वाराणसी: काशी की गौरवशाली ऐतिहासिक विरासत, भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं के संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान देने वाले पूर्व काशीराज स्वर्गीय डॉ. विभूतिनारायण सिंह की स्मृति में गुरुवार को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में गरिमामय समारोह का आयोजन किया गया। जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर बीएचयू के के एन उडुपा सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में समाजसेवा और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े विभिन्न व्यक्तित्वों को सम्मानित किया गया। इसी क्रम में हिंदू युवा वाहिनी के निवर्तमान मंडल प्रभारी एवं वाराणसी विकास प्राधिकरण के सदस्य अम्बरीश सिंह उर्फ भोला को काशीराज स्वर्गीय डॉ. विभूतिनारायण सिंह कीर्ति अलंकरण से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके सामाजिक योगदान, समाजसेवा के प्रति सक्रियता और सनातन संस्कृति के प्रति समर्पण के संदर्भ में प्रदान किया गया।
सम्मान प्राप्त करने के बाद अम्बरीश सिंह ने इसे अपने जीवन का गौरवपूर्ण और भावनात्मक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि काशी की महान विभूति स्वर्गीय डॉ. विभूतिनारायण सिंह की स्मृति में आयोजित जन्मशताब्दी समारोह में उनके नाम से जुड़े कीर्ति अलंकरण से सम्मानित होना उनके लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि इस सम्मान को वह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को और अधिक गंभीरता से निभाने की प्रेरणा मानते हैं। समाजसेवा, सनातन संस्कृति के संरक्षण और जनकल्याण के लिए उनका संकल्प इस सम्मान से और मजबूत हुआ है। उन्होंने विश्व संस्कृत प्रतिष्ठानम के पदाधिकारियों, आयोजन समिति और समारोह में उपस्थित सभी गणमान्य लोगों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए काशीराज डॉ. विभूतिनारायण सिंह की पुण्य स्मृतियों को नमन किया।
काशी के इतिहास और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा रहा काशीराज का व्यक्तित्व
पूर्व काशीराज डॉ. विभूतिनारायण सिंह का व्यक्तित्व काशी के इतिहास में विशिष्ट स्थान रखता है। उनका जीवन केवल राजपरिवार की परंपराओं और राजकीय पहचान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने संस्कृत, वेद, पुराण, भारतीय दर्शन, धर्म और आध्यात्मिक परंपराओं के अध्ययन तथा संरक्षण में भी विशेष रुचि दिखाई। उनका जन्म 5 नवंबर 1927 को हुआ था। महाराज आदित्य नारायण सिंह के उत्तराधिकारी के रूप में उन्होंने वर्ष 1939 में काशी की राजगद्दी संभाली। उस समय काशी की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को बनाए रखना उनके सामने एक महत्वपूर्ण दायित्व था। उन्होंने अपने जीवन में इस विरासत को विशेष महत्व दिया और विभिन्न धार्मिक तथा सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से काशी की परंपराओं से अपना जुड़ाव बनाए रखा।
देश की स्वतंत्रता के बाद भारतीय रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया में काशी राज्य का भी भारतीय गणराज्य में विलय हुआ। इस ऐतिहासिक परिवर्तन के दौरान 15 अक्टूबर 1948 को रामनगर दुर्ग पर महाराज विभूतिनारायण सिंह द्वारा तिरंगा फहराए जाने का उल्लेख काशी के इतिहास में महत्वपूर्ण रूप से किया जाता है। राजशाही व्यवस्था में बदलाव के बाद भी उनका काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ाव बना रहा। उनका व्यक्तित्व विद्वत्ता, धार्मिक आस्था, परंपराओं के प्रति निष्ठा और सामाजिक सरोकारों के लिए जाना जाता था। यही वजह रही कि राजपरिवार से जुड़े होने के साथ ही आम जनमानस में भी उनके प्रति गहरा सम्मान देखने को मिलता था।
शिक्षा और संस्कृत की परंपरा को आगे बढ़ाने में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
