वाराणसी में गीत संगीत और उमंग के बीच सजा तीज महोत्सव महिलाओं की प्रतिभा ने बांधा समां
वाराणसी में सामाजिक और सांस्कृतिक संस्था उद्धव फाउंडेशन के तत्वाधान में तीज महोत्सव का भव्य आयोजन प्रिंस डायमंड होटल के प्रांगण में किया गया। गीत संगीत नृत्य भक्ति और उमंग से सजे इस आयोजन में महिलाओं ने पूरे उत्साह के साथ सहभागिता की। रंग बिरंगे परिधानों में सजी महिलाओं की मौजूदगी ने कार्यक्रम स्थल को उत्सव के रंग में रंग दिया। कार्यक्रम के दौरान तीज की पारंपरिक संस्कृति लोकगीतों कजरी और नृत्य की मनमोहक प्रस्तुतियों ने वातावरण को उल्लास से भर दिया। कार्यक्रम में 60 से अधिक महिलाओं ने गायन और नृत्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
दीप प्रज्वलन के साथ हुआ तीज महोत्सव का शुभारंभ
तीज महोत्सव का शुभारंभ मुख्य अतिथि समाजसेवी और भाजपा की पूर्व जिला मंत्री श्रीमती अन्नपूर्णा श्रीवास्तव तथा विशिष्ट अतिथियों श्रीमती कंचन वार्ष्णेय श्रीमती सुलेखा सिंह श्रीमती अंजना श्रीवास्तव और संस्था की महामंत्री पल्लवी वार्ष्णेय ने दीप प्रज्वलन कर किया। शुभारंभ के अवसर पर कार्यक्रम की संयोजक पायल सरल ने रंग बिरंगे परिधान में सुसज्जित होकर गणेश वंदना और भजन की प्रस्तुति दी। भक्ति संगीत से शुरू हुए कार्यक्रम ने आगे चलकर तीज के पारंपरिक रंग को और गहरा कर दिया।
कजरी और तीज गीतों ने बांधा समां
तीज महोत्सव के दौरान विख्यात गायिका संगीता भट्टाचार्य और प्रतिमा विश्वकर्मा के साथ आरती केसरी और नीतू सिंह ने कजरी तथा तीज गीतों की प्रस्तुति देकर कार्यक्रम में लोक संस्कृति की सुगंध बिखेरी। पारंपरिक गीतों की स्वर लहरियों के बीच महिलाओं ने उत्साहपूर्वक भागीदारी की। सरिता नारंग पल्लवी विश्वकर्मा रिचा सेठ सरिता मौर्य और वर्षा गुप्ता ने तीज पर आधारित गीतों पर नृत्य प्रस्तुत कर कार्यक्रम को आकर्षक बना दिया। उनकी प्रस्तुतियों के दौरान प्रांगण तालियों से गूंजता रहा।
60 से अधिक महिलाओं ने दिखाई प्रतिभा
उद्धव फाउंडेशन की ओर से आयोजित इस प्रतियोगिता में 60 से अधिक महिलाओं ने गायन और नृत्य के माध्यम से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। आयोजन का उद्देश्य केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा बल्कि तीज जैसे पारंपरिक पर्व से जुड़ी लोक संस्कृति गीत संगीत और महिला सहभागिता को मंच प्रदान करना भी रहा। प्रतियोगिता में महिलाओं ने पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लिया और अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से पारंपरिक संस्कृति को जीवंत रूप में सामने रखा।
श्वेता अग्रहरि बनीं तीज क्वीन
कार्यक्रम में श्रीमती श्वेता अग्रहरि को तीज क्वीन के सम्मान से सम्मानित किया गया। वहीं गायन प्रतियोगिता में पूजा मिश्रा प्रतिमा त्रिपाठी और आरती केसरी ने क्रमशः प्रथम द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त किया। नृत्य प्रतियोगिता में बंदना सिंह किरन वर्मा और सुरभि कुमारी ने क्रमशः प्रथम द्वितीय और तृतीय स्थान हासिल किया। विजेता प्रतिभागियों का उत्साह कार्यक्रम के दौरान देखते ही बन रहा था।
पुष्पकला झा ने किया सफल संचालन
कार्यक्रम का सफल संचालन पुष्पकला झा ने किया। संस्था की महामंत्री पल्लवी वार्ष्णेय ने मुख्य अतिथि तथा उपस्थित गणमान्य अतिथियों का स्वागत संबोधन के माध्यम से स्वागत किया। कार्यक्रम प्रभारी श्रीमती कुमकुम पटेल ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी अतिथियों प्रतिभागियों और संस्था से जुड़े सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया। प्रतियोगिता में सरिता कल्पना गुप्ता रेखा वर्मा और संतोषी गुप्ता ने निर्णायक की भूमिका निभाई।
कई गणमान्य महिलाओं की रही मौजूदगी
तीज महोत्सव में सोनल गुप्ता संगीता सेठ पूजा खडसे दिव्या मेहता श्वेता अग्रहरि अमृता गुप्ता गुरजीत पूजा कश्यप तनुजा भंडारी भावना कुशवाहा बिना सिंह सहित अनेक गणमान्य महिलाएं मौजूद रहीं। कार्यक्रम के दौरान महिलाओं ने एक दूसरे का उत्साह बढ़ाया और पारंपरिक पर्व की खुशियों को साझा किया। आयोजन में गीत संगीत नृत्य और सामाजिक सहभागिता का ऐसा संगम देखने को मिला जिसमें तीज की पारंपरिक भावना के साथ आधुनिक मंचीय प्रस्तुति भी दिखाई दी।
तीज महोत्सव का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
तीज भारतीय संस्कृति में महिलाओं से जुड़े प्रमुख पर्वों में शामिल है। उत्तर भारत में हरियाली तीज कजरी तीज और हरतालिका तीज का विशेष महत्व माना जाता है। हरतालिका तीज भगवान शिव और माता पार्वती के दांपत्य जीवन और माता पार्वती की कठिन तपस्या से जुड़ा पर्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर सुखी वैवाहिक जीवन परिवार की खुशहाली और पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। अविवाहित युवतियां भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत रखती हैं।
