अहिल्याबाई घाट से बाबा विश्वनाथ धाम तक उमड़ा जनसैलाब लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की 301वीं जयंती पर निकली भव्य पदयात्रा
वाराणसी: देश की सांस्कृतिक राजधानी और अध्यात्म की नगरी काशी में आज रविवार को लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की 301वीं जयंती श्रद्धा, आस्था और सामाजिक एकता के वातावरण में मनाई गई। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी पाल विकास समिति वाराणसी के तत्वावधान में महानगर अध्यक्ष रितेश पाल तथा समाज के वरिष्ठ जनों के नेतृत्व में अहिल्याबाई घाट से श्री काशी विश्वनाथ मंदिर तक विशाल पदयात्रा निकाली गई। इस दौरान हजारों की संख्या में समाज के लोगों ने हाथों में ध्वज और बैनर लेकर लोकमाता के आदर्शों का स्मरण किया तथा बाबा विश्वनाथ के जयघोष के साथ पूरे मार्ग को भक्तिमय बना दिया। पदयात्रा के समापन पर श्रद्धालुओं ने काशी विश्वनाथ मंदिर पहुंचकर जलाभिषेक किया और समाज तथा राष्ट्र की सुख समृद्धि की कामना की।
कार्यक्रम के दौरान लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर के जीवन, उनके संघर्ष, त्याग, न्यायप्रियता और सनातन धर्म के प्रति समर्पण को याद किया गया। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने सत्ता को सेवा का माध्यम बनाया और अपने कार्यों से आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का मार्ग प्रशस्त किया। अहिल्याबाई होल्कर उन्हीं महान विभूतियों में से एक थीं।
कौन थीं लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर
अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जनपद के चौंडी गांव में हुआ था। सामान्य परिवार में जन्म लेने वाली अहिल्याबाई ने अपने अद्भुत व्यक्तित्व, दूरदर्शिता और प्रशासनिक क्षमता के बल पर इतिहास में अमिट स्थान बनाया। विवाह के बाद वह मालवा साम्राज्य के होल्कर राजवंश से जुड़ीं। पति खंडेराव होल्कर और बाद में ससुर मल्हारराव होल्कर के निधन के बाद उन्होंने राज्य की बागडोर संभाली। उस समय एक महिला का शासन संभालना असाधारण माना जाता था, लेकिन अहिल्याबाई ने अपनी योग्यता से यह सिद्ध कर दिया कि नेतृत्व क्षमता किसी लिंग की मोहताज नहीं होती।
उन्होंने इंदौर और मालवा क्षेत्र को सुशासन, न्याय और विकास का आदर्श मॉडल बनाया। उनके शासनकाल में किसानों, व्यापारियों और आम नागरिकों को विशेष संरक्षण मिला। वे जनता की समस्याओं को स्वयं सुनती थीं और त्वरित न्याय देने के लिए प्रसिद्ध थीं। इसी कारण उन्हें लोकमाता की उपाधि प्राप्त हुई।
काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में रहा ऐतिहासिक योगदान
अहिल्याबाई होल्कर का नाम काशी के इतिहास में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। अठारहवीं शताब्दी में उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य कराया। इतिहासकारों के अनुसार वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य ढांचे के निर्माण में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने केवल काशी ही नहीं बल्कि देश के अनेक प्रमुख तीर्थ स्थलों के विकास और पुनरुद्धार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सोमनाथ, गया, उज्जैन, द्वारका, हरिद्वार, प्रयागराज और अन्य अनेक धार्मिक स्थलों पर घाट, मंदिर, धर्मशालाएं और जनोपयोगी निर्माण कार्य उनके संरक्षण में कराए गए। सनातन संस्कृति और धार्मिक धरोहरों के संरक्षण के लिए उनके योगदान को आज भी देश श्रद्धा के साथ स्मरण करता है।
अहिल्याबाई घाट से शुरू हुई भव्य पदयात्रा
लोकमाता की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत अहिल्याबाई घाट पर माल्यार्पण और श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ हुई। इसके बाद हजारों लोगों की उपस्थिति में भव्य पदयात्रा निकाली गई। पदयात्रा के दौरान लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर अमर रहें, हर हर महादेव और भारत माता की जय के उद्घोष से पूरा क्षेत्र गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने अनुशासित ढंग से बाबा विश्वनाथ धाम तक पहुंचकर जलाभिषेक किया।
पदयात्रा में युवाओं, महिलाओं, बुजुर्गों और समाज के विभिन्न वर्गों की उल्लेखनीय भागीदारी देखने को मिली। आयोजन के दौरान सुरक्षा और व्यवस्था के भी व्यापक इंतजाम किए गए थे।
रितेश पाल ने कहा समाज को जोड़ने वाली प्रेरणा हैं लोकमाता
पाल विकास समिति के महानगर अध्यक्ष रितेश पाल ने कहा कि लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर केवल एक शासक नहीं थीं बल्कि भारतीय संस्कृति, सेवा, सुशासन और महिला सशक्तिकरण की जीवंत प्रतीक थीं। उन्होंने कहा कि काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज भी करोड़ों श्रद्धालु जब बाबा विश्वनाथ के दर्शन करते हैं तो कहीं न कहीं लोकमाता के उस ऐतिहासिक योगदान को नमन करते हैं जिसने काशी की आध्यात्मिक पहचान को नई शक्ति प्रदान की।
उन्होंने कहा कि अहिल्याबाई होल्कर का जीवन समाज सेवा, न्याय और राष्ट्रभक्ति का आदर्श उदाहरण है। नई पीढ़ी को उनके जीवन से प्रेरणा लेकर समाज और राष्ट्र के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने सभी समाजजनों को लोकमाता की जयंती की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि ऐसे आयोजन समाज को अपनी गौरवशाली विरासत से जोड़ने का कार्य करते हैं।
श्रद्धा और गौरव के साथ मनाई गई जयंती
कार्यक्रम के अंत में समाज के वरिष्ठ लोगों ने लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर के आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प लिया। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय इतिहास में अहिल्याबाई होल्कर का स्थान केवल एक महारानी के रूप में नहीं बल्कि धर्म, न्याय, सेवा और राष्ट्र निर्माण की महान प्रतीक के रूप में सदैव स्मरणीय रहेगा। उनकी 301वीं जयंती पर आयोजित यह भव्य पदयात्रा और जलाभिषेक कार्यक्रम श्रद्धा, आस्था और सामाजिक एकता का अद्भुत उदाहरण बनकर सामने आया।
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