जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा की अदालत का फैसला, 22 गवाहों और डिजिटल व फॉरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि; आदेश में महाभारत के श्लोकों का भी उल्लेख
मेरठ: उत्तर प्रदेश के मेरठ में बहुचर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को जिला एवं सत्र न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाया। अपनी पत्नी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला से जुड़े इस मामले में अदालत ने दोनों दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई। इस हत्याकांड ने मार्च 2025 में उस समय देशभर में सुर्खियां बटोरी थीं, जब सौरभ राजपूत का शव एक नीले प्लास्टिक के ड्रम से बरामद हुआ था। शव को छिपाने के लिए ड्रम में सीमेंट और रेत का इस्तेमाल किए जाने की बात जांच में सामने आई थी। मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और डिजिटल तथा फॉरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर अपना पक्ष रखा। अदालत ने 30 सितंबर 2026 को मुस्कान और साहिल को दोषी करार दिया था, जिसके बाद सजा की अवधि पर सुनवाई हुई।
30 सितंबर को दोषी ठहराए गए थे मुस्कान और साहिल
जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा की अदालत ने 30 सितंबर को मामले में फैसला सुनाते हुए मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को सौरभ राजपूत की हत्या और साक्ष्य मिटाने से जुड़े आरोपों में दोषी ठहराया था। इसके बाद अदालत ने सजा के प्रश्न पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। अभियोजन पक्ष ने अपराध की गंभीरता और परिस्थितियों का हवाला देते हुए मृत्युदंड की मांग की, जबकि बचाव पक्ष ने सजा में नरमी बरतने की दलील रखी। दोनों पक्षों की बहस और उपलब्ध अभिलेखों पर विचार करने के बाद अदालत ने 14 अक्टूबर को दोनों को मृत्युदंड सुनाया। इस फैसले के साथ ही लंबे समय से चर्चा में रहे इस मुकदमे में एक महत्वपूर्ण न्यायिक चरण पूरा हुआ है। हालांकि, मृत्युदंड के मामले में उच्च न्यायालय की पुष्टि सहित आगे की कानूनी प्रक्रिया भी आवश्यक होती है।
163 पेज के आदेश में महाभारत के श्लोकों का उल्लेख
इस मामले में जिला शासकीय अधिवक्ता कृष्ण कुमार चौबे के अनुसार, अदालत के 163 पृष्ठों के आदेश में महाभारत के तीन श्लोकों का उल्लेख किया गया। आदेश में न्याय, कानून और अपराध के अनुरूप दंड दिए जाने के महत्व को रेखांकित किया गया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, एक श्लोक के संदर्भ में यह भाव व्यक्त किया गया कि जिस प्रकार बाघ के रहने से जंगल सुरक्षित रहता है, उसी प्रकार कानून के अस्तित्व और प्रभावी क्रियान्वयन से मनुष्य सुरक्षित रहते हैं। न्याय का उद्देश्य अपराध की प्रकृति और गंभीरता के अनुरूप दंड सुनिश्चित करना है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, अदालत ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए माना कि दोषियों के कृत्य की गंभीरता के अनुरूप कठोरतम सजा उचित है।
अदालत के आदेश में महाभारत के संदर्भ का उल्लेख इस बात को सामने लाता है कि न्याय व्यवस्था में कानून के पालन और अपराध के लिए जवाबदेही को महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, आदेश में उद्धृत श्लोकों के सटीक संस्कृत पाठ और उनके पूरे संदर्भ को प्रमाणित प्रति से देखकर ही शब्दशः प्रकाशित किया जाना चाहिए। इस मामले में जिला शासकीय अधिवक्ता की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, न्यायाधीश ने अपराध की गंभीरता और दंड के सिद्धांत पर विशेष रूप से विचार किया।
मार्च 2025 में सामने आया था हत्याकांड
सौरभ राजपूत की हत्या का मामला मार्च 2025 में सामने आया था। सौरभ मर्चेंट नेवी से जुड़े रहे थे और उनकी हत्या के बाद शव को छिपाने के तरीके ने मामले को व्यापक चर्चा का विषय बना दिया। पुलिस जांच के अनुसार, सौरभ की हत्या के बाद उनके शव को टुकड़ों में काटकर नीले प्लास्टिक के ड्रम में रखा गया और उसे छिपाने के लिए सीमेंट तथा रेत का इस्तेमाल किया गया। ड्रम से शव बरामद होने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और मुस्कान रस्तोगी तथा साहिल शुक्ला को गिरफ्तार किया। जांच में दोनों के बीच संबंध और हत्या से जुड़े घटनाक्रम की पड़ताल की गई। अभियोजन पक्ष ने अदालत में जांच के दौरान एकत्र किए गए साक्ष्यों के आधार पर आरोपों को साबित करने का प्रयास किया।
