छवि को भी और समृद्ध करेगा।
नगर निगम का यह प्रयास यह दर्शाता है कि यदि योजनाओं को सही दिशा और प्रतिबद्धता के साथ लागू किया जाए, तो शहरी विकास और पर्यावरण संरक्षण एक साथ संभव है।
आने वाले वर्षों में ‘ग्रीन काशी’ न केवल वाराणसी बल्कि पूरे देश के लिए एक आदर्श मॉडल के रूप में स्थापित हो सकता है।
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