माता पार्वती की तपस्या से जुड़ी है हरतालिका तीज की कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने कठोर तपस्या की। कथा के अनुसार माता पार्वती के पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से करना चाहते थे लेकिन माता पार्वती की इच्छा भगवान शिव को पति के रूप में पाने की थी। ऐसी स्थिति में उनकी सखी उन्हें एक वन में ले गईं जहां माता पार्वती ने भगवान शिव की आराधना और कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या और अटूट संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। इसी पौराणिक प्रसंग से हरतालिका तीज की परंपरा को जोड़ा जाता है।
हरतालिका नाम के पीछे भी है विशेष मान्यता
धार्मिक मान्यता में हरतालिका शब्द को हरत और आलिका से जोड़कर समझाया जाता है। हरत का अर्थ हरण या अपने साथ ले जाना और आलिका का अर्थ सखी माना जाता है। कथा के अनुसार माता पार्वती की सखी उन्हें अपने साथ वन में ले गई थी ताकि उनकी इच्छा के विपरीत विवाह न हो और वे भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए अपनी तपस्या पूरी कर सकें। इसी प्रसंग के कारण इस पर्व का नाम हरतालिका तीज माना जाता है।
तीज व्रत में पूजा और श्रृंगार की परंपरा
हरतालिका तीज पर महिलाएं प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ और पारंपरिक वस्त्र धारण करती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं मेहंदी लगाती हैं और भगवान शिव तथा माता पार्वती की पूजा करती हैं। परंपरा के अनुसार मिट्टी या बालू से भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाएं बनाकर पूजा करने की भी मान्यता है। पूजा में पुष्प अक्षत फल नैवेद्य धूप दीप और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। इसके बाद हरतालिका तीज की कथा सुनी या पढ़ी जाती है और भगवान शिव तथा माता पार्वती से परिवार की सुख समृद्धि और वैवाहिक जीवन की मंगलकामना की जाती है।
2026 में 14 सितंबर को मनाई जाएगी हरतालिका तीज
वर्ष 2026 में हरतालिका तीज सोमवार 14 सितंबर को मनाई जाएगी। वाराणसी के लिए उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार भी हरतालिका तीज 14 सितंबर 2026 सोमवार को है। तृतीया तिथि 13 सितंबर की सुबह लगभग 7 बजकर 8 मिनट से शुरू होकर 14 सितंबर की सुबह लगभग 7 बजकर 7 मिनट तक रहने की जानकारी उपलब्ध है। पूजा के लिए प्रातःकाल का समय विशेष माना जाता है। अलग अलग पंचांग और स्थान के अनुसार पूजा मुहूर्त में कुछ अंतर हो सकता है इसलिए व्रत और पूजा करने वाली महिलाओं को स्थानीय पंचांग के अनुसार अंतिम समय की पुष्टि करना उचित रहेगा। 1
तीज केवल व्रत नहीं लोक संस्कृति का उत्सव भी
तीज की पहचान केवल धार्मिक व्रत के रूप में नहीं बल्कि भारतीय लोक संस्कृति के जीवंत पर्व के रूप में भी है। सावन और भाद्रपद के मौसम में तीज से जुड़े गीत झूले मेहंदी पारंपरिक परिधान लोकगीत और नृत्य महिलाओं के सामाजिक जीवन में उत्साह भरते हैं। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश बिहार राजस्थान मध्य प्रदेश और झारखंड सहित कई क्षेत्रों में तीज की अलग अलग लोक परंपराएं देखने को मिलती हैं। कजरी गीतों में वर्षा प्रेम विरह और प्रकृति के भाव दिखाई देते हैं जबकि तीज के गीत वैवाहिक जीवन और पारिवारिक भावनाओं से भी जुड़े होते हैं।
उद्धव फाउंडेशन के आयोजन ने जीवंत की तीज की परंपरा
वाराणसी में उद्धव फाउंडेशन की ओर से आयोजित तीज महोत्सव इसी सांस्कृतिक परंपरा को मंच देने वाला आयोजन रहा। एक ओर जहां महिलाओं ने गीत और संगीत के माध्यम से अपनी प्रतिभा दिखाई वहीं दूसरी ओर नृत्य प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में उत्सव का रंग भर दिया। प्रतियोगिता में बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी ने यह भी दिखाया कि पारंपरिक पर्व आज भी सामाजिक और सांस्कृतिक सहभागिता का महत्वपूर्ण माध्यम बने हुए हैं। कार्यक्रम में सम्मान प्रतियोगिता लोकगीत और नृत्य के माध्यम से तीज की परंपरा को एक नए मंचीय रूप में प्रस्तुत किया गया।
उद्धव फाउंडेशन की ओर से आयोजन का संदेश
उद्धव फाउंडेशन की महामंत्री पल्लवी वार्ष्णेय के अनुसार तीज महोत्सव के माध्यम से महिलाओं को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के साथ साथ भारतीय संस्कृति और परंपराओं से जुड़ने का अवसर मिला। कार्यक्रम में शामिल महिलाओं ने गीत संगीत और नृत्य के माध्यम से अपनी रचनात्मकता का प्रदर्शन किया। आयोजन ने धार्मिक आस्था सामाजिक सहभागिता महिला प्रतिभा और लोक संस्कृति को एक ही मंच पर जोड़ने का कार्य किया।
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