मणिकर्णिका घाट पर मसाने की होली को लेकर विवाद गहराया, डोम राजा परिवार ने जताई आपत्ति
अमित मिश्रा की रिपोर्ट : वाराणसी में होली का पर्व रंगभरी एकादशी से ही आरंभ हो जाता है। ब्रज की होली से अलग काशी की होली का अपना विशिष्ट स्वरूप है। विशेष रूप से मणिकर्णिका घाट पर खेले जाने वाली मसाने की होली देशभर में चर्चा का विषय रहती है। हालांकि इस बार इस आयोजन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। काशी विद्वत परिषद के बाद अब डोम राजा परिवार ने भी इस आयोजन पर आपत्ति जताई है और प्रशासन से महाश्मशान क्षेत्र में चिताओं के बीच होली न कराए जाने की मांग की है।
पौराणिकता पर उठे सवाल
मसाने की होली को लेकर आयोजक इसे सदियों पुरानी परंपरा बताते हैं, लेकिन काशी विद्वत परिषद ने इसकी पौराणिक मान्यता पर सवाल खड़े किए हैं। परिषद के सदस्यों का कहना है कि शास्त्रों में महाश्मशान पर इस प्रकार के सार्वजनिक आयोजन का कोई उल्लेख नहीं मिलता। उनका दावा है कि यह आयोजन परंपरा के नाम पर नया स्वरूप ले चुका है, जिसका धार्मिक आधार स्पष्ट नहीं है।
डोम राजा परिवार की आपत्ति
डोम राजा परिवार के सदस्य विश्वनाथ चौधरी ने पुलिस कमिश्नर और जिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र देकर महाश्मशान में चिताओं के बीच होली के आयोजन को रोकने की मांग की है। उनका कहना है कि मसाने की होली के दौरान शराब के नशे में कुछ युवक शवदाह के लिए आए परिजनों से अभद्र व्यवहार करते हैं। इसके अलावा जलती चिताओं के पास जाकर वीडियो और रील बनाने की घटनाएं भी सामने आती हैं, जिससे श्मशान की गरिमा प्रभावित होती है।
विश्वनाथ चौधरी का कहना है कि महाश्मशान पर परंपरागत रूप से महिलाओं का जाना वर्जित माना जाता रहा है, लेकिन मसाने की होली के नाम पर बड़ी संख्या में लोगों को वहां बुलाया जाता है। इससे अव्यवस्था और अराजकता की स्थिति उत्पन्न होती है। उनका यह भी कहना है कि देश विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के बीच काशी की छवि प्रभावित होती है।
आयोजकों ने साजिश का जताया संदेह
मसाने की होली के आयोजक गुलशन कपूर ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि यह आयोजन पौराणिक परंपरा से जुड़ा है और इसमें किसी को आमंत्रित नहीं किया जाता। लोग स्वयं श्रद्धा और आकर्षण के कारण पहुंचते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ लोग इस आयोजन को बंद कराने की साजिश कर रहे हैं क्योंकि इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं होती।
आरटीआई से उठा अनुमति का प्रश्न
इस विवाद के बीच एक आरटीआई का जवाब भी चर्चा में है। समाजसेवी अतुल कुल का दावा है कि प्रशासन द्वारा मसाने की होली के नाम पर केवल एक झांकी निकालने की अनुमति दी जाती है, जो मणिकर्णिका घाट की गली में ब्रह्मनाल मंदिर से मसान नाथ मंदिर तक सीमित रहती है। आरटीआई के अनुसार महाश्मशान क्षेत्र में चिताओं के बीच किसी आयोजन की अनुमति नहीं दी जाती।
अतुल कुल ने सवाल उठाया है कि यदि प्रशासनिक अनुमति केवल झांकी तक सीमित है, तो फिर लोग मसान नाथ मंदिर से आगे बढ़कर जलती चिताओं के बीच भस्म की होली कैसे खेलते हैं। उन्होंने इस पर स्पष्ट कार्रवाई की मांग की है।
प्रशासन की भूमिका पर नजर
विवाद के बढ़ने के साथ ही प्रशासन की भूमिका भी चर्चा में है। फिलहाल पुलिस और जिला प्रशासन की ओर से आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन शिकायत मिलने के बाद मामले की जांच की बात कही जा रही है। महाश्मशान की संवेदनशीलता को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था और अनुमति की प्रक्रिया पर विशेष ध्यान दिए जाने की संभावना है।
मसाने की होली काशी की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानी जाती रही है, लेकिन इसके स्वरूप और आयोजन की विधि को लेकर उठ रहे सवालों ने इस बार माहौल को संवेदनशील बना दिया है। अब देखना होगा कि प्रशासन और संबंधित पक्ष इस विवाद का समाधान किस प्रकार निकालते हैं।
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