गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित किए गए पद्म सम्मानों की सूची इस वर्ष काशी के लिए विशेष गौरव लेकर आई है। पद्म पुरस्कारों की परंपरागत घोषणा के तहत इस बार वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय के दो वरिष्ठ और प्रतिष्ठित प्रोफेसरों को पद्मश्री सम्मान प्रदान करने की घोषणा की गई है। इनमें संगीत विभाग की पूर्व प्रोफेसर मंगला कपूर और कालाजार जैसी गंभीर बीमारी के उपचार में ऐतिहासिक योगदान देने वाले प्रोफेसर श्याम सुंदर अग्रवाल शामिल हैं। इन सम्मानों से न केवल विश्वविद्यालय बल्कि पूरी काशी स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रही है।
प्रोफेसर मंगला कपूर का जीवन संघर्ष, साहस और साधना का जीवंत उदाहरण है। वह भारत की पहली एसिड अटैक सर्वाइवर के रूप में जानी जाती हैं। वर्ष 1965 में हुए एक दर्दनाक एसिड हमले के बाद उन्हें लगभग छह वर्षों तक अस्पताल में रहना पड़ा। इतने लंबे और कठिन इलाज के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपने आत्मविश्वास तथा संकल्प के बल पर आगे बढ़ती रहीं। उपचार के बाद उन्होंने बीएचयू से शिक्षा पूरी की और बाद में उसी विश्वविद्यालय में संगीत विभाग में प्रोफेसर के पद तक पहुंचीं। सेवानिवृत्ति के बाद भी वह संगीत साधना और सामाजिक सेवा से जुड़ी रहीं और अब पद्मश्री सम्मान पाने वाली बीएचयू की विशिष्ट हस्तियों में शामिल हो गई हैं।
मंगला कपूर ग्वालियर घराने से संबद्ध एक प्रख्यात शास्त्रीय गायिका और शिक्षिका हैं। उनके संगीत और सामाजिक योगदान को देखते हुए उन्हें वर्ष 1982 में तरंग संस्था द्वारा काशी की लता की उपाधि दी गई थी। इसके अलावा राज्यसभा द्वारा उन्हें रोल मॉडल सम्मान से भी नवाजा गया। वह लंबे समय से निशुल्क संगीत शिक्षा प्रदान कर रही हैं, जिससे समाज के कमजोर वर्गों को कला से जोड़ने का उनका प्रयास निरंतर जारी है। उनके प्रेरणादायक जीवन पर आधारित मंगला नामक एक मराठी फिल्म भी बनाई गई है, जिसने उनके संघर्ष और उपलब्धियों को व्यापक पहचान दिलाई।
वहीं चिकित्सा के क्षेत्र में बीएचयू के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के मेडिसिन विभाग से जुड़े प्रोफेसर श्याम सुंदर अग्रवाल को कालाजार के निदान और उपचार में असाधारण योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान देने की घोषणा की गई है। उन्होंने इस घातक बीमारी के उपचार को सरल, प्रभावी और सुलभ बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई है। उनके शोध कार्यों के लिए उन्हें राष्ट्रपति द्वारा विजिटर पुरस्कार और डा पी एन राजू ओरेशन सम्मान भी प्रदान किया जा चुका है।
प्रोफेसर श्याम सुंदर अग्रवाल ने लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी की एकल खुराक से कालाजार के उपचार की विधि विकसित की, जिसे चिकित्सा जगत में एक बड़ी सफलता माना गया। यह उपचार पद्धति विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मान्यता प्राप्त है और भारत में राष्ट्रीय कालाजार नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत लागू की जा चुकी है। इसके अलावा उन्होंने कालाजार के उपचार में मल्टी ड्रग थेरेपी का पहला सफल परीक्षण किया, जिसे भी डब्ल्यूएचओ से स्वीकृति मिली।
कालाजार के उन्मूलन की दिशा में उनके योगदान यहीं तक सीमित नहीं रहे। पेरेमोमाइसीन और मिल्टेफोसीन दवाओं के संयोजन को राष्ट्रीय नियंत्रण कार्यक्रम के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर लागू किया गया है। मिल्टेफोसीन दवा के विकास में उनकी अहम भूमिका रही, जिसका उपयोग भारत, नेपाल और बांग्लादेश सहित कई देशों में कालाजार उन्मूलन कार्यक्रमों में किया गया और अब यह दवा विश्व स्तर पर इस्तेमाल हो रही है। इसके साथ ही उन्होंने आरके 39 स्ट्रिप जांच का भी सबसे पहले परीक्षण किया, जिससे कालाजार के त्वरित निदान को संभव बनाया जा सका।
पद्मश्री सम्मानों की यह घोषणा काशी के शैक्षणिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर स्थापित करती है। बीएचयू के इन दोनों प्रोफेसरों की उपलब्धियां आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेंगी और काशी की बौद्धिक विरासत को और अधिक सशक्त करेंगी।