डॉ. विभूतिनारायण सिंह ने शिक्षा को समाज के विकास का महत्वपूर्ण आधार माना। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के अवसर बढ़ाने और नई पीढ़ी को बेहतर शैक्षिक वातावरण उपलब्ध कराने की दिशा में उनके प्रयासों का उल्लेख मिलता है। श्री काशी राज एजुकेशन ट्रस्ट के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में गतिविधियों को आगे बढ़ाया गया। ज्ञानपुर में काशी नरेश राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय की स्थापना से जुड़ी पहल भी इसी शैक्षिक दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण हिस्सा रही। उनका मानना था कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत रखने के साथ शिक्षा का विस्तार भी आवश्यक है।
संस्कृत और वैदिक ज्ञान के प्रति उनकी विशेष अभिरुचि रही। भारतीय शास्त्रीय परंपराओं के अध्ययन और विद्वानों के साथ उनके संबंधों ने उनके व्यक्तित्व को एक अलग पहचान दी। वेद, पुराण और भारतीय दर्शन के प्रति उनकी रुचि ने उन्हें केवल एक ऐतिहासिक राजपरिवार के सदस्य के रूप में ही नहीं, बल्कि काशी की विद्वत परंपरा से जुड़े व्यक्तित्व के रूप में भी प्रतिष्ठित किया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलाधिपति के रूप में भी उन्होंने अपनी भूमिका निभाई। उनके जीवन से जुड़ी ये उपलब्धियां इस बात को सामने रखती हैं कि उन्होंने काशी की पहचान को शिक्षा, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं के माध्यम से आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
रामनगर की रामलीला और काशी की धार्मिक परंपराओं से रहा गहरा जुड़ाव
काशीराज डॉ. विभूतिनारायण सिंह का नाम काशी के उन धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों से जुड़ा रहा है, जिनकी पहचान देश और विदेश तक है। रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला, नाटी इमली का भरत मिलाप, तुलसी घाट की नागनथैया, ध्रुपद मेला, पंचगंगा घाट की देवदीपावली और पंचकोसी यात्रा जैसी परंपराओं के साथ काशीराज परिवार का ऐतिहासिक संबंध रहा है। इन आयोजनों के माध्यम से काशी की धार्मिक आस्था, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का परिचय मिलता है। डॉ. विभूतिनारायण सिंह ने भी इन परंपराओं के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी। विशेष रूप से रामनगर की रामलीला काशी की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसके साथ काशीराज परिवार का जुड़ाव पीढ़ियों से रहा है।
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर की व्यवस्था से भी उनका महत्वपूर्ण संबंध रहा। वर्ष 1983 में मंदिर प्रबंधन की नई व्यवस्था लागू होने के बाद गठित ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका रही। धार्मिक परंपराओं और मंदिर से जुड़े दायित्वों के प्रति उनकी सक्रियता काशी के सांस्कृतिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। उनके व्यक्तित्व की विशेषता यह थी कि उन्होंने धार्मिक आयोजनों को केवल परंपरा के निर्वहन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें काशी की सामूहिक सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा।
25 दिसंबर 2000 को हुआ था निधन, आज भी स्मृतियों में जीवित हैं काशीराज
काशी के इतिहास में 25 दिसंबर 2000 एक महत्वपूर्ण और भावुक दिन के रूप में दर्ज है। इसी दिन पूर्व काशीराज डॉ. विभूतिनारायण सिंह का निधन हुआ था। उनके निधन की खबर से रामनगर सहित वाराणसी के विभिन्न क्षेत्रों में शोक की लहर फैल गई थी। उनके अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे थे। मणिकर्णिका घाट पर उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। उनके निधन के बाद भी काशी की धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता रहा है। उनके जीवन और योगदान को याद करने के लिए विभिन्न अवसरों पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
