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Varanasi

वाराणसी: कोर्ट का बड़ा फैसला, बदायूं SP सिटी अभिषेक सिंह को पूर्व पत्नी के मुकदमे से राहत

Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
Last updated: 20/04/2026 20:49
By
Sandeep Srivastava
Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
BySandeep Srivastava
Sandeep Srivastava serves as a Sub Editor at News Report, a registered Hindi newspaper dedicated to ethical, accurate, and reader-focused journalism. He is responsible for copy...
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5 Min Read
वाराणसी कोर्ट में एसपी सिटी अभिषेक सिंह के मामले की सुनवाई होते हुए
वाराणसी कोर्ट ने एसपी सिटी अभिषेक सिंह को पूर्व पत्नी के मुकदमे से राहत दी।
Contents
  • वाराणसी: कोर्ट का बड़ा फैसला बदायूं एसपी सिटी अभिषेक सिंह को मिली राहत पूर्व पत्नी का मुकदमा दर्ज कराने वाला प्रार्थना पत्र खारिज
  • विवाद की जड़ें और वैवाहिक समझौते का घटनाक्रम
  • धोखे से हस्ताक्षर कराने के आरोपों पर कोर्ट की टिप्पणी
  • अदालत का अंतिम निर्णय और पुलिस अधिकारी को मिली क्लीन चिट
  • महत्वपूर्ण न्यायिक संदर्भ

वाराणसी: कोर्ट का बड़ा फैसला बदायूं एसपी सिटी अभिषेक सिंह को मिली राहत पूर्व पत्नी का मुकदमा दर्ज कराने वाला प्रार्थना पत्र खारिज

वाराणसी: मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने उत्तर प्रदेश पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी और बदायूं के वर्तमान एसपी सिटी अभिषेक कुमार सिंह के खिलाफ उनकी पूर्व पत्नी द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना पत्र को निरस्त कर दिया है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मनीष कुमार की पीठ ने इस मामले में गहन सुनवाई करते हुए पाया कि आवेदिका द्वारा लगाए गए आरोप निराधार और तथ्यों से परे हैं। अदालत ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि यह कानूनी कदम केवल दबाव बनाने के उद्देश्य से उठाया गया था। अभिषेक कुमार सिंह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अंशुमान त्रिपाठी ने प्रभावी पैरवी करते हुए न्यायालय के समक्ष आवश्यक दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए जिसके आधार पर अदालत ने पूर्व पत्नी ऋषिका सिंह के तर्कों को अमान्य करार दिया।

विवाद की जड़ें और वैवाहिक समझौते का घटनाक्रम

इस कानूनी प्रकरण की शुरुआत वर्ष 2012 में हुई थी जब अभिषेक कुमार सिंह और वाराणसी निवासी ऋषिका सिंह का विवाह संपन्न हुआ था। वैवाहिक जीवन में उत्पन्न मतभेदों के कारण यह विवाद अंततः लखनऊ उच्च न्यायालय तक पहुंचा। उच्च न्यायालय की मध्यस्थता और सुलह समझौता केंद्र के माध्यम से दोनों पक्षों के बीच एक ठोस सहमति बनी थी। इस समझौते के तहत अभिषेक कुमार सिंह ने ऋषिका सिंह को छियालीस लाख रुपये की एकमुश्त राशि और एक फ्लैट प्रदान किया था। इस वित्तीय समझौते के पश्चात लखनऊ फैमिली कोर्ट में आपसी सहमति से तलाक की डिक्री पारित की गई थी। ऋषिका सिंह ने समझौते की समस्त शर्तों को स्वीकार करते हुए पूरी राशि भी प्राप्त कर ली थी जिसके साक्ष्य न्यायालय में प्रस्तुत किए गए।

धोखे से हस्ताक्षर कराने के आरोपों पर कोर्ट की टिप्पणी

तलाक की प्रक्रिया विधिवत संपन्न होने के काफी समय बाद ऋषिका सिंह ने वाराणसी के शिवपुर थाने और फिर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173 के तहत आरोप लगाया कि अभिषेक कुमार सिंह ने उन्हें गुमराह करके और धोखे से कागजात पर हस्ताक्षर करवाकर तलाक लिया है। आवेदिका का तर्क था कि उन्हें प्रक्रिया की पूरी जानकारी नहीं दी गई थी। हालांकि न्यायालय ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया क्योंकि रिकॉर्ड के अनुसार आवेदिका उच्च न्यायालय और परिवार न्यायालय की हर सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रही थीं। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि आवेदिका ने स्वयं कूलिंग पीरियड समाप्त करने के लिए लखनऊ खंडपीठ में याचिका दाखिल की थी जो उनके सक्रिय शामिल होने का प्रमाण है।

अदालत का अंतिम निर्णय और पुलिस अधिकारी को मिली क्लीन चिट

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मनीष कुमार ने समस्त न्यायिक दस्तावेजों और साक्ष्यों का अनुशीलन करने के बाद अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आवेदिका प्रत्येक स्तर पर व्यक्तिगत रूप से शामिल थीं और उन्होंने समझौते के समस्त लाभ स्वेच्छा से प्राप्त किए थे। ऐसी स्थिति में धोखे का आरोप लगाना विधिक रूप से मान्य नहीं है। न्यायालय ने पाया कि जब कोई पक्षकार उच्च न्यायिक प्रक्रियाओं में स्वयं भाग लेता है तो बाद में ऐसी दलीलें केवल दूसरे पक्ष को परेशान करने के लिए दी जाती हैं। इस निर्णायक आदेश के बाद बदायूं एसपी सिटी को बड़ी राहत मिली है और उनकी छवि धूमिल करने के प्रयासों पर विराम लग गया है।

महत्वपूर्ण न्यायिक संदर्भ

यह मामला वैवाहिक विवादों में आपसी सहमति से हुए समझौतों की महत्ता को दर्शाता है। न्यायिक विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च न्यायालय की देखरेख में हुए समझौतों को बाद में चुनौती देना चुनौतीपूर्ण होता है विशेषकर तब जब आर्थिक लाभ और संपत्ति का हस्तांतरण पहले ही हो चुका हो। वाराणसी कोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायपालिका तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर ही किसी भी आपराधिक प्रार्थना पत्र पर संज्ञान लेती है।

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अधिक जानकारी के लिए देखें Allahabad High Court एवं Varanasi District Court की आधिकारिक वेबसाइट।

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