इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दुष्कर्म व पॉक्सो मामले में 20 वर्ष की सजा की रद्द, दो अभियुक्तों की रिहाई का आदेश
प्रयागराज, 28 फरवरी 2026। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट के एक मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 20 वर्ष की सजा को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति मनोज बजाज की एकलपीठ ने बरेली जिले के आंवला थाने में दर्ज मामले में अभियुक्त सूरजपाल और उदयपाल की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए आदेश दिया कि यदि वे किसी अन्य मामले में निरुद्ध नहीं हैं तो उन्हें तत्काल जेल से रिहा किया जाए।
ट्रायल कोर्ट के साक्ष्य मूल्यांकन पर टिप्पणी
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को सही दृष्टिकोण से नहीं परखा। न्यायालय ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य स्वयं गंभीर संदेह उत्पन्न करते हैं और अभियोजन आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में सफल नहीं हुआ।
अदालत ने यह भी कहा कि अभियुक्तों द्वारा प्रस्तुत यह बचाव कि शिकायतकर्ता ने उन्हें झूठे आरोप में फंसाया है, परिस्थितियों में संभव प्रतीत होता है। आपराधिक न्याय व्यवस्था के सिद्धांत के अनुसार यदि साक्ष्यों में संदेह उत्पन्न होता है तो उसका लाभ अभियुक्त को दिया जाना चाहिए।
14 वर्षीय किशोरी से दुष्कर्म का आरोप
वादी पक्ष का आरोप था कि उसकी 14 वर्षीय पुत्री को अभियुक्तों ने शराब के नशे में धान के खेत में खींचकर सामूहिक दुष्कर्म किया। इस मामले में संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर विवेचना के बाद आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया था।
2020 में सुनाई गई थी 20 वर्ष की सजा
यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 376-डी और 506 तथा पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दर्ज किया गया था। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 16 दिसंबर 2020 को दोनों अभियुक्तों को 20 वर्ष के कठोर कारावास और 25 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी।
धारा 506 के तहत तीन वर्ष के कारावास और एक हजार रुपये के जुर्माने का भी आदेश दिया गया था। यह भी निर्देश दिया गया था कि जुर्माना अदा न करने की स्थिति में क्रमशः तीन माह और 15 दिन का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। सभी सजाएं साथ-साथ चलने का आदेश था।
तत्काल रिहाई का निर्देश
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अभियुक्त किसी अन्य आपराधिक मामले में वांछित या निरुद्ध नहीं हैं तो उन्हें तत्काल जेल से रिहा किया जाए। न्यायालय के इस फैसले ने एक बार फिर यह सिद्धांत दोहराया है कि दोष सिद्धि के लिए अभियोजन को आरोपों को संदेह से परे प्रमाणित करना अनिवार्य है।
LATEST NEWS