काशी की ऐतिहासिक ‘राग-विराग’ परंपरा में बदलाव, इस बार मणिकर्णिका घाट के बजाय मंदिर परिसर में होगा आयोजन
अमित मिश्रा की रिपोर्ट : मोक्ष नगरी काशी की सदियों पुरानी और अनूठी परंपरा ‘राग-विराग का मेला’ इस वर्ष अपने पारंपरिक स्थल मणिकर्णिका घाट पर नहीं आयोजित किया जाएगा। घाट पर चल रहे निर्माण कार्यों के चलते आयोजकों ने इस बार कार्यक्रम को मसाननाथ मंदिर परिसर में कराने का निर्णय लिया है। यह बदलाव करीब 400 वर्षों से चली आ रही परंपरा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन माना जा रहा है।
मसाननाथ मंदिर में होगा पूरा आयोजन
गंगा तट स्थित महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर विराजमान बाबा मसाननाथ मंदिर में हर वर्ष वासंतिक नवरात्र की पंचमी से सप्तमी तक शृंगार महोत्सव आयोजित होता है। इसी क्रम में सप्तमी को ‘राग-विराग का मेला’ सजता है। इस बार निर्माण कार्य और स्थानाभाव के कारण मंदिर समिति ने पूरे आयोजन को मंदिर परिसर में ही संपन्न कराने का फैसला लिया है।
मंदिर समिति के अध्यक्ष चैनू प्रसाद गुप्ता, महामंत्री बिहारी लाल गुप्ता और व्यवस्थापक गुलशन कपूर के अनुसार घाट पर चल रहे नवनिर्माण कार्यों के कारण पर्याप्त स्थान नहीं है। साथ ही स्थानीय प्रशासन और नगर निगम से अपेक्षित सहयोग भी नहीं मिल पाया, जिसके चलते यह निर्णय लिया गया।
तीन दिनों तक चलता है शृंगार महोत्सव
यह महोत्सव वासंतिक नवरात्र के दौरान तीन दिनों तक चलता है। पंचमी के दिन बाबा मसाननाथ का विधि-विधान से रुद्राभिषेक, शृंगार और आरती की जाती है। षष्ठी को दिन में भंडारा और रात में भजन संध्या आयोजित होती है। सप्तमी के दिन ‘राग-विराग का मेला’ अपने चरम पर पहुंचता है।
राग-विराग: जीवन और मृत्यु का अद्भुत संगम
‘राग-विराग का मेला’ काशी की उन परंपराओं में शामिल है, जहां जीवन और मृत्यु का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। जलती चिताओं के बीच एक ओर शोक और करुणा का माहौल होता है, वहीं दूसरी ओर नगर वधुओं के घुंघरुओं की खनक और नृत्य इस संसार की नश्वरता का बोध कराते हैं।
इस परंपरा के तहत नगर वधुएं रात भर ‘नृत्यांजलि’ प्रस्तुत करती हैं। यह आयोजन बाबा मसाननाथ को समर्पित होता है और इसके पीछे मान्यता है कि इससे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है और अगले जन्म में इस जीवन से मुक्ति मिलती है।
नृत्यांजलि परंपरा का ऐतिहासिक महत्व
बताया जाता है कि यह परंपरा राजा मानसिंह के समय से चली आ रही है। जब बाबा मसाननाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया और भजन-कीर्तन की व्यवस्था के लिए कलाकार नहीं मिले, तब नगर वधुओं ने आगे बढ़कर इस जिम्मेदारी को स्वीकार किया। तभी से यह अनूठी परंपरा निरंतर जारी है।
नगर वधुएं इस आयोजन के माध्यम से बाबा मसाननाथ से अपने जीवन के कष्टों से मुक्ति की प्रार्थना करती हैं।
विवादों के बीच भी जारी रहेगी परंपरा
हाल के दिनों में ‘मसाने की होली’ को लेकर उठे शास्त्रीय और अशास्त्रीय परंपरा के विवादों के चलते इस वर्ष राग-विराग मेले के आयोजन पर भी संशय के बादल छा गए थे। हालांकि अब मंदिर समिति ने स्पष्ट कर दिया है कि परंपरा जारी रहेगी, भले ही स्थान बदल दिया गया हो।
भक्तों से सुरक्षा के साथ आने की अपील
मंदिर समिति ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे आयोजन में शामिल होने के दौरान सुरक्षा नियमों का पालन करें और समय से पहुंचें। सीमित स्थान के कारण भीड़ प्रबंधन एक चुनौती हो सकता है, इसलिए सभी से सहयोग की अपेक्षा की गई है।
काशी की यह अद्भुत परंपरा इस वर्ष भले ही अपने पारंपरिक स्थल से अलग आयोजित हो रही हो, लेकिन इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्ता पहले की तरह ही बनी रहेगी।
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