काशीराज का जीवन इस बात का उदाहरण रहा कि किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसके पद और पारिवारिक विरासत से नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति के प्रति उसके योगदान से भी बनती है। शिक्षा, संस्कृत, धार्मिक परंपराओं और काशी की सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रति उनकी रुचि ने उन्हें जनमानस में विशिष्ट स्थान दिलाया। यही कारण है कि उनके जन्मदिवस और स्मृति से जुड़े आयोजनों में आज भी बड़ी संख्या में लोग भाग लेते हैं।
जन्मशताब्दी वर्ष के आयोजनों से नई पीढ़ी तक पहुंचेगी काशी की विरासत
डॉ. विभूतिनारायण सिंह के जन्मदिवस 5 नवंबर को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2026 से 2027 तक जन्मशताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों के माध्यम से उनके जीवन और योगदान को याद किया जा रहा है। रामनगर में भी इस अवसर पर विभिन्न कार्यक्रमों की शुरुआत की गई है। इन आयोजनों का उद्देश्य उनके शैक्षिक, धार्मिक और सांस्कृतिक योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है। उनके जीवन से जुड़ी स्मृतियों, ऐतिहासिक घटनाओं और काशी की परंपराओं को संकलित करने के प्रयास भी इस आयोजन के व्यापक उद्देश्य का हिस्सा हैं।
इसी क्रम में 5 नवंबर को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के के एन उडुपा सभागार में आयोजित समारोह में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अजित कुमार चतुर्वेदी ने डॉ. विभूतिनारायण सिंह के व्यक्तित्व और काशी की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत में उनके योगदान को याद किया। जंगमबाड़ी मठ के पीठाधिपति जगद्गुरु चंद्रशेखर शिवाचार्य महास्वामी ने भी अपने आशीर्वचनों के माध्यम से काशी की धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं के महत्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में राजपरिवार के सदस्यों सहित विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य लोग उपस्थित रहे। विश्व संस्कृत प्रतिष्ठानम की ओर से आयोजित इस समारोह में काशी की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने का संदेश भी दिया गया।
कीर्ति अलंकरण के साथ अम्बरीश सिंह के सामने समाजसेवा की नई जिम्मेदारी
समारोह में अम्बरीश सिंह उर्फ भोला को प्रदान किया गया कीर्ति अलंकरण उनके लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के साथ समाज के प्रति अपनी भूमिका को और अधिक सक्रिय बनाने की प्रेरणा भी है। हिंदू युवा वाहिनी के निवर्तमान मंडल प्रभारी और वाराणसी विकास प्राधिकरण के सदस्य के रूप में उनकी सार्वजनिक पहचान के बीच इस सम्मान का विशेष महत्व है। काशीराज डॉ. विभूतिनारायण सिंह की स्मृति से जुड़े इस अलंकरण के माध्यम से समाजसेवा और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति समर्पण को सम्मानित किया गया।
अम्बरीश सिंह ने सम्मान के बाद अपनी प्रतिक्रिया में स्पष्ट किया कि वह इस उपलब्धि को नई जिम्मेदारियों के एहसास के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार समाज के बीच रहकर जनहित के कार्य करना, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति जागरूकता बनाए रखना और सनातन परंपराओं के मूल्यों को आगे बढ़ाना निरंतर प्रयास का विषय है। उन्होंने आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह सम्मान उन्हें अपने संकल्पों के प्रति और अधिक प्रतिबद्ध रहने की प्रेरणा देगा।
काशीराज डॉ. विभूतिनारायण सिंह की जन्मशताब्दी के अवसर पर आयोजित यह समारोह केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व को याद करने का कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि काशी की सांस्कृतिक विरासत और समाज के प्रति योगदान देने वाले लोगों के सम्मान का अवसर भी बना। अम्बरीश सिंह भोला को मिला कीर्ति अलंकरण इसी आयोजन का महत्वपूर्ण पक्ष रहा। काशी की पहचान उसकी प्राचीन परंपराओं, धार्मिक आस्था, शिक्षा और सांस्कृतिक चेतना से है। इन मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना ही काशीराज डॉ. विभूतिनारायण सिंह के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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