भारत में मौत की सजा देने की न्यायिक प्रक्रिया पर एक नई रिपोर्ट ने गंभीर और असहज करने वाले सवाल खड़े कर दिए हैं। हैदराबाद स्थित नलसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ से जुड़े आपराधिक कानून पर कार्य करने वाले संगठन स्क्वायर सर्कल क्लीनिक द्वारा जारी इस अध्ययन में पिछले दस वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि निचली अदालतों द्वारा दी गई बड़ी संख्या में मौत की सजाएं उच्च न्यायिक स्तरों पर टिक नहीं पाईं।
रिपोर्ट के अनुसार देश में बढ़ते जघन्य अपराध, जैसे निर्मम हत्याएं, बर्बर बलात्कार और गैंगरेप, समाज को झकझोरते रहे हैं। लगभग हर ऐसी घटना के बाद दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग उठती है, ताकि अपराधियों में भय पैदा हो और अपराधों पर अंकुश लगाया जा सके। लेकिन इस रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि मौत की सजा देने की प्रक्रिया में गंभीर खामियां मौजूद हैं।
अध्ययन में सामने आया है कि वर्ष 2016 से 2025 के बीच देशभर की ट्रायल कोर्ट्स ने 822 मामलों में कुल 1310 लोगों को मौत की सजा सुनाई। इन मामलों में से 842 सजाएं उच्च न्यायालयों के समक्ष विचार के लिए पहुंचीं, लेकिन हाई कोर्ट ने केवल 70 मामलों, यानी करीब 8.31 प्रतिशत, में ही मौत की सजा को बरकरार रखा। इसके विपरीत 258 अभियुक्तों, लगभग 30.64 प्रतिशत, को पूरी तरह बरी कर दिया गया।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि हाई कोर्ट स्तर पर बरी होने की दर, पुष्टि की गई मौत की सजाओं की दर से लगभग चार गुना अधिक रही। यह आंकड़ा अपने आप में इस बात की ओर इशारा करता है कि निचली अदालतों के स्तर पर गंभीर त्रुटियां हो रही हैं। कई मामलों में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि सबूत पर्याप्त नहीं थे या जांच और अभियोजन में गंभीर कमियां थीं।
सुप्रीम कोर्ट के आंकड़े भी चौंकाने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड से जुड़े 153 मामलों पर विचार किया, जिनमें से 38 मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया गया। वर्ष 2023 से 2025 के बीच सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी मामले में न तो मौत की सजा सुनाई और न ही किसी मौत की सजा को बरकरार रखा। अकेले 2025 में हाई कोर्ट ने 85 मामलों में से 22 में मौत की सजा को पलट दिया, जबकि उसी वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने जिन 19 मामलों पर विचार किया, उनमें से 10 आरोपियों को बरी कर दिया गया।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अंततः बरी किए गए 364 ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें कभी दोषी ठहराया ही नहीं जाना चाहिए था। इन लोगों को वर्षों तक मौत की सजा का मानसिक आघात झेलना पड़ा। अध्ययन के अनुसार यह स्थिति जांच और अभियोजन प्रक्रिया में गहरी और प्रणालीगत विफलताओं को दर्शाती है।
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में गलत या अनुचित दोषसिद्धि कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक निरंतर समस्या बन चुकी है। कम पुष्टि दर इस बात का संकेत है कि सजा सुनाने के चरण में सुरक्षा उपायों और उचित प्रक्रिया का पालन कई मामलों में नहीं हो पा रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मृत्युदंड के मामलों में बढ़ती सख्ती और गहन जांच इसी चिंता का परिणाम मानी जा रही है।
यह रिपोर्ट न केवल न्यायिक प्रक्रिया पर आत्ममंथन की जरूरत को रेखांकित करती है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या मौजूदा व्यवस्था वास्तव में निर्दोषों को मौत की सजा से बचाने में सक्षम है या नहीं।
