संकट मोचन संगीत समारोह की चौथी निशा में अनूप जलोटा ने बहाई भक्ति की रसधार
वाराणसी के प्रसिद्ध संकट मोचन संगीत समारोह की चौथी निशा भक्ति, संगीत और आध्यात्मिकता के अद्भुत संगम की साक्षी बनी। प्रख्यात भजन गायक अनूप जलोटा ने अपने सुरों से ऐसा समां बांधा कि पूरा परिसर भक्तिरस में डूब गया। ‘ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन’ और ‘जग में सुंदर हैं दो नाम…’ जैसे कालजयी भजनों की प्रस्तुति ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।
भक्ति और संगीत का अद्भुत संगम
कार्यक्रम की शुरुआत में ही अनूप जलोटा ने मंच पर आते ही हनुमान जी को नमन किया और अपने संगीत की प्रेरणा का स्रोत भी बताया। उन्होंने कहा कि उन्हें लंबी सांस और गायन की शक्ति भगवान हनुमान से प्राप्त हुई है। उनके इस आध्यात्मिक अनुभव ने श्रोताओं को भी भावुक कर दिया।
जैसे-जैसे कार्यक्रम आगे बढ़ा, सुर, लय और ताल का ऐसा अद्भुत मेल देखने को मिला कि पूरा प्रांगण तालियों की गूंज से भर उठा। श्रोता न केवल भजनों को सुन रहे थे, बल्कि उनमें पूरी तरह से डूब चुके थे।
लोकप्रिय भजनों से गूंजा प्रांगण
अनूप जलोटा ने अपने गायन की शुरुआत ‘ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन…’ से की। इसके बाद उन्होंने ‘अच्युतम केशवम्…’, ‘मेरी झोपड़ी के भाग खुल जाएंगे…’ जैसे भजनों की प्रस्तुति दी। हर भजन के साथ श्रोताओं की सहभागिता बढ़ती गई और वातावरण और अधिक भक्तिमय होता गया।
इसके बाद उन्होंने ‘काशी बदली अयोध्या बदली अब मथुरा की बारी है…’ भजन प्रस्तुत किया, जिस पर श्रोताओं ने जमकर तालियां बजाईं। ‘मेरे मन में राम, मेरे तन में राम…’ और ‘जब बजरंग बली बोलो-जय बजरंग बली’ जैसे भजनों ने पूरे माहौल को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
भक्ति से सराबोर हुआ वातावरण
कार्यक्रम के दौरान ‘दुनिया चले न राम के बिना…’, ‘राम नाम रटते रहो…’, ‘नाम हरि का जप ले बंदे…’, ‘हरी बोल हरि बोल…’ और ‘मुकुंद माधव गोविंद बोल…’ जैसे भजनों की श्रृंखला ने श्रोताओं को भक्ति की गहराइयों में ले जाने का काम किया।
अनूप जलोटा ने यह भी कहा कि संगीत किसी धर्म, जाति या देश की सीमाओं में बंधा नहीं होता। यह एक ऐसा माध्यम है जो सभी को जोड़ता है। उन्होंने संकट मोचन संगीत समारोह को एक ऐसा मंच बताया, जहां हर धर्म और पंथ के कलाकार एक साथ अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।
संकट मोचन का आध्यात्मिक महत्व
संकट मोचन संगीत समारोह केवल एक सांगीतिक आयोजन नहीं, बल्कि यह वाराणसी की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत उदाहरण है। यहां वर्षों से देश-विदेश के कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देकर इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
चौथी निशा में अनूप जलोटा की प्रस्तुति ने इस परंपरा को और भी ऊंचाई दी। उनके भजनों ने न केवल श्रोताओं का मन मोह लिया, बल्कि उन्हें आध्यात्मिक शांति का अनुभव भी कराया।
कुल मिलाकर यह शाम संगीत, भक्ति और भावनाओं का ऐसा संगम रही, जिसे उपस्थित श्रोता लंबे समय तक याद रखेंगे।
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