वाराणसी में होली की तिथियां स्पष्ट: होलिका दहन 2 मार्च, रंगों की होली 4 मार्च को

By
Sandeep Srivastava
Sandeep Srivastava serves as a Sub Editor at News Report, a registered Hindi newspaper dedicated to ethical, accurate, and reader-focused journalism. He is responsible for copy...
5 Min Read
बीएचयू के ज्योतिषाचार्यों ने वाराणसी में होली की सही तिथियां घोषित कीं।

वाराणसी में होली की तिथियों पर स्थिति स्पष्ट

वाराणसी में होली पर्व की तिथियों को लेकर देशभर में चल रहे असमंजस के बीच काशी के विद्वानों ने पंचांग आधारित निर्णय सार्वजनिक किया है। इस विषय पर काशी के प्रमुख शिक्षण संस्थान बीएचयू के ज्योतिषाचार्यों ने आपसी विचार विमर्श के बाद यह स्पष्ट किया कि इस वर्ष 2 मार्च को होलिका दहन किया जाएगा और रंगों की होली 4 मार्च को मनाई जाएगी। विद्वानों के अनुसार 3 मार्च को चंद्र ग्रहण होने के कारण उस दिन होली मनाना शास्त्र सम्मत नहीं माना जाता है। इसी कारण परंपरागत मान्यताओं और पंचांग नियमों के अनुरूप तिथि को एक दिन आगे बढ़ाया गया है।

पंचांग गणना और ग्रहण का प्रभाव

ज्योतिषाचार्यों ने बताया कि हिंदू पंचांग की गणना चंद्रमा की गति और तिथियों पर आधारित होती है। होलिका दहन फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा की संध्या में किया जाता है और उसके अगले दिन रंगों के साथ होली खेली जाती है। जब पूर्णिमा तिथि के दौरान ग्रहण पड़ता है तब धार्मिक कर्मकांडों में विशेष सावधानी बरतने की परंपरा रही है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार ग्रहण काल में पूजा पाठ और मांगलिक कार्यों से परहेज किया जाता है। इस वर्ष 3 मार्च को चंद्र ग्रहण का काल दोपहर से शाम तक रहने की जानकारी दी गई है। इसी आधार पर विद्वानों ने यह निष्कर्ष निकाला कि होली का सार्वजनिक उत्सव 4 मार्च को मनाना अधिक उपयुक्त है।

काशी में विद्वानों के बीच समन्वय

काशी में ज्योतिषाचार्यों के बीच इस विषय पर कई दौर की चर्चा हुई। उद्देश्य यह था कि अलग अलग पंचांगों में तिथि के आरंभ और समाप्ति को लेकर जो मतभेद सामने आते हैं उन्हें दूर किया जा सके। विद्वानों ने देश के अन्य क्षेत्रों के ज्योतिषाचार्यों से भी संवाद किया ताकि एकरूपता बनी रहे और आमजन को स्पष्ट संदेश मिले। इस प्रक्रिया में शास्त्रों में वर्णित नियमों और परंपराओं को आधार बनाया गया। उनका कहना है कि खगोलीय घटनाओं के साथ धार्मिक परंपराओं का संतुलन बनाना आवश्यक है ताकि श्रद्धालुओं की आस्था बनी रहे और किसी तरह का भ्रम न फैले।

होलिका दहन और होली का सांस्कृतिक महत्व

होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। प्रह्लाद और होलिका की कथा से जुड़ा यह पर्व समाज को यह संदेश देता है कि अधर्म और अहंकार का अंत निश्चित है। इसके अगले दिन मनाई जाने वाली होली सामाजिक समरसता और आपसी भाईचारे का पर्व है। इस दिन लोग रंग गुलाल लगाकर पुराने मतभेद भुलाते हैं और परिजनों तथा मित्रों के साथ उल्लास साझा करते हैं। वाराणसी जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र में होली का उत्सव परंपरा और लोक संस्कृति के अनूठे मेल के साथ मनाया जाता है। घाटों और गलियों में रंगों की रौनक देखने को मिलती है और स्थानीय परंपराएं इस पर्व को विशेष स्वरूप देती हैं।

प्रशासन और समाज के लिए अपील

धार्मिक संगठनों और समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने आमजन से अपील की है कि वे पंचांग आधारित निर्णयों के अनुरूप ही पर्व मनाएं। विद्वानों का कहना है कि इस निर्णय का उद्देश्य किसी क्षेत्र की परंपरा में हस्तक्षेप करना नहीं है बल्कि शास्त्रीय मान्यताओं के अनुरूप एकरूपता बनाए रखना है। पर्व त्योहारों का मूल उद्देश्य समाज में सौहार्द और उल्लास बढ़ाना होता है इसलिए तिथियों को लेकर विवाद से बचते हुए शांति और सद्भाव के साथ होली मनाने की सलाह दी गई है।

पृष्ठभूमि और व्यापक संदर्भ

हर वर्ष होली की तिथि को लेकर अलग अलग पंचांगों में अंतर देखने को मिलता है। इसका कारण तिथि निर्धारण की अलग पद्धतियां और खगोलीय स्थितियों की व्याख्या है। जब ग्रहण जैसी घटनाएं पर्व के दिन पड़ती हैं तब निर्णय और भी संवेदनशील हो जाता है। काशी के विद्वानों की पहल से इस वर्ष तिथियों को लेकर फैला भ्रम काफी हद तक दूर हुआ है। उम्मीद है कि श्रद्धालु इस निर्णय का सम्मान करते हुए परंपरा और पंचांग गणना दोनों का संतुलन बनाए रखेंगे और पर्व को सामाजिक सौहार्द के साथ मनाएंगे।