वाराणसी: मोक्षदायिनी काशी के घाट जहाँ अमूमन केवल अध्यात्म और वैराग्य की खुशबू से महकते हैं, वहीं इस बार अस्सी घाट पर एक अलग ही दृश्य देखने को मिला। विश्वप्रसिद्ध गंगा आरती इस बार केवल भक्ति का केंद्र नहीं रही, बल्कि राष्ट्रवाद की एक अटूट धारा में परिवर्तित हो गई। ‘माँ गंगा सेवा समिति’ द्वारा आयोजित इस विशेष संध्या आरती में राष्ट्रप्रेम का ऐसा ज्वार उठा कि गंगा की लहरों के साथ-साथ हर श्रद्धालु का हृदय देशभक्ति के रंग में सराबोर नजर आया। यह आयोजन इस बात का जीवंत प्रमाण बना कि काशी की मिट्टी में जितनी गहरी जड़ें धर्म की हैं, उतनी ही अटूट श्रद्धा देश के प्रति भी है।
अस्सी घाट का दृश्य उस शाम किसी उत्सव से कम नहीं था। पूरे आरती स्थल को कलात्मक रूप से भारतीय तिरंगे के स्वरूप में सजाया गया था। केसरिया, सफेद और हरे रंग के फूलों की लड़ियां और विशेष विद्युत सज्जा ने घाट को एक भव्य राष्ट्रभक्ति के कैनवास में बदल दिया था। जैसे ही शंखनाद के साथ आरती की प्रक्रिया शुरू हुई, घाट पर मौजूद हजारों श्रद्धालुओं ने एक सुर में ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम्’ का उद्घोष किया। मंत्रोच्चार की गूंज और देशभक्ति के जयकारों के मिलन ने एक ऐसा अलौकिक वातावरण तैयार किया, जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति के रोंगटे खड़े कर दिए।
परंपरागत मर्यादा का पालन करते हुए सात अर्चकों ने पूरी गरिमा के साथ माँ गंगा की आराधना की। भारी पीतल के दीपदानों को जब अर्चकों ने एक लय में हवा में घुमाया, तो उनकी लौ में राष्ट्र के प्रति समर्पण की चमक साफ दिखाई दे रही थी। इस बार की प्रार्थनाओं में केवल व्यक्तिगत सुख-समृद्धि की कामना ही नहीं थी, बल्कि माँ गंगा से देश की अखंडता, शांति और सीमा पर तैनात जवानों की सुरक्षा के लिए विशेष आशीष मांगा गया। दीपों की रोशनी जब गंगा के जल में प्रतिबिंबित हुई, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो मां गंगा स्वयं तिरंगे की आभा को अपने भीतर समेटे हुए हैं।
इस गौरवशाली शाम का सबसे भावुक क्षण वह था जब देश के वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। घाट के बीचों-बीच शहीदों के सम्मान में एक विशाल और आकर्षक रंगोली बनाई गई थी, जिसके चारों ओर हजारों दीप जलाए गए। चकाचौंध और उत्साह के बीच, जब अमर बलिदानियों की याद में मौन रखा गया, तो पूरा घाट एक गंभीर शांति में डूब गया। यह क्षण श्रद्धालुओं को यह याद दिलाने के लिए काफी था कि हम जिस धार्मिक स्वतंत्रता का आनंद ले रहे हैं, उसकी रक्षा के लिए सीमा पर कितने ही वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी है।
इस विशेष आयोजन ने न केवल स्थानीय लोगों बल्कि सात समुंदर पार से आए पर्यटकों को भी मंत्रमुग्ध कर दिया। विदेशी पर्यटकों के लिए यह एक अनोखा अनुभव था, जहाँ उन्होंने भारत की आध्यात्मिक शक्ति और राष्ट्रीय गौरव को एक साथ महसूस किया। माँ गंगा सेवा समिति के सदस्यों ने बताया कि इस आयोजन का उद्देश्य युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ उनमें देशप्रेम की भावना को और प्रगाढ़ करना है। काशी की यह ‘देशभक्ति वाली आरती’ आज पूरे सोशल मीडिया और चर्चाओं का केंद्र बनी हुई है, जो यह संदेश देती है कि राष्ट्र से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
