चैत्र नवरात्रि का पांचवां दिन वाराणसी में स्कंदमाता के दर्शन को उमड़ा जनसैलाब भोर से गूंजा भक्तिमय वातावरण
वाराणसी: चैत्र नवरात्रि के पांचवें दिन सोमवार को मां दुर्गा के पंचम स्वरूप स्कंदमाता की पूजा पूरे विधि विधान के साथ संपन्न हो रही है। धर्मनगरी में इस दिन का विशेष धार्मिक महत्व देखा जा रहा है। जैतपुरा स्थित प्राचीन स्कंदमाता मंदिर में तड़के भोर चार बजे से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगनी शुरू हो गईं। सुबह होते होते मंदिर परिसर में भारी भीड़ उमड़ पड़ी और पूरा वातावरण भक्तिमय भजनों और मंत्रोच्चार से गूंज उठा।
भोर से ही मंदिर में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
स्थानीय लोगों के अनुसार स्कंदमाता मंदिर वर्ष भर सीमित समय के लिए खुलता है लेकिन नवरात्रि के दौरान यहां पूरे दिन दर्शन की व्यवस्था रहती है। यही कारण है कि इस अवसर पर दूर दराज से आने वाले श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं। सोमवार को भी सुबह से ही महिलाओं पुरुषों बुजुर्गों और युवाओं के साथ साथ बड़ी संख्या में छात्र छात्राएं माता के दर्शन के लिए कतारों में नजर आए।
पंचामृत अभिषेक और भव्य श्रृंगार
मंदिर में पूजा अर्चना की शुरुआत मां स्कंदमाता के पंचामृत अभिषेक से हुई। इसके बाद माता का भव्य श्रृंगार किया गया जिसमें गुड़हल गेंदा और गुलाब के फूलों से उन्हें सजाया गया। माता का अलौकिक स्वरूप देखते ही बन रहा था। श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं के अनुसार पीले रंग की वस्तुएं अर्पित कर रहे हैं। पीली बर्फी नारियल और चुनरी चढ़ाने की परंपरा पूरे दिन जारी रही जिसे शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
विद्यार्थियों में विशेष आस्था
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां स्कंदमाता को देवी वागेश्वरी का स्वरूप माना जाता है जो विद्या और बुद्धि की अधिष्ठात्री हैं। यही वजह है कि इस दिन विद्यार्थी वर्ग विशेष रूप से माता के दर्शन के लिए पहुंचता है और सफलता तथा ज्ञान की कामना करता है। मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में छात्र छात्राएं माता के चरणों में नतमस्तक होकर आशीर्वाद लेते नजर आए।
पौराणिक महत्व और आस्था
पुराणों के अनुसार मां स्कंदमाता भगवान स्कंद यानी कार्तिकेय की माता हैं जिन्होंने देवताओं की ओर से असुरों का संहार किया था। मां ने अपने पुत्र को तारकासुर के वध के योग्य बनाया जिससे उनका स्वरूप मातृत्व और शक्ति का अद्वितीय उदाहरण बन गया। भक्तों के बीच यह विश्वास है कि सच्चे मन से की गई आराधना से माता सुख शांति और समृद्धि प्रदान करती हैं और जीवन की कठिनाइयों से रक्षा करती हैं।
मंत्रोच्चार से गूंजा मंदिर परिसर
पूजा के दौरान श्रद्धालुओं ने विशेष मंत्रों का जाप कर माता को प्रसन्न किया। मंदिर परिसर में लगातार देवी स्तुति और मंत्रोच्चार होता रहा जिससे वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक हो गया। श्रद्धालु भक्ति भाव के साथ पूजा अर्चना में लीन नजर आए और माता के जयकारों से पूरा क्षेत्र गूंजता रहा।
व्रत और पूजा के नियम
धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस दिन श्रद्धालुओं को प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने और पीले रंग को विशेष महत्व देने की सलाह दी जाती है। माता को केले घी से बने प्रसाद और पंचामृत अर्पित करना शुभ माना जाता है। व्रत रखने वाले भक्त दिनभर संयम और सात्विकता का पालन करते हैं और संध्या समय आरती के बाद व्रत का पारण करते हैं।
आस्था और परंपरा का जीवंत स्वरूप
वाराणसी में नवरात्रि का यह दृश्य केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं बल्कि शहर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी दर्शाता है। स्कंदमाता के दर्शन के लिए उमड़ी यह भीड़ इस बात का प्रमाण है कि आज भी लोगों की आस्था और विश्वास की जड़ें गहरी हैं और यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी जीवंत बनी हुई है।
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