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ग्वालियर: तीन साल बाद उठा परदा, ‘हादसा’ समझी गई मासूम की मौत निकली निर्मम हत्या, मां को उम्रकैद

Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
Last updated: 20/01/2026 09:56
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Sandeep Srivastava
Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
BySandeep Srivastava
Sandeep Srivastava serves as a Sub Editor at News Report, a registered Hindi newspaper dedicated to ethical, accurate, and reader-focused journalism. He is responsible for copy...
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5 Min Read
ग्वालियर कोर्ट में 5 साल के बच्चे की हत्या मामले में मां को उम्रकैद की सजा
ग्वालियर में 3 साल पुराने बच्चे की मौत के मामले में अदालत ने हादसा नहीं, हत्या मानते हुए मां को उम्रकैद सुनाई।

मध्यप्रदेश: कहते हैं दुनिया में मां की गोद सबसे महफूज जगह होती है, लेकिन मध्यप्रदेश के ग्वालियर में ममता को शर्मसार कर देने वाली एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने रिश्तों पर से भरोसा डिगा दिया है। तीन साल पहले जिस घटना को पूरा शहर एक ‘दुखद हादसा’ मानकर भूल चुका था, अदालत में वह एक सुनियोजित और निर्मम हत्या साबित हुई। 5 साल के मासूम जतिन की मौत छत से गिरने से नहीं हुई थी, बल्कि उसे उसकी ही मां ने मौत के मुंह में धकेला था, सिर्फ इसलिए क्योंकि बच्चे ने उसे ‘पाप’ करते हुए देख लिया था।

वो काली तारीख: 28 अप्रैल 2023

यह कहानी शुरू होती है 28 अप्रैल 2023 को, ग्वालियर के थाटीपुर थाना क्षेत्र में। एक घर में कोहराम मच गया कि 5 साल का जतिन खेलते-खेलते छत से गिर गया है। आनन-फानन में बच्चे को जयारोग्य अस्पताल ले जाया गया, लेकिन सिर में गंभीर चोट आने के कारण 24 घंटे के भीतर उसकी सांसें थम गईं। उस वक्त पुलिस, पड़ोसी और यहां तक कि बच्चे के पिता ध्यान सिंह राठौर ने भी इसे एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना माना। मां ज्योति राठौर का रो-रोकर बुरा हाल था, जिसे देख किसी को भी शक की गुंजाइश नहीं हुई। पुलिस ने मर्ग कायम किया और मामला फाइलों में दफन हो गया।

क्यों बनी मां अपने ही बेटे की कातिल?

इस खौफनाक कदम की वजह बच्चे की वह मासूमियत थी, जिसके चलते वह गलत वक्त पर गलत जगह पहुंच गया। पुलिस जांच और अदालती कार्यवाही में यह खुलासा हुआ कि घटना वाले दिन जतिन ने अपनी मां ज्योति को पड़ोस में रहने वाले उसके प्रेमी उदय इंदौलिया के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था। लोक-लाज का डर और अवैध संबंधों के उजागर होने की दहशत ने ज्योति को अंधा कर दिया। उसने यह नहीं देखा कि सामने उसका अपना बेटा है। उसने जतिन को चुप कराने के लिए उसे छत से नीचे फेंक दिया और बाद में इसे हादसे की शक्ल दे दी।

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हत्या तो कर दी गई, लेकिन एक मां का जमीर और बच्चे की यादें ज्योति को सोने नहीं दे रही थीं। घटना के कुछ महीनों बाद ज्योति का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा। वह रातों को चीखकर उठ जाती, उसे लगता कि जतिन उसके पास आ रहा है। अपराधबोध का बोझ जब असहनीय हो गया, तो वह टूट गई। उसने अपने पति ध्यान सिंह के सामने वह सच उगल दिया, जिसे सुनकर किसी भी पिता के पैरों तले जमीन खिसक जाए। उसने कबूला “जतिन गिरा नहीं था, मैंने उसे धक्का दिया था।”

इस कहानी का सबसे अहम पहलू पिता ध्यान सिंह राठौर का धैर्य है, जो खुद पुलिस विभाग में आरक्षक हैं। पत्नी के कबूलनामे के बाद उन्होंने अपना आपा नहीं खोया। भावनाओं में बहकर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय, उन्होंने एक पुलिसकर्मी की तरह जांच शुरू की। अगले दो महीने तक वह अपनी ही पत्नी के खिलाफ सबूत जुटाते रहे। उन्होंने ज्योति की बातों को रिकॉर्ड किया, कबूलनामे के वीडियो बनाए और जब पक्के सबूत हाथ में आ गए, तब थाने में जाकर एफआईआर दर्ज कराई। एक पिता के लिए यह फैसला कितना कठिन रहा होगा, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।

मामला अतिरिक्त सत्र न्यायालय पहुंचा। अभियोजन पक्ष ने रिकॉर्डिंग्स और परिस्थितियों को कड़ियों की तरह जोड़कर पेश किया। 17 जनवरी 2026 को अदालत ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। अदालत ने माना कि ज्योति ने ही अपने बेटे की हत्या की है और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

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हालाँकि, इस मामले में एक पहलू और भी रहा। ज्योति के प्रेमी और सह-आरोपी उदय इंदौलिया को अदालत ने बरी कर दिया। कोर्ट का मानना था कि घटना के वक्त उदय की मौजूदगी या हत्या में उसकी सीधी भागीदारी के पर्याप्त प्रत्यक्ष सबूत पेश नहीं किए जा सके। कानून भावनाओं पर नहीं, सबूतों पर चलता है, इसलिए संदेह का लाभ उसे मिल गया।

ग्वालियर की यह घटना समाज के लिए एक डरावना आईना है। यह बताती है कि कैसे अवैध संबंध और सामाजिक बदनामी का डर इंसान को हैवान बना सकता है। लेकिन, यह घटना यह भी साबित करती है कि अपराध चाहे कितनी भी चालाकी से किया गया हो, वह छिपता नहीं है। जतिन को न्याय दिलाने में उसके पिता की सूझबूझ ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई, जिन्होंने रिश्तों से ऊपर ‘न्याय’ को चुना।

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