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Varanasi

29 साल बाद इंसाफ: सुंदरपुर हिरासत मौत मामले में पूर्व चौकी प्रभारी समेत 3 को सजा

Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
Last updated: 03/06/2026 12:57
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Sandeep Srivastava
Sandeep Srivastava Sub Editor News Report Newspaper
BySandeep Srivastava
Sandeep Srivastava serves as a Sub Editor at News Report, a registered Hindi newspaper dedicated to ethical, accurate, and reader-focused journalism. He is responsible for copy...
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9 Min Read
अदालत के बाहर न्याय की प्रतीक्षा करती एक महिला, पीछे पुलिसकर्मी और कोर्ट का भवन।
29 साल बाद सुंदरपुर हिरासत मौत मामले में अदालत ने तीन दोषियों को सजा सुनाई।
Contents
  • 29 साल बाद मिला इंसाफ, सुंदरपुर चौकी हिरासत मौत मामले में पूर्व चौकी प्रभारी समेत तीन दोषियों को सजा, अदालत ने पुलिस की कहानी को नहीं माना सच
  • सिर्फ 100 मिनट में पुलिस ने सुनाई थी आत्महत्या की कहानी
  • 100 रुपये की चोरी का मुकदमा और फर्जी निकला शिकायतकर्ता
  • बस में हुए विवाद से चौकी तक पहुंचा था मामला
  • शॉल और स्टूल की कहानी भी जांच में टिक नहीं पाई
  • परिजनों को सूचना दिए बिना हुआ पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार
  • सामान्य डायरी में भी नहीं थे आवश्यक विवरण
  • पत्नी के संघर्ष ने दिलाया न्याय

29 साल बाद मिला इंसाफ, सुंदरपुर चौकी हिरासत मौत मामले में पूर्व चौकी प्रभारी समेत तीन दोषियों को सजा, अदालत ने पुलिस की कहानी को नहीं माना सच

वाराणसी: न्याय की राह भले ही लंबी और कठिन रही हो, लेकिन आखिरकार लगभग 29 वर्षों बाद एक परिवार के संघर्ष को अदालत में सफलता मिली। वर्ष 1997 में सुंदरपुर पुलिस चौकी में हुई राजेंद्र प्रसाद सिंह की संदिग्ध मौत के मामले में अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तत्कालीन चौकी प्रभारी नरेंद्र प्रताप सिंह, विवेचक राधेश्याम सिंह और पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर केके जैन को दोषी ठहराकर सजा सुनाई है। यह फैसला केवल एक व्यक्ति की मौत से जुड़े मामले का निपटारा भर नहीं है, बल्कि उन सवालों का भी जवाब है जो तीन दशक तक पुलिस कार्रवाई, जांच प्रक्रिया और न्याय व्यवस्था के सामने खड़े रहे।

अदालत ने अपने फैसले में तत्कालीन चौकी प्रभारी नरेंद्र प्रताप सिंह को 10 वर्ष के कारावास, विवेचक राधेश्याम सिंह को छह माह के कारावास तथा पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर केके जैन को पांच वर्ष के कारावास की सजा सुनाई। यह फैसला उस लंबे संघर्ष का परिणाम है जिसे मृतक की पत्नी शशिमा सिंह ने लगभग तीन दशक तक लगातार जारी रखा। एक साधारण गृहिणी से न्याय की लड़ाई लड़ने वाली महिला तक का उनका सफर इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है।

सिर्फ 100 मिनट में पुलिस ने सुनाई थी आत्महत्या की कहानी

मामले की शुरुआत वर्ष 1997 में हुई थी जब राजेंद्र प्रसाद सिंह को पुलिस अभिरक्षा में लिया गया। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार उन्हें शाम 5 बजकर 15 मिनट पर चौकी में लाया गया और महज 100 मिनट बाद शाम 6 बजकर 55 मिनट पर यह दावा कर दिया गया कि उन्होंने लॉकअप में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। शुरुआत में पुलिस की इसी कहानी को आधिकारिक रूप से दर्ज कर लिया गया, लेकिन समय के साथ इस कथित आत्महत्या की कहानी पर गंभीर सवाल उठने लगे।

जब मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंपी गई तो कई ऐसे तथ्य सामने आए जिन्होंने पुलिस के पूरे घटनाक्रम को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया। जांच एजेंसी ने पाया कि राजेंद्र प्रसाद सिंह को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था और जिस कथित चोरी के मामले में उन्हें पकड़ा गया था, उसका कोई ठोस आधार नहीं था।

100 रुपये की चोरी का मुकदमा और फर्जी निकला शिकायतकर्ता

पुलिस ने राजेंद्र प्रसाद सिंह की मौत के बाद उनके खिलाफ 100 रुपये की चोरी का मुकदमा दर्ज किया था। इस मुकदमे का आधार दयाराम नामक व्यक्ति की तहरीर को बताया गया था। हालांकि सीबीसीआईडी जांच के दौरान जब दयाराम की तलाश की गई तो पूरा मामला ही संदिग्ध साबित हो गया।

