मेरठ: वृंदावन के मां कालरात्रि पीठाधीश्वर और प्रख्यात कथावाचक संत अखिल-दास महाराज ने मेरठ में चल रहे शंकराचार्य विवाद को लेकर अपनी स्पष्ट और बेबाक टिप्पणी से धार्मिक-सामाजिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। रोहटा रोड क्षेत्र में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान उन्होंने कहा कि शंकराचार्य किसी भी सरकार से बड़े होते हैं और यदि उनका अपमान हुआ है तो सत्ताधारी दल को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। संत अखिल-दास महाराज का यह बयान कथा पंडाल में मौजूद श्रद्धालुओं के बीच गहरी चर्चा का विषय बना रहा।
संत अखिल-दास महाराज ने प्रयागराज की वर्तमान स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि गंगा सभी के लिए सुरक्षित और पवित्र मानी जाती है, लेकिन आज वहीं संतों का अपमान हो रहा है, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जिस व्यवस्था में स्वयं संत गद्दी पर बैठे हों और फिर भी संतों के सम्मान की रक्षा न हो पाए, वह स्थिति समाज के लिए गंभीर संकेत है। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस शासन में संतों का अपमान हो, उस पर उंगली उठना स्वाभाविक है और किसी को भी इतना निरंकुश नहीं होना चाहिए कि परंपराओं और मर्यादाओं को नजरअंदाज कर दिया जाए।
अपने वक्तव्य में उन्होंने एक घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि एक ओर महात्मा मर्सिडीज जैसी लग्जरी गाड़ियों में यात्रा कर रहे हैं, वहीं शंकराचार्य पालकी में चल रहे थे और उनकी पालकी को रोका गया। उन्होंने इसे संतत्व की गरिमा पर सीधा आघात बताया और कहा कि ऐसे दृश्य समाज के नैतिक पतन की ओर इशारा करते हैं।
संत अखिल-दास महाराज ने यह भी बताया कि पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उन्हें फोन किया था। उन्होंने इसे अपनी कथा का प्रभाव बताते हुए कहा कि संवाद और संवेदनशीलता आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद उन्हें अपना बड़ा भाई मानते हैं, जो आपसी सम्मान और संत परंपरा की जीवंत मिसाल है। अखिल-दास महाराज ने अखिलेश यादव की प्रशंसा करते हुए कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री ने इस पूरे प्रसंग को समझा और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाया।
अपने संबोधन के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री भले ही उत्तर प्रदेश के हों, लेकिन उनकी पीठ के मंत्री कोई और हैं। यह टिप्पणी सत्ता के भीतर प्रभाव और निर्णय-प्रक्रिया पर इशारा मानी जा रही है। उन्होंने संत समाज से आह्वान किया कि संतत्व की गरिमा को किसी भी कीमत पर नष्ट न होने दिया जाए। उनका कहना था कि कलयुग का प्रभाव इतना न बढ़े कि लोगों के भीतर से भाव, श्रद्धा और संवेदना ही समाप्त हो जाए।
वीआईपी संस्कृति पर तीखी आलोचना करते हुए संत अखिल-दास महाराज ने कहा कि जब तक यह संस्कृति समाप्त नहीं होगी, तब तक न तीर्थों में शांति से रहा जा सकेगा और न ही मंदिरों में सहज भाव से दर्शन संभव होंगे। उन्होंने समाज और शासन दोनों से आत्ममंथन करने की अपील की और कहा कि संतों के सम्मान से ही धर्म, परंपरा और संस्कृति की रक्षा संभव है।
उनके इस वक्तव्य ने शंकराचार्य विवाद को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है और आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक व धार्मिक प्रतिक्रियाएं और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
