फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। वर्ष 2026 में होलिका दहन 3 मार्च मंगलवार को किया जाएगा। यह पर्व नकारात्मक शक्तियों के दहन और जीवन में सकारात्मकता के स्वागत का संदेश देता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन कुछ विशेष नियमों का पालन करना आवश्यक माना गया है ताकि पर्व का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।
होलिका दहन की रात सफेद रंग की वस्तुओं जैसे दूध दही चावल या सफेद मिठाइयों का खुले में सेवन नहीं करना चाहिए। विशेष रूप से सूर्यास्त के बाद इनका सेवन अशुभ माना गया है। मान्यता है कि इससे स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसी तरह इस दिन किसी को उधार देना या किसी से कर्ज लेना भी वर्जित माना गया है। ऐसा करने से आर्थिक अस्थिरता और धन हानि की आशंका बताई जाती है।
धार्मिक परंपराओं में होलिका दहन के दिन पारिवारिक मर्यादा का विशेष महत्व है। माता पिता और घर के बुजुर्गों का सम्मान बनाए रखना चाहिए। मान्यता है कि बड़ों का अपमान करने से पूजा का फल निष्फल हो जाता है। महिलाओं को पूजा के समय अपने बाल खुले नहीं रखने चाहिए बल्कि बालों को बांधकर ही पूजा करनी चाहिए ताकि नकारात्मक ऊर्जा से बचाव हो सके।
होलिका दहन के लिए केवल सूखी लकड़ियों और उपलों का ही प्रयोग करना चाहिए। पीपल बरगद आम और शमी जैसे पूजनीय वृक्षों की लकड़ी जलाना निषिद्ध माना गया है। अग्नि प्रज्वलन के बाद होलिका की कम से कम तीन या सात परिक्रमा करनी चाहिए और इस दौरान परिवार की सुख समृद्धि की कामना करनी चाहिए।
पूजा के समय होलिका की अग्नि में नई फसल जैसे गेहूं की बालियां चना या जौ अर्पित करने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे घर में अन्न की कभी कमी नहीं होती। अगले दिन सुबह होलिका की ठंडी राख को माथे पर तिलक के रूप में लगाना भी शुभ माना गया है। कहा जाता है कि इससे रोगों और बुरी नजर से रक्षा होती है।
धार्मिक पंचांग के अनुसार होलिका दहन के लिए प्रदोष काल को सबसे शुभ माना गया है। साथ ही भद्रा काल का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है क्योंकि भद्रा में किया गया दहन अशुभ फल दे सकता है। सही समय और विधि से किया गया होलिका दहन जीवन में सुख शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
