वाराणसी (रामनगर): काशी की पौराणिक और ऐतिहासिक विरासत को समेटे रामनगर क्षेत्र आज अपनी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है। 'स्मार्ट सिटी' और स्वच्छता अभियान के बड़े-बड़े होर्डिंग्स के बीच जमीनी हकीकत यह है कि रामनगर के मुख्य बाजारों में एक भी ढंग का सार्वजनिक शौचालय नहीं है। यह विडंबना ही है कि जिस शहर को विश्व पटल पर चमकाने की बातें हो रही हैं, वहां के ऐतिहासिक किले के साये में रहने वाले व्यापारी, स्थानीय ग्राहक और दूर-दराज से आए पर्यटक केवल इसलिए परेशान हैं क्योंकि प्रशासन ने नित्य क्रिया जैसी बुनियादी जरूरत को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है। नगर निगम की कार्यशैली पर सवाल उठना लाजिमी है, कि एक तरफ खुले में शौच पर चालान काटने की फुर्ती दिखाई जाती है, तो दूसरी तरफ "जाएं तो जाएं कहां?" का कोई जवाब अधिकारियों के पास नहीं है।
स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रामनगर, जहां प्रतिदिन हजारों की संख्या में लोगों का आना-जाना होता है, वहां सामूहिक शौचालय की व्यवस्था नदारद है। सबसे विकट और शर्मनाक स्थिति महिलाओं की है। गांवों में जहां सरकार इज्जतघर बनवाकर महिलाओं के सम्मान की रक्षा का दावा करती है, वहीं शहरी क्षेत्र की चकाचौंध के बीच महिलाएं शर्मसार होने को मजबूर हैं। बाजार खरीदारी करने निकलीं महिलाएं अक्सर प्रसाधन की सुविधा न होने के कारण अपनी खरीदारी अधूरी छोड़कर घर लौटने को विवश हो जाती हैं। शहरीकरण की दौड़ में नीति-नियंताओं ने कंक्रीट के जंगल तो खड़े कर दिए, लेकिन इंसानी जरूरतों के लिए कोई ठोस नीति नहीं बनाई। सुलभ शौचालय की यह कमी अब केवल एक असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर जन-समस्या और स्वास्थ्य संकट बन चुकी है।
बाजार आईं महिलाओं का दर्द: "बिटिया के घर खिचड़ी भेजनी है, लेकिन शर्म के मारे बाजार में रुक नहीं सकती"
महिलाओं का दर्द न तो स्थानीय नेता समझ पा रहे हैं और न ही वातानुकूलित कमरों में बैठे अधिकारी। जब महिलाएं बाजार आती हैं और उन्हें लघुशंका की आवश्यकता महसूस होती है, तो उनके पास शर्मिंदगी के घूंट पीने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। कई बार मजबूरन उन्हें खुले स्थानों का रुख करना पड़ता है, जो सभ्य समाज के लिए एक तमाचा है। खिचड़ी (मकर संक्रांति) की खरीदारी करने बाजार आईं स्थानीय निवासी गीता देवी का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने अपनी व्यथा साझा करते हुए कहा, "बिटिया के ससुराल खिचड़ी भेजनी है, इसलिए जरूरी सामान खरीदने बाजार आई थी। लेकिन यहां तो एक बाथरूम तक नहीं है। जोर से लघुशंका लगी है, पर जाऊं कहां? अब मजबूरी में खरीदारी छोड़कर पहले घर भागना पड़ रहा है। क्या यही विकास है?"
वहीं, पश्चिम बंगाल से काशी घूमने आईं पर्यटक रीमा बनर्जी का अनुभव भी बेहद कड़वा रहा। रामनगर किले की ख्याति सुनकर आईं रीमा ने बताया, "हमने सुना था बनारस बदल गया है, लेकिन रामनगर में पर्यटकों के लिए बेसिक सुविधा तक नहीं है। एक महिला होने के नाते सड़क पर टॉयलेट ढूंढना और न मिलना कितना अपमानजनक होता है, यह प्रशासन को समझना चाहिए। इतनी भीड़भाड़ वाली जगह पर शौचालय न होना प्रशासन की बड़ी लापरवाही है।"
विकास की भेंट चढ़ा पुराना शौचालय, नया बना 'खंडहर'
प्रशासनिक अदूरदर्शिता का एक और नमूना रामनगर चौक में देखने को मिलता है। यहां पहले एक शौचालय हुआ करता था, जो स्थानीय लोगों और राहगीरों के काम आता था। लेकिन सड़क चौड़ीकरण के नाम पर उस शौचालय को जमींदोज कर दिया गया। विडंबना यह है कि तोड़ना तो याद रहा, लेकिन उसके बदले दूसरा निर्माण कराना विभाग भूल गया। विकल्प के तौर पर बैंक ऑफ बड़ौदा के बगल वाली गली में काफी अंदर एक शौचालय है भी, तो उसकी स्थिति किसी 'भूतहा खंडहर' से कम नहीं है। वह इतना अंदर है कि बाहरी पर्यटकों और नए ग्राहकों को उसकी भनक तक नहीं लगती। और अगर कोई वहां पहुंच भी जाए, तो उसकी जर्जर हालत देखकर उल्टे पांव भाग खड़ा हो। वहां न तो दरवाजों पर कुंडी है, न ही पानी की व्यवस्था और न ही सफाई। ऐसे में उसका होना न होना बराबर है।
व्यापारियों का आक्रोश: "धंधा करें या ग्राहकों को टॉयलेट का रास्ता बताएं?"
रामनगर के व्यापारी भी इस समस्या से खासे आहत हैं। गुरुद्वारा गली में स्थित प्रसिद्ध किराना स्टोर के मालिक सोमू ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, "हम टैक्स भरते हैं, लेकिन बदले में हमें क्या मिलता है? ग्राहक हमारी दुकान पर आते हैं और शौचालय पूछते हैं। सुविधा न होने के कारण वे जल्दी चले जाते हैं, जिससे हमारे व्यापार पर सीधा असर पड़ रहा है। दुकानदार खुद दिन भर दुकान पर बैठता है, हमारे लिए भी कोई व्यवस्था नहीं है।" वहीं, मेडिकल स्टोर संचालक आकाश ने कहा, "यह सिर्फ सुविधा की बात नहीं, स्वास्थ्य का मामला है। महिलाएं और बुजुर्ग सबसे ज्यादा परेशान होते हैं। कई बार पर्यटक हमारी दुकानों पर आकर मदद मांगते हैं, लेकिन हम भी लाचार हैं।" अन्य सभी व्यापारियों ने एक सुर में कहा कि अगर जल्द ही सुनवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
पार्षद ने उठाई 'पिंक टॉयलेट' की मांग, शासन को भेजा पत्रक
जनता के इस आक्रोश के बीच जब हमने पुराना रामनगर वार्ड नंबर 65 के पार्षद रामकुमार यादव जी से सवाल किया, तो उन्होंने स्वीकार किया कि यह समस्या गंभीर है। उन्होंने बताया, "मैं लगातार इस मुद्दे को उठा रहा हूं। चूंकि रामनगर में काशी नरेश का किला है, इसलिए यहां देश-विदेश से पर्यटक आते हैं। उनकी सुविधा और हमारी माताओं-बहनों के सम्मान के लिए मैंने शासन से 'पिंक टॉयलेट' (Pink Toilet) और सुलभ शौचालय कॉम्प्लेक्स के निर्माण की पुरजोर मांग की है। इस संबंध में एक लिखित पत्रक भी शासन को सौंपा जा चुका है। आगामी नगर निगम की बैठक में मैं इस मुद्दे को प्रमुखता से रखूंगा और मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि जल्द से जल्द इस कार्य को पूरा करवाकर जनता को राहत दी जाए।"
अब ऐसे में पूछता है,"न्यूज रिपोर्ट" सवाल बनकर रामनगर के जनता की आवाज, कि क्या नगर निगम कुंभकर्णी नींद से जागेगा या रामनगर की जनता और यहां आने वाले अतिथि यूं ही शर्मसार होते रहेंगे? चालान काटने वाली मशीनरी को यह समझना होगा कि समाधान दिए बिना दंड वसूलना न्याय नहीं, अत्याचार है।
वाराणसी: रामनगर/शौचालयों का अभाव बना अभिशाप, महिलाएं और दुकानदार परेशान, नगर निगम काट रहा चालान

ऐतिहासिक रामनगर में सार्वजनिक शौचालयों के अभाव से महिलाएं शर्मसार और नागरिक परेशान हैं, नगर निगम चालान काट रहा।
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