वाराणसी/रामनगर: काशी की धर्मनगरी के ऐतिहासिक उपनगर रामनगर में आज भोर की किरणें अपने साथ एक ऐसी मनहूस खबर लेकर आईं, जिसने पूरे क्षेत्र को शोक के सागर में डुबो दिया। वार्ड संख्या 65 के कर्मठ पार्षद रामकुमार यादव के सिर से ममता का वह आंचल हमेशा के लिए उठ गया, जिसकी छांव में पूरा परिवार और समाज शीतलता महसूस करता था। पार्षद की पूज्य माता और वरिष्ठ अधिवक्ता मुरारी लाल यादव की धर्मपत्नी, श्रीमती कमलावती देवी का आकस्मिक निधन केवल एक परिवार की क्षति नहीं, बल्कि रामनगर के सामाजिक और नैतिक मूल्यों के एक अध्याय का अवसान है। उनके निधन की सूचना जंगल में आग की तरह फैली और देखते ही देखते रामनगर के हर घर में उदासी की लहर दौड़ गई।
श्रीमती कमलावती देवी का व्यक्तित्व केवल एक गृहिणी तक सीमित नहीं था, वे भारतीय नारी की उस परम्परा की संवाहक थीं, जिसमें त्याग, तपस्या और ममता का त्रिवेणी संगम होता है। पिछले कुछ समय से वे अस्वस्थ चल रही थीं और शारीरिक कष्ट झेल रही थीं, लेकिन उनके चेहरे की सौम्यता और स्वभाव की मिठास अंत समय तक कम नहीं हुई।
परिजनों के अनुसार, बीती रात उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी और नियति के क्रूर चक्र ने अपना काम कर दिया। आज तड़के, ब्रह्म मुहूर्त में लगभग तीन बजे, उन्होंने अपनी नश्वर देह त्याग कर परलोक की यात्रा आरम्भ की। उनके छोटे पुत्र और युवा अधिवक्ता आनंद यादव ने रुंधे गले से बताया कि माँ का जाना घर की नींव के हिल जाने जैसा है, एक ऐसा शून्य जो शायद कभी नहीं भर पाएगा।
अपने पीछे वे एक भरा-पूरा संस्कारवान परिवार छोड़ गई हैं। चार पुत्रियों और दो पुत्रों के लालन-पालन में उन्होंने जिस अनुशासन और स्नेह का परिचय दिया, उसी का परिणाम है कि आज उनकी संताने समाज में प्रतिष्ठित स्थान रखती हैं। विशेष रूप से पार्षद रामकुमार यादव पर तो दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा है। अपनी माँ के पार्थिव शरीर के समीप बैठे रामकुमार यादव की आँखों में असीम पीड़ा स्पष्ट दिखाई दे रही थी। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि “माँ केवल जन्मदात्री नहीं थीं, वे मेरी प्रथम गुरु और जीवन की सबसे बड़ी शक्ति थीं। समाज सेवा और ईमानदारी के जिस पथ पर मैं आज चल रहा हूँ, वह उन्हीं के संस्कारों की देन है। आज उनके जाने से ऐसा लग रहा है मानो सिर से आसमान हट गया हो।”
स्वर्गीय कमलावती देवी एक अत्यंत मिलनसार और धर्मपरायण महिला थीं। उनका जीवन सादगी की एक खुली किताब थी, जिसमें हर किसी के लिए प्रेम और आशीर्वाद लिखा था। मोहल्ले के लोग बताते हैं कि लंबी बीमारी के बावजूद उनकी आस्था कभी नहीं डगमगाई और वे हमेशा ईश्वर के ध्यान में मग्न रहती थीं। उनकी अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब उनकी इसी लोकप्रियता और स्वीकार्यता का प्रमाण था। क्या जनप्रतिनिधि, क्या अधिवक्ता, क्या व्यापारी और क्या आम नागरिक—हर वर्ग के लोग अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने पहुंचे। शवयात्रा में शामिल हर व्यक्ति की आँखें नम थीं और जुबां पर केवल कमलावती देवी के वात्सल्य और उनके द्वारा समाज को दिए गए संस्कारों की चर्चा थी।
रामनगर के घाट पर जब उनका अंतिम संस्कार किया गया, तो माहौल पूरी तरह गमगीन हो चुका था। अग्नि को साक्षी मानकर जब उन्हें विदाई दी गई, तो उपस्थित जनसमूह ने महसूस किया कि रामनगर ने आज अपनी एक ‘माँ’ को खो दिया है। यह निधन एक व्यक्तिगत क्षति से कहीं ऊपर उठकर एक सामाजिक रिक्ति बन गया है। कमलावती देवी की स्मृतियां, उनका स्नेहिल स्पर्श और उनकी दी हुई सीख अब यादों के रूप में सदैव जीवित रहेंगी। ईश्वर उनकी पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दे और शोकाकुल परिवार को इस असहनीय वज्रपात को सहन करने की शक्ति प्रदान करे।