पुलिस और अभियोजन की कहानी के अनुसार, हत्या के बाद साक्ष्य छिपाने के प्रयास किए गए थे। इस वजह से मुकदमे में केवल प्रत्यक्षदर्शी गवाही पर निर्भर रहने के बजाय परिस्थितिजन्य, डिजिटल और फॉरेंसिक साक्ष्यों को भी महत्वपूर्ण माना गया। इस तरह के मामलों में घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ना, साक्ष्यों की विश्वसनीयता स्थापित करना और प्रत्येक तथ्य को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना अभियोजन के लिए अहम होता है। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों पर विचार करने के बाद दोनों को दोषी ठहराया।
करीब एक हजार पन्नों का आरोपपत्र, 22 गवाहों की गवाही
जिला शासकीय अधिवक्ता कृष्ण कुमार चौबे के मुताबिक, पुलिस ने करीब 54 दिन की जांच के बाद लगभग एक हजार पन्नों का आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया था। मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष के 22 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। जांच से संबंधित दस्तावेजों में डिजिटल और फॉरेंसिक साक्ष्य भी शामिल थे। अभियोजन ने इन्हीं साक्ष्यों तथा गवाहियों के आधार पर अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष को भी अपना पक्ष रखने और अभियोजन के साक्ष्यों पर दलीलें देने का अवसर मिला। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद 30 सितंबर को दोषसिद्धि का फैसला सुनाया और फिर 14 अक्टूबर को सजा निर्धारित की।
इस मुकदमे की सुनवाई में कई तारीखें लगीं और गवाहों के बयान तथा अन्य साक्ष्य न्यायालय के समक्ष रखे गए। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सुनवाई के दौरान 100 से अधिक कार्यवाही हुईं। इस तरह मामला जांच से लेकर दोषसिद्धि और सजा सुनाए जाने तक लंबी न्यायिक प्रक्रिया से गुजरा। अभियोजन पक्ष के अनुसार, जांच में जुटाए गए साक्ष्यों और गवाहों की गवाही ने अदालत के सामने घटनाक्रम की कड़ियों को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सजा सुनाए जाने के समय दोनों की पेशी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सजा सुनाए जाने के दिन मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत के समक्ष पेश किया गया। सजा के प्रश्न पर दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर दिया गया था। अभियोजन पक्ष ने अपराध की गंभीरता का हवाला देते हुए मृत्युदंड की मांग की, जबकि बचाव पक्ष ने मानवीय आधारों पर राहत की मांग की। अदालत ने इन दलीलों पर विचार करते हुए दोनों को मृत्युदंड सुनाया। सजा सुनाए जाने के बाद मामले ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया।
मृत्युदंड के बाद भी आगे की कानूनी प्रक्रिया जरूरी
अदालत द्वारा मृत्युदंड सुनाए जाने का अर्थ यह नहीं है कि सजा पर सभी कानूनी प्रक्रियाएं समाप्त हो गई हैं। भारतीय न्यायिक व्यवस्था में मृत्युदंड को लागू किए जाने से पहले संबंधित उच्च न्यायालय की पुष्टि आवश्यक होती है। इसके बाद कानून के अनुसार उपलब्ध अन्य न्यायिक और संवैधानिक उपायों की प्रक्रिया भी लागू हो सकती है। इसलिए मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को सुनाई गई सजा के संबंध में आगे की स्थिति उच्च न्यायालय की कार्यवाही और अन्य वैधानिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगी। फिलहाल, जिला अदालत का फैसला इस बहुचर्चित मुकदमे में एक अहम पड़ाव है।
सौरभ राजपूत हत्याकांड ने उठाए गंभीर सवाल
सौरभ राजपूत हत्याकांड केवल हत्या की घटना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शव को छिपाने के तरीके और जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के कारण भी चर्चा में बना रहा। इस मामले ने परिवार के भीतर होने वाले अपराधों, साक्ष्य छिपाने के प्रयासों और ऐसे मामलों में वैज्ञानिक जांच की भूमिका पर भी ध्यान आकर्षित किया। अदालत के फैसले के बाद अब आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। न्यायिक प्रक्रिया का अंतिम परिणाम संबंधित उच्च न्यायालय की पुष्टि और कानून के तहत उपलब्ध उपायों के बाद ही स्पष्ट होगा।
मेरठ की अदालत द्वारा मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को सुनाया गया मृत्युदंड इस मामले में अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें सुनने तथा साक्ष्यों पर विचार करने के बाद आया है। करीब एक हजार पन्नों के आरोपपत्र, 22 अभियोजन गवाहों के बयान और डिजिटल व फॉरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर चले इस मुकदमे में अब आगे की न्यायिक प्रक्रिया पर नजर रहेगी।
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