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जांच अधिकारी श्रीकांत पांडे ने अदालत में बताया कि मिर्जापुर जिले के उस पते की विस्तृत जांच कराई गई जहां दयाराम के रहने का दावा किया गया था। ग्राम प्रधानों, स्थानीय निवासियों और सरकारी अभिलेखों की जांच के साथ साथ मतदाता सूची का भी मिलान किया गया, लेकिन उस नाम का कोई व्यक्ति इस मामले से जुड़ा नहीं मिला। यहां तक कि समान नाम वाले व्यक्ति ने भी स्पष्ट कर दिया कि उसका इस प्रकरण से कोई संबंध नहीं है। जांच में निष्कर्ष निकला कि प्राथमिकी दर्ज कराने वाला कथित शिकायतकर्ता वास्तविक नहीं था और पूरी कहानी गढ़ी गई थी।

बस में हुए विवाद से चौकी तक पहुंचा था मामला

सीबीसीआईडी जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि घटना वाले दिन राजेंद्र प्रसाद सिंह ने कैंट क्षेत्र से एक बस पकड़ी थी। यात्रा के दौरान किसी बात को लेकर विवाद हुआ और इसके बाद पुलिस उन्हें चौकी ले आई। जांच टीम को न तो गिरफ्तारी से जुड़े आवश्यक दस्तावेज मिले और न ही यह स्पष्ट हो सका कि उन्हें किस कानूनी प्रक्रिया के तहत हिरासत में लिया गया था।

जांच में यह भी कहा गया कि यदि गिरफ्तारी वैधानिक प्रक्रिया के तहत हुई होती तो उन्हें संबंधित थाने की हवालात में रखा जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। यही तथ्य बाद में पूरे मामले का महत्वपूर्ण आधार बना।

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शॉल और स्टूल की कहानी भी जांच में टिक नहीं पाई

पुलिस का दावा था कि राजेंद्र प्रसाद सिंह ने लॉकअप के भीतर एक स्टूल पर चढ़कर शॉल के सहारे फांसी लगाई थी। लेकिन जब जांच एजेंसी ने साक्ष्यों का परीक्षण किया तो न तो कथित शॉल बरामद हुई और न ही उस स्टूल का कोई विश्वसनीय प्रमाण मिला।

सीबीसीआईडी अधिकारियों ने पाया कि आत्महत्या के जिस घटनाक्रम का वर्णन पुलिस द्वारा किया गया था, वह उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों से मेल नहीं खाता था। रिकॉर्ड में दर्ज समय, घटनाओं के क्रम और अन्य तथ्यों में भी कई विसंगतियां सामने आईं।

परिजनों को सूचना दिए बिना हुआ पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार

इस मामले का एक अत्यंत संवेदनशील पहलू यह भी रहा कि मृतक के परिजनों को समय रहते उनकी मौत की सूचना नहीं दी गई। जांच में सामने आया कि अगले ही दिन सूर्योदय से पहले सुबह लगभग 5 बजकर 30 मिनट पर पोस्टमार्टम कराया गया और इसके बाद हरिश्चंद्र घाट पर अंतिम संस्कार भी कर दिया गया।

जब जांच एजेंसी ने इस जल्दबाजी के कारणों के बारे में सवाल किए तो संबंधित अधिकारियों की ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया जा सका। अदालत में भी यह तथ्य महत्वपूर्ण माना गया कि मृत्यु के बाद की प्रक्रिया असामान्य तेजी से पूरी की गई थी।

सामान्य डायरी में भी नहीं थे आवश्यक विवरण

जांच के दौरान सुंदरपुर चौकी की सामान्य डायरी का परीक्षण किया गया। इसमें पाया गया कि हिरासत में लिए गए राजेंद्र प्रसाद सिंह का पूरा पता, तलाशी का विवरण और अन्य आवश्यक जानकारियां दर्ज नहीं थीं। सामान्य परिस्थितियों में किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने के बाद ऐसी सूचनाओं का रिकॉर्ड रखा जाना अनिवार्य माना जाता है। इन कमियों ने भी पुलिस कार्रवाई की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए।

पत्नी के संघर्ष ने दिलाया न्याय

इस पूरे मामले में यदि किसी ने सबसे लंबी और कठिन लड़ाई लड़ी तो वह थीं शशिमा सिंह। पति की मौत के बाद जब मामला बंद करने की कोशिश हुई तब भी उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने मानवाधिकार आयोग, राज्यपाल कार्यालय, सीबीसीआईडी और अदालतों का दरवाजा खटखटाया। वर्षों तक लगातार दस्तावेज जुटाने, सुनवाई में उपस्थित रहने और न्याय की मांग उठाने का परिणाम आखिरकार अदालत के फैसले के रूप में सामने आया।

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करीब 29 वर्षों तक चली इस कानूनी लड़ाई का अंत अब दोषियों को सजा मिलने के साथ हुआ है। यह मामला केवल एक हिरासत मौत का मामला नहीं बल्कि न्याय के लिए किए गए असाधारण संघर्ष का उदाहरण भी बन गया है। अदालत के फैसले ने यह संदेश दिया है कि समय चाहे कितना भी बीत जाए, यदि तथ्य और साक्ष्य मौजूद हों तो न्याय की उम्मीद समाप्त नहीं होती। सुंदरपुर चौकी हिरासत मौत प्रकरण अब वाराणसी के उन चर्चित मामलों में शामिल हो गया है जिसने कानून, जवाबदेही और न्याय व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए और अंततः अदालत के फैसले के माध्यम से एक ऐतिहासिक निष्कर्ष तक पहुंचा।

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