ट्रांसफर के नाम पर शिक्षकों से करोड़ों की ठगी, फर्जी अफसर बनकर डराते थे आरोपी, दो गिरफ्तार
उत्तर प्रदेश में शिक्षकों को ट्रांसफर और पोस्टिंग का भय दिखाकर ठगी करने वाले एक संगठित साइबर गिरोह का पुलिस ने पर्दाफाश किया है। इस मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जो खुद को बेसिक शिक्षा अधिकारी या विभागीय अधिकारी बताकर शिक्षकों से मोटी रकम वसूलते थे। पुलिस जांच में सामने आया है कि अब तक करीब 90 शिक्षक इस गिरोह के झांसे में आ चुके हैं और उनसे डेढ़ से दो करोड़ रुपये तक की ठगी की जा चुकी है।
गिरफ्तार आरोपी और फरार साथी की तलाश जारी
पुलिस के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों की पहचान बरेली जिले के फतेहगंज पश्चिमी थाना क्षेत्र के रहपुरा जागीर निवासी नरेंद्र पाल और सीवीगंज टेवुलिया निवासी सौरभ के रूप में हुई है। वहीं इस गिरोह का तीसरा सदस्य विक्रम मिश्रा, जो दिल्ली के आर्य नगर का निवासी बताया जा रहा है, अभी फरार है। पुलिस उसकी गिरफ्तारी के लिए लगातार दबिश दे रही है और संभावित ठिकानों पर छापेमारी जारी है।
शिकायत के बाद शुरू हुई जांच, सामने आया बड़ा नेटवर्क
पुलिस अधीक्षक कमलेश बहादुर ने बताया कि इस पूरे मामले का खुलासा 21 मार्च को दर्ज एक शिकायत के बाद हुआ। घोसी क्षेत्र के रघौली निवासी रोली ने पुलिस को सूचना दी कि उनकी मां चिंता देवी, जो दोहरीघाट स्थित एक कंपोजिट विद्यालय में सहायक अध्यापिका हैं, को एक अज्ञात व्यक्ति का फोन आया था। कॉल करने वाले ने खुद को शिक्षा विभाग का अधिकारी बताते हुए तत्काल ट्रांसफर की चेतावनी दी और कहा कि उनके स्थान पर एक कैंसर पीड़ित शिक्षक की नियुक्ति की जा रही है।
आरोपी ने शिक्षिका पर दबाव बनाते हुए कहा कि यदि 50 हजार रुपये तुरंत भेज दिए जाएं तो उनका ट्रांसफर रोका जा सकता है। भय के कारण शिक्षिका ने बताए गए स्कैनर के माध्यम से पैसे भेज दिए, लेकिन इसके बाद आरोपी का मोबाइल बंद हो गया। तब उन्हें ठगी का एहसास हुआ और पुलिस से शिकायत की गई।
इंटरनेट के जरिए बनाते थे निशाना
जांच के दौरान पुलिस की संयुक्त टीम ने भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की पहचान की। लोकेशन ट्रेस करते हुए 12 अप्रैल की शाम करीब छह बजे दोनों आरोपियों को बरेली से गिरफ्तार कर लिया गया। पूछताछ में आरोपियों ने बताया कि वे इंटरनेट के जरिए शिक्षकों से जुड़ी खबरें और शिकायतें खंगालते थे। जिन शिक्षकों के खिलाफ जांच या ट्रांसफर की प्रक्रिया चल रही होती, उन्हें टारगेट बनाया जाता था।
इसके बाद आरोपी संबंधित क्षेत्र के ग्राम प्रधान से संपर्क कर खुद को अधिकारी बताते और शिक्षक का मोबाइल नंबर हासिल कर लेते थे। फिर सीधे शिक्षक को कॉल कर ट्रांसफर या कार्रवाई का भय दिखाया जाता और स्कैनर के जरिए पैसे मंगवाए जाते थे।
ठगी की रकम अलग अलग खातों में बांटी जाती थी
आरोपियों ने खुलासा किया कि ठगी से प्राप्त रकम को गिरोह के अन्य सदस्य अलग अलग बैंक खातों के माध्यम से निकालते थे और फिर आपस में बांट लेते थे। पुलिस ने उनके पास से शिक्षकों का डेटा, महत्वपूर्ण दस्तावेज, एटीएम कार्ड और बैंक पासबुक बरामद किए हैं, जो इस संगठित अपराध की गंभीरता को दर्शाते हैं।
कई राज्यों में दर्ज हैं मुकदमे
पुलिस के मुताबिक इस गिरोह के खिलाफ हरियाणा, मुजफ्फरनगर, बिजनौर और बरेली समेत कई जिलों में पहले से ही मामले दर्ज हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह गिरोह लंबे समय से सक्रिय था और बड़े पैमाने पर लोगों को निशाना बना रहा था।
पुलिस की अपील और आगे की कार्रवाई
फिलहाल पुलिस फरार आरोपी की तलाश में जुटी हुई है और गिरोह से जुड़े अन्य संभावित सदस्यों की भी जांच की जा रही है। पुलिस ने शिक्षकों और आम लोगों से अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल, विशेषकर ट्रांसफर या सरकारी कार्रवाई के नाम पर आने वाले फोन से सतर्क रहें। बिना पुष्टि किए किसी भी खाते या स्कैनर पर पैसे ट्रांसफर न करें और ऐसी किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत सूचना संबंधित पुलिस थाने को दें।
इस कार्रवाई को पुलिस की बड़ी सफलता माना जा रहा है, क्योंकि इससे एक ऐसे संगठित साइबर अपराध नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जो सरकारी कर्मचारियों के बीच भय पैदा कर आर्थिक शोषण कर रहा था।
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