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Delhi

13 साल कोमा में रहने के बाद हरीश राणा का निधन, पैसिव इच्छामृत्यु से मिली मुक्ति

Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
Last updated: 24/03/2026 21:32
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Sandeep Srivastava
Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
BySandeep Srivastava
Sandeep Srivastava serves as a Sub Editor at News Report, a registered Hindi newspaper dedicated to ethical, accurate, and reader-focused journalism. He is responsible for copy...
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6 Min Read
एम्स दिल्ली में हरीश राणा का इलाज
कोमा में रहे हरीश राणा की एम्स दिल्ली में देखभाल करती मेडिकल टीम
Contents
  • 13 साल के कोमा के बाद हरीश राणा का निधन, सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से दी गई पैसिव इच्छामृत्यु
  • एम्स में इलाज के दौरान ली अंतिम सांस
  • सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद हटाई गई फीडिंग ट्यूब
  • 2013 की दुर्घटना के बाद कोमा में चले गए थे हरीश
  • लंबे समय तक चली पीड़ा और संघर्ष
  • मां ने जताई थी पीड़ा से मुक्ति की इच्छा
  • भारत में इच्छामृत्यु की कानूनी स्थिति
  • कड़े नियमों के तहत होती है प्रक्रिया

13 साल के कोमा के बाद हरीश राणा का निधन, सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से दी गई पैसिव इच्छामृत्यु

नई दिल्ली: आज 24 मार्च 2026 को दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में मंगलवार शाम 31 वर्षीय हरीश राणा का निधन हो गया। पिछले 13 वर्षों से कोमा में जीवन बिता रहे हरीश का मामला देश में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील उदाहरण बनकर सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 11 मार्च को दी गई अनुमति के बाद उन्हें पैसिव इच्छामृत्यु दी गई, जिसे भारत में इस तरह लागू किए जाने का पहला मामला माना जा रहा है।

एम्स में इलाज के दौरान ली अंतिम सांस

अस्पताल प्रशासन के अनुसार हरीश राणा ने शाम 4 बजकर 10 मिनट पर ऑन्कोलॉजी यूनिट में अंतिम सांस ली। उनकी देखरेख विभागाध्यक्ष डॉ सीमा मिश्रा के नेतृत्व में एक विशेष मेडिकल टीम द्वारा की जा रही थी। अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान उनके माता पिता को पास में ही ठहरने की सुविधा दी गई थी, जहां उनकी मां निर्मला राणा अधिकतर समय बेटे के साथ ही रहीं। परिवार के अनुसार हरीश का अंतिम संस्कार बुधवार सुबह 9 बजे दक्षिण दिल्ली के ग्रीन पार्क क्षेत्र में किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद हटाई गई फीडिंग ट्यूब

हरीश राणा को 14 मार्च को एम्स में भर्ती कराया गया था। इसके बाद 16 मार्च को डॉक्टरों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत उनकी फीडिंग ट्यूब हटा दी थी। पैसिव इच्छामृत्यु के अंतर्गत मरीज को जीवित रखने वाले कृत्रिम साधनों जैसे फीडिंग ट्यूब या अन्य चिकित्सा सहायताएं हटाई जाती हैं, जिससे मृत्यु स्वाभाविक रूप से हो सके। यह प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी प्रावधानों और चिकित्सकीय निगरानी में की जाती है।

2013 की दुर्घटना के बाद कोमा में चले गए थे हरीश

हरीश राणा का जीवन वर्ष 2013 में एक दुर्घटना के बाद पूरी तरह बदल गया था। चंडीगढ़ स्थित पंजाब विश्वविद्यालय में बीटेक की पढ़ाई के दौरान वे हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस हादसे में उन्हें गंभीर मस्तिष्क चोट लगी और वे कोमा में चले गए। डॉक्टरों ने उन्हें क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित बताया था, जिसमें शरीर पूरी तरह निष्क्रिय हो जाता है और मरीज जीवन के लिए पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाता है।

लंबे समय तक चली पीड़ा और संघर्ष

पिछले 13 वर्षों में हरीश की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। लगातार बिस्तर पर रहने के कारण उनके शरीर पर गहरे घाव हो गए थे और उनकी हालत धीरे धीरे बिगड़ती जा रही थी। यह स्थिति न केवल शारीरिक रूप से कष्टदायक थी बल्कि परिवार के लिए मानसिक और आर्थिक रूप से भी बेहद कठिन साबित हुई। इलाज और देखभाल पर लगातार खर्च ने परिवार को गंभीर दबाव में डाल दिया था।

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मां ने जताई थी पीड़ा से मुक्ति की इच्छा

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हरीश की मां निर्मला राणा ने कहा था कि उन्होंने बेटे के इलाज के लिए हर संभव प्रयास किए। उन्होंने बड़े अस्पतालों और विशेषज्ञ डॉक्टरों से परामर्श लिया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। उन्होंने भावुक होकर कहा था कि अब वे केवल अपने बेटे को इस लंबे कष्ट से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना कर रही हैं।

भारत में इच्छामृत्यु की कानूनी स्थिति

भारत में इच्छामृत्यु को लेकर कानूनी स्थिति वर्ष 2018 में स्पष्ट हुई थी, जब सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में पैसिव इच्छामृत्यु को मान्यता दी थी। अदालत ने कहा था कि असाध्य बीमारी या स्थायी अवस्था में पड़े मरीजों को सम्मानपूर्वक मृत्यु का अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का विस्तार है। हालांकि इस प्रक्रिया के लिए कड़े नियम और कई स्तर की चिकित्सकीय तथा न्यायिक स्वीकृति आवश्यक होती है।

कड़े नियमों के तहत होती है प्रक्रिया

नियमों के अनुसार यदि मरीज ने पहले से अपनी इच्छा स्पष्ट की हो तो उसी के आधार पर निर्णय लिया जा सकता है। यदि ऐसी स्थिति न हो तो परिवार और डॉक्टरों की सिफारिश पर मेडिकल बोर्ड और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से अंतिम निर्णय लिया जाता है। भारत में केवल पैसिव इच्छामृत्यु को ही अनुमति प्राप्त है जबकि सक्रिय इच्छामृत्यु अब भी अवैध है और इसे कानूनन अपराध माना जाता है।

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हरीश राणा का मामला एक ओर जहां एक परिवार के लंबे संघर्ष और पीड़ा की कहानी को सामने लाता है, वहीं यह जीवन और मृत्यु के अधिकार को लेकर देश में चल रही संवेदनशील बहस को भी नई दिशा देता है।

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