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भाजपा सांसद ने संविधान की प्रस्तावना से 'सेक्युलर' और 'सोशलिस्ट' हटाने का विधेयक पेश किया

भाजपा सांसद ने संविधान की प्रस्तावना से 'सेक्युलर' और 'सोशलिस्ट' हटाने का विधेयक पेश किया

राज्यसभा में भाजपा सांसद भीम सिंह ने संविधान की प्रस्तावना से 'सेक्युलर' और 'सोशलिस्ट' शब्द हटाने का निजी विधेयक पेश किया।

नई दिल्ली : शुक्रवार को राज्यसभा में उस समय राजनीतिक हलचल तेज हो गई जब भाजपा के सांसद भीम सिंह ने संविधान की प्रस्तावना से सेक्युलर और सोशलिस्ट शब्दों को हटाने का निजी विधेयक पेश किया। उन्होंने कहा कि इन दोनों शब्दों की मूल संविधान में कोई आवश्यकता नहीं थी और इन्हें आपातकाल के दौरान अलोकतांत्रिक तरीके से जोड़ा गया था। उनके अनुसार इन शब्दों ने देश में भ्रम की स्थिति पैदा की है और संविधान को अपनी मूल संरचना में ही रहना चाहिए।

भीम सिंह ने दावा किया कि जब 1949 में संविधान अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, तब प्रस्तावना में न तो समाजवाद का उल्लेख था और न ही पंथनिरपेक्षता का। उन्होंने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1976 में आपातकाल के समय 42वें संविधान संशोधन के तहत इन शब्दों को शामिल किया। उनका कहना था कि उस समय संसद में कोई व्यापक चर्चा नहीं हुई क्योंकि विपक्ष के प्रमुख नेता अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और जार्ज फर्नांडीज जेल में थे। उन्होंने इसे लोकतंत्र के खिलाफ एक कदम बताया और कहा कि यह बदलाव आपातकाल की कठोर परिस्थितियों में किया गया था।

भीम सिंह ने संविधान सभा की चर्चाओं का हवाला देते हुए कहा कि पंथनिरपेक्षता और समाजवाद दोनों विषयों पर उस समय भी बहस हुई थी। प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ भीमराव आंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि संविधान की संरचना अपने आप देश को पंथनिरपेक्ष बनाएगी और इसके लिए किसी विशेष शब्द को जोड़ने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा था कि संविधान किसी भी भावी सरकार को एक ही आर्थिक या राजनीतिक नीति अपनाने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। समाजवाद को लेकर आंबेडकर का मत था कि यह लोगों की भलाई से जुड़ा विषय है और भविष्य की पीढ़ियों पर कोई एक विचारधारा थोपना उचित नहीं होगा।

भाजपा सांसद ने दोनों शब्दों को तुष्टीकरण की राजनीति का परिणाम बताया। उनका आरोप था कि समाजवाद शब्द तत्कालीन सोवियत संघ को खुश करने के लिए जोड़ा गया था और पंथनिरपेक्ष शब्द मुसलमानों को साधने के उद्देश्य से जोड़ा गया। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर ये शब्द इतने महत्वपूर्ण थे तो 1976 से पहले भारत को पंथनिरपेक्ष क्यों नहीं माना गया। क्या उन सभी सरकारों को सांप्रदायिक कहा जा सकता है जिनका नेतृत्व नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी ने किया। उन्होंने पूछा कि आखिर इन शब्दों को शामिल करने की जरूरत क्यों महसूस हुई जब देश पहले से ही विविधता और बराबरी के मूल्यों पर चल रहा था।

यह प्रस्ताव संसद में आगे किस दिशा में बढ़ेगा यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा, लेकिन इस विधेयक ने राजनीतिक विमर्श को एक बार फिर संवैधानिक मूल्यों और उनके ऐतिहासिक विकास की ओर मोड़ दिया है